किसानों को मालामाल कर सकती है ये फसल, खेत की भी जरूरत नहीं

किसानों को मालामाल कर सकती है ये फसल, खेत की भी जरूरत नहींमुनाफे की गारंटी है इसकी खेती।

हमारे देश का अन्नदाता बदहाल है। सरकारें आती हैं, चली जाती हैं। लेकिन कोई सरकार व्यावसायिक खेती पर ज्यादा बात नहीं करता। ऐसी खेती या तरीकों पर बात नहीं करता जिससे ज्यादा मुनाफा कमाया जा सके। देश में बढ़ती जनसंख्या और जलवायु परिवर्तन के कारण खेती में लगातार आ रही परेशानियों से निबटने के लिए मशरूम की खेती को किसान आमदनी का बढ़िया स्त्रोत बना सकते हैं। बल्कि किसान ही क्यों, मशरूम की खेती के लिए तो जमीन की भी आवश्यकता नहीं होती।

इसका उत्पादन कम या बिना खेत वाले युवा या महिलाएं सभी कर सकते हैं। इसे झोपड़ियों में, घर के अंदर या किसी भी वर्टिकल जगह पर उगाया जा सकता है। उत्पादन विधि से पहले ये जानना जरूरी है कि मशरूम कितने तरह के होते हैं। कृषि वैज्ञानिक उत्पादन विधि के आधार पर इसके दो तरीके बताते हैं। पहला आयस्टर, दूसरा बटन मशरूम। पिछले दिनों बिहार के समस्तीपुर के राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा में मशरूम की खेती को बढ़ावा देने के लिए दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। साथ ही ये बताया गया कि बिना जमीन के मशरूम की खेती कैसे करें।

अपने घर या कमरे में कैसे करें इसकी खेती

मध्य प्रदेश के इंदौर में अपने छत के कमरे में ऑयस्टर मशरूम की खेती करने वाले राकेश सोलंकी ने घर में मशरूम की खेती की कैसे करें, इस पर हमें विस्तृत जानकारी दी। वे बताते हैं "सबसे पहले छायादार जगह का चयन करें। उसके बाद भूसा या पुआल की कुट्टी इकट्ठा करें और उसे पानी में तब तक उबाले जब तक भाप ना निकलने लगे। भूसे को उबालने के बाद साफ फर्श पर रख कर ठंडा करें। ऐसा करने से उसमें से मौजूद पानी रिसकर निकल जाएगा। इसके बाद प्रतिकिलो ग्राम शुष्क कुट्टी या भूसे के हिसाब से 150 ग्राम मशरूम का बीज उसमें अच्छी तरह मिलाएं। यानी अगर आपने एक किलो भूसे का इस्तेमाल किया है तो उसमें 150 ग्राम मशरूम बीज का इस्तेमाल होगा। गीले भूसे या कुट्टी में मशरूम बीज मिलाने के बाद जालीदार पालिथिन बैग मे भर दिया जाता है। ऐसा करने के बाद उसे ठंडी जगह पर रख दिया जाता है।

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राकेश आगे कहते हैं "जिस जगह आप मशरूम बीज से भरा पॉलिथीन बैग रख रहे हों वहां का तापमान न्यूनतम 20 डिग्री और अधिकत 30 डिग्री से ज्यादा ना हो। अगले 10 से 15 दिनों में मशरूम कवक उस जालीदार बैग के भीतर फैल जाता है और 15-20 दिनों में मशरूम निकलना शुरू हो जाता है। जो अगले 3-5 दिनों में तोड़ने लायक हो जाता है। इस तकनीक से सालों तक इसका उत्पादन संभव है। वैसे सितम्बर से मार्च का समय इसके लिए काफी उपयुक्त होता है। परिपक्व मशरूम को तोड़ लेने के बाद यदि अपेक्षित नमी बरकरार रखी जाए तो दोबारा भी इससे उत्पादन लिया जा सकता है। अगर आप खर्च का आंकलन करेंगे तो प्रति किलो उत्पादन के पीछे 15-18 रुपए का खर्च आता है। जबकि सामान्य बाजार में इसे 100 रुपए प्रति किलो तक आसानी से बेचा जा सकता है।"

ये मशरूम गुणवत्ता के लिए लोकप्रिय

मशरूम उगाने की एक अन्य विधि भी है जिसे बटन मशरूम कहते हैं। उसके बारे में राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, बिहार, समस्तीपुर पूसा के वैज्ञानिक डॉ. दयाराम बताते हैं "बटन मशरूम अपनी बेहतर गुणवत्ता के लिए काफी लोकप्रिय है। इसके लिए करीब 10 कुंतल भूसा या कुट्टी को लगातार पानी डाल कर दो दिनों तक भिगोया जाता है। तीसरे दिन इसमें 100 किलोग्राम गेहूं का चोकर, 20 किलोग्राम यूरिया, 50 किलोग्राम जिप्सम, 300 किलोग्राम मुर्गी की खाद या बिनौले की खल्ली 300 किलो ग्राम अच्छी तरह मिला कर ढेर लगा दिया जाता है।

ढेर लगाने का भी खास तरीका होता है। पहले 20 फीट लम्बा, 6 फुट चौड़ा, एक फुट ऊंचा भूसा का मिश्रण फर्श पर फैला कर तह लगाते हैं। इसके ऊपर छिद्र वाले 4 ईंच व्यास वाले 20 फीट लम्बे पाईप को क्रमश: डेढ़ फीट के अंतराल पर तह के ऊपर रखते हैं इसके बाद पाईप के ऊपर दो फीट ऊंचा मिश्रण का तह लगाया जाता है। उसके ऊपर फिर दो पाईप इस तरह रखा जाता है कि नीचे रखे तीनों पाईप के बीच में आ जाए। फिर तीसरी बार दो फीट ऊंचा मिश्रण का तह चढ़ाते हैं। उसके ऊपर एक पाईप ऐसे रखें कि नीचे रखे दोनों पाइप के बीच में रहे। अंत में बाकी बचे मिश्रण का एक फीट मोटा तह बना कर पूरी ढेर को काले रंग के पालिथीन से ढंक दिया जाता है। ऐसा करने से गैस बाहर नहीं निकलती ।

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एक से तीन दिन तक इस ढेर को इसी तरह छोड़ दिया जाता है। चौथे दिन पाइप को दोनों तरफ से खोल देते हैं। इस समय इसका तापमान 50 से 60 डिग्री सेल्सियस रहता है। छठे दिन ढेर की पलटाई की जाती है और पहले वाली प्रक्रिया अपनाते हुए फिर उसे पालिथीन से ढक दिया जाता है। नौवे दिन ढेर को चारो तरफ से (ऊपर से नहीं) खोल दिया जाता है। इसमें तापक्रम 50 से 60 डिग्री सेल्सियस के बीच रहना चाहिए। 11वें दिन फिर पलटाई होती है और पहले की भांति फिर ढेर लगा कर ऊपर में पॉलिथिन से ढक दिया जाता है। लेकिन चारों तरफ से खुला रहना चाहिए जिससे अंदर का तापमान 48 से 52 डिग्री सेल्सियस रहे।

डॉ. दयाराम आगे बताते हैं "तेरहवें दिन ढेर को पूरी तरह खोल कर ठंडा होने के बाद प्रति क्विनटल खाद में 600 ग्राम बटन मशरूम का बीज मिला कर पालि बैग में या बेड़ में कागज से ढक कर रखा जाता है। जिस जगह आप इसे रख रहे हों वहां का तापमान 20 से 25 डिग्री सेल्सियस रहना चाहिए। इस विधि में कवक 15 से 20 दिनों में फैल जाता है। कवक जाल को ढक कर रखना चाहिए और समय समय पर नमी बनाए रखने के लिए पानी का छिड़काव जरूरी होता है। 15 से 20 दिनों बाद मशरूम निकलना शुरू हो जाता है। इस विधि से मशरूम उगाने पर लागत 85 रुपए प्रति किलोग्राम आती है और बिक्री 125 रुपए किलोग्राम की दर से होती है। इसके उत्पादन का सही समय नवम्बर से फरवरी होता है। ऑयस्टर मशरूम की अपेक्षा इसमें फायदा कम होता है। क्योंकि इसकी लागत ज्यादा होती है। लेकिन किसान सहफसली के तौर पर इसकी खेती कर सकते हैं।"

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