इन किसानों के जुगाड़ ने खेती को बनाया आसान

किसानों के काम की ख़बर हैं... देश के कुछ किसानों ने ऐसे जुगाड़ वाले यंत्र बनाएं हैं जो खेती-किसानी का काम आसान बनाते हैं.. देखिए वीडियो

इन किसानों के जुगाड़ ने खेती को बनाया आसानकिसान निलेशभाई भालाला ने तैयार किया मिनी ट्रैक्टर

खेती किसानी को आसान बनाने के लिए बहुत सी आधुनिक मशीने बाज़ार में आ गई हैं। किसान इनकी मदद से कम समय में अधिक काम कर सकते हैं, तो वहीं कुछ किसानों ने जुगाड़ से घर पर ही ऐसी मशीने तैयार कर ली हैं जिन्होंने खेती को और आसान बना दिया है।

गुजरात के एक किसान निलेशभाई भालाला ने मिनी ट्रैक्टर तैयार किया है। इस ट्रैक्टर का नाम नैनो प्लस है। 10 HP पावर वाला यह मिनी ट्रेक्टर एक छोटे किसान के सारे काम कर सकता है। इस ट्रैक्टर से आप जुताई, बिजाई, निराई गुड़ाई, भार ढोना, कीटनाशक छिड़कना आदि काम कर सकते हैं। यह दो मॉडल में आता है एक मॉडल में 3 टायर लगे होते है और दूसरे में 4 टायर लगे होते हैं।

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इस ट्रैक्टर को फसल की दो पंतियों के बीच आसानी से चलाया जा सकता है। इसकी एक और खास बात यह है कि इसके साथ आप स्कूटर का काम भी ले सकते है

रिमोट से चलाता है ट्रैक्टर

राजस्थान के बारां जिले के बमोरीकलां गाँव के रामबाबू नागर के बेटे योगेश नागर ने एक एसी डिवाइस तैयार की है जिसकी मदद से ट्रैक्टर को न सिर्फ बिना ड्राइवर के चलाया जा सकता है बल्कि खेती के सारे काम भी किये जा सकते हैं।

ट्रैक्टर चलाने से रामबाबू नागर के पेट में दर्द होने लगा था जब इस बारे में उनके बेटे को पता चला तो उसने इसका हल निकालने की ठान ली। पिता को पेट दर्द रहने की वजह से योगेश ने एक ऐसा रिमोट बनाने की ठानी, जिसकी मदद से बिना ट्रैक्टर में बैठे ही खेत की जुताई हो सके। थोड़े ही समय में योगेश एक ऐसा रिमोट बनाने में सफल हो गया।

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एक इंटरव्यू के दौरान योगेश बताते हैं, "इस रिमोट को बनाने में कुल 47 हजार रुपए का खर्चा आया है, मगर इस आविष्कार से अब पापा रिमोट से ही खेत में ट्रैक्टर चलाते हैं।'' योगेश आगे बताते हैं, "इस रिमोट को बनाने के लिए मैंने कुछ उपकरण अपने पास से लगाए और कुछ बाजार से खरीदे। इस रिमोट की सीमा करीब एक से डेढ़ किलोमीटर तक रहती है।''

देशी हल को बनाया आधुनिक सीड ड्रिल मशीन

बढ़ईगिरी का काम करने वाले 60 वर्षीय गंगा शंकर के पास खुद एक इंच भी जमीन नहीं है, दूसरे के खेत बटाई पर ले कर खेती करते हैं और उनके खेतों में हमेशा नए-नए प्रयोग करते रहते हैं। उन्हीं प्रयोगों का नतीजा है कि उन्होंने कबाड़ में पड़े साइकिल के पहिए और फ्रीव्हील को देशी हल में जोड़कर आधुनिक सीड ड्रिल मशीन में तब्दील कर दिया।

जिले के बछरावां ब्लॉक से नौ किलोमीटर पश्चिम में एक छोटे से गाँव कुसेली खेड़ा में रहने वाले गंगा शंकर काका इन दिनों क्षेत्रीय ग्रामीणों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। शंकर काका बताते हैं, "हमारा पुश्तैनी काम बढ़ई का है, लेकिन मुझे बचपन से ही खेती किसानी का शौक रहा है। खेती किसानी में रुचि के कारण मैं हमेशा किसान गोष्ठियों में जाया करता हूं। वहीं पर मुझे पता चला की फसल वैज्ञानिक पद्धति से क्रमबद्ध तरीके से बुवाई की जाए तो खाद बीज की लागत कम होगी और फसल की उपज भी बढ़ेगी।"

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वह आगे बताते हैं, "मुझे क्रमबद्ध तरीके से फसल की बुवाई करनी थी और उसके लिए सीड ड्रिल मशीन चाहिए थी। पर मशीन खरीदने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे और अगर मशीन खरीद भी ले तो उसे चलाने के लिए ट्रैक्टर कहां से लाऊंगा। इसी उधेड़-बुन में मुझे रात भर ठीक से नींद नहीं आई। सुबह उठा और मायूस मन से अपने बैलों को चारा पानी देने लगा कि अचानक मेरी निगाहें पास में ही रखे हल पर पड़ी। मुझे मेरे हल में ही सीड ड्रिल मशीन दिखने लगी। मैंने फैसला किया कि मैं अपने देशी हल को आधुनिक सीड ड्रिल मशीन में बदल कर रहूंगा।"

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मेरे पास एक फ़र वाला हल था जिस पर मैंने अपना पहला प्रयोग किया। प्रयोग के लिए मैंने कबाड़े में पड़ी साइकिल का पहिया और फ्रीवील निकाली और आटा चक्की पर गेहूं भरने वाले बॉक्स की तरह लकड़ी का एक छोटा सा बॉक्स बनाया। कुछ महीनों के बाद मेरी देसी सीड ड्रिल मशीन तैयार हो गई और मैंने उसे परखने के लिए खेत में उतारा। पर कुछ समय बाद मुझे महसूस होने लगा कि यह मशीन अभी सही नहीं है। क्योंकि इसमें समय, बीज और मजदूरों की लागत ज्यादा आ रही थी। जिससे मैं संतुष्ट नहीं था।

पहले प्रयोग से संतुष्टि ना मिल पाने के बाद मैंने फैसला किया कि अगर फ़रो की संख्या बढ़ा दी जाए तो समय और मजदूरी दोनों की बचत होगी। मैं बाजार गया और तीन फ़र वाला हल खरीद कर लाया। उसके बाद सब कुछ वैसे ही करना था बस फ्रिवील की संख्या और बॉक्स का आकार बढ़ाना था। लगभग एक वर्ष की कड़ी मेहनत के बाद मेरी तीन फ़र वाली सीड ड्रिल मशीन तैयार हो गई। जिसे मैंने अपने ट्रैक्टर रुपी बैलों पर खेत में उतारा। नतीजा संतुष्टि जनक मिला।

निराई गुड़ाई का खर्च बचाने के लिए बना डाली 'जुगाड़' की मशीनॉ

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मंदसौर के एक मिस्त्री हातिम कुरैशी ने निराई-गुड़ाई के लिए एक जुगाड़ मशीन इजाद की है, जिससे किसानों की लागत कम आती है और बाजार से खर पतवार नासक दवाइयों का छिड़काव नहीं करना पड़ता है।

मंदसौर जिला मुख्यालय से लगभग 65 किलोमीटर दूर सुवासरा तहसील में रहने वाले हातिम कुरैशी (42 वर्ष) पेशे से मिस्त्री हैं। वह बताते हैं, "हर वक्त मुझे कुछ नया बनाने का शौक रहता है। करीब सात साल पहले मन में ख्याल आया, अगर खर पतवार की निराई गुड़ाई करनी है, तो कुछ ऐसा बनाया जाए जिससे कम समय में और कम खर्च में निराई गुड़ाई हो सके।" वो आगे बताते हैं, "एक साल मुझे इस जुगाड़ को बनाने में लगा। जब बनाना सीख गया तबसे छह साल से लगातार हजारों जुगाड़ मशीने तैयार कर चुका हूं। अधिक क्षमता वाली बाइक में जुगाड़ लगा दी जाती है। इसमें दो पहिए और लगा दिए जाते हैं। फसल के बीच में कुछ बोना हो तो निराई-गुड़ाई के साथ ही बुवाई कर देते हैं। ये जुगाड़ बीज और खाद भी खेतों तक पहुँचाने का काम करती है।"

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