यूपी में अब बड़े स्तर पर होगी बासमती धान की खेती

यूपी में अब बड़े स्तर पर होगी बासमती धान की खेतीउत्तर प्रदेश कृषि विभाग की तरफ से किया जा रहा प्रयास (फोटो साभार: गाँव कनेक्शन)

लखनऊ। देश-दुनिया में अपनी विशिष्ट सुगंध और स्वाद के लिए प्रसिद्ध बासमती धान की खेती को राज्य में बढ़ाने के लिए कृषि विभाग उत्तर प्रदेश की तरफ से प्रयास किया जा रहा है। खरीफ सीजन की मुख्य फसल धान के सुगंधित वर्ग में आने वाले बासमती की बुवाई का क्षेत्रफल और पैदावार बढ़ाने के लिए विभाग की तरफ से किसानों को वैज्ञानिक ढंग से इसकी खेती करने के साथ ही इसके बीज पर सब्सिडी दी जा रही है।

उत्तर प्रदेश में पिछले खरीफ सीजन- 2016 में 782.275 हजार हेक्टेयर में धान की बुवाई हुई थी, इस साल विभाग ने 818.803 हजार हेक्टेयर में बासमती धान की बुवाई का लक्ष्य रखा गया है। उत्तर प्रदेश में बासमती धान की खेती को बढ़ावा देने के लिए हाल ही में गोविंद बल्लभ पंत कृषि व प्रौद्योगिकी विश्वविद्यलय पंतनगर ने बासमती धान की दो उन्नत प्रजातियों पंत बासमती-1 और पंत बासमती- 2 को विकसित किया है। इस बारे में जानकारी देते हुए डिपार्टमेंट ऑफ जेनेटिक्स एंड प्लांट ब्रीडिंग के प्रोफेसर एंड सीनियर राइस ब्रीडर डा. सुरेन्द्र सिंह ने बताया, ‘बासमती धान की यह दोनों प्रजातियां उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश केा ध्यान में रखकर विकसित की गईं। बासमती धान की इन प्रजातियों की खेती करना किसानों के लिए लाभदायक होगा।’

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वह आगे कहते हैं, ‘बासमती धान की जो पारंपरिक प्रजातियां हैं, वह प्रकाश के प्रति संवेदनशील, लंबी अवधि और अपेक्षाकृत अधिक ऊंचाई वाली होती हैं जिससे उसकी उपज कम होती है। बासमती धान की जो नई प्रजातियां विकसित की गईं हैं वह अधिक उपज देती हैं लेकिन इसके लिए किसानों को कुछ बातों का ध्यान रखना होगा। वैसे तो बासमती धान की खेती सामान्य धान की खेती की तरह ही करते हैं लेकिन बासमती धान की खेती में भूमि की संरचना और जलवायु बासमती धान की सुगंध और स्वाद को अत्यधिक प्रभावित करती हैं।’ बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के एग्रोनॉमी विभाग के प्रोफेसर डॉ. एम.एस. यादव ने बताया कि बासमती धान की खेती के लिए अच्छे जल धारण क्षमता वाली चिकनी या मटियार मिट्टी का चुनाव करना चाहिए।

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बासमती धान की खेती के लिए बीजों का चुनाव बहुत अहम होता है। रोपाई के समय के अनुसार अगेती, पछेती प्रजातियों के लिए शुद्ध व अधिक अंकुरण की क्षमता वाले बीजों का चुनाव करना चाहिए। ऐसे में बीज शोधन करके ही बुवाई करनी चाहिए। कृषि वैज्ञानिक एनके सिंह ने बताया कि किसान नर्सरी डालने से पहले बीज शोधन जरूर कर लें। बासमती धान के लिए 25 से लेकर 30 किलोग्राम बीज की मात्रा प्रति हेक्टेयर के लिए पर्याप्त होती है।

उन्होंने बताया धान को बीमारियों से बचाने के लिए बीज शोधन करते समय दो ग्राम कार्बेन्डाजिम को प्रति किलो की दर से उपचारित करते हैं। बासमती धान में सामान्य धान के मुकाबले खाद व उर्वरक क आवश्यकता आधी होती हे। ऐसे में बासमती धान को कार्बनिक खेती के लिए उपयुक्त होती है। धान में पानी की अधिक जरूरत पड़ती है इसलिए बासमती धान में पानी के प्रबंधन पर विशेषज्ञ ध्यान रखना चाहिए। रोपाई से लेकर धान में दाना बनने तक इसमें पानी का स्तर बनाए रखना पड़ता है इसलिए किसानों को यह ध्यान देना चाहिए।

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बासमती चावल की पूरी दुनिया में भारी डिमांड है इसलिए बासमती धान की खेती करके किसान अच्छा लाभ पाते हैं। भारत और पाकिस्तान को बासमती धान की खेती का जनक माना जाता है। ऐसे में इन दोनों देशों में इसकी खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि वैज्ञानिक और वहां की सरकार ध्यान दे रही हैं।

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