इस किसान की सब्जियां जाती हैं विदेश, सैकड़ों महिलाओं को दे रखा है रोजगार

खेती जिसमें एक किसान और उसके उपभोक्ता बीच अगर हजारों किलोमीटर का लंबा फासला हो, तो ज़ाहिर है इस फासले को पाटने का जज्बा हर किसी के बूते की बात नहीं होगी। यह तो 64 साल के करण वीर सिंह सिद्धू की हिम्मत, संकल्प और उनके पिता के सच्चे किसान का डीएनए ही था जिसकी वजह से वो इस जोखिम भरे माहौल यानी खेती के धंधे में कूद गए।

इस किसान की सब्जियां जाती हैं विदेश, सैकड़ों महिलाओं को दे रखा है रोजगार

खेती जिसमें एक किसान और उसके उपभोक्ता बीच अगर हजारों किलोमीटर का लंबा फासला हो, तो ज़ाहिर है इस फासले को पाटने का जज्बा हर किसी के बूते की बात नहीं होगी। यह तो 64 साल के करण वीर सिंह सिद्धू की हिम्मत, संकल्प और उनके पिता के सच्चे किसान का डीएनए ही था जिसकी वजह से वो इस जोखिम भरे माहौल यानी खेती के धंधे में कूद गए।

छोटी आयु में ही सिद्धू के सर से उनके पिता का साया उठ गया। सिद्धू के पिता मानसा जिले में किसान थे। उनके गुजर जाने के बाद, वो और उनकी मां पटियाला चली आईं। सन1979 में वो राज्य में एक्साइज एंड टैक्सेसन ऑफिसर बन गए लेकिन वो खेती में कुछ रोमांचक करना चाहते थे। कई सेमिनार और वर्कशॉप में जाने के बाद उन्हें समझ में आया कि विदेशी सब्जियों का बड़ा बाजार ना केवल भारत में है बल्कि विदेशों में भी है। सिद्धू बताते हैं, "खेती मेरे खून में था और मैं कुछ अलग करना चाह रहा था। मैं तीन दोस्तों और दूसरे साझेदारों के साथ मिलकर हमारी कंपनी, पटियाला हॉर्टिकल्चर के लिए शुरुआती पूंजी लगाई। साल 1996 में मैंने नौकरी से पांच सालों का अध्ययन प्रोत्साहन अवकाश लिया और एक डच कंपनी के लिए तलवंडी साबू में सेम के फली की खेती शुरू कर दी।" पहले ही साल उन्हें बड़ा झटका लगा जब पंजाब सरकार के पैक हाउस ने उस वक्त काम करना बंद कर दिया जब60 एकड़ में तैयार फसल को निर्यात करने से पहले संरक्षित किया जाना था।

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"हमे 15 लाख का सामूहिक नुकसान पहुंचा, यद्यपि हमने सारा बकाया चुका दिया, जिसमे खेत का किराया और तीन गांवों के 40 किसानों पर हुआ लागत खर्च जो हमारे कार्य में जुड़े थे,शामिल था', उसके बाद हम आगे बढ़ गए'। बड़े ही शांत तरीके से आपबीती बताने का उनका लहजा आपको ये स्पष्ट कर देता है कि कितने शांत भाव से उन्होंने उन विपरीत परिस्थितियों का सामना किया होगा। बाद में वो अपने इस विचार को तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को समझाने में सफल रहे और 59 लाख रुपये का सॉफ्ट लोन या सुलभ कर्ज भी पाने में सफल हो गए। इस लोन का उपयोग पटियाला जिले के समाना तहसील के लालगढ़ गांव में पैक हाउस जैसी आधारभूत सुविधाएं तैयार करना था। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। देश के 180 सबसे अच्छे पैक हाउस में से यह एक है।

सिद्धू बताते हैं, "साल 2001 से साल दर साल यूरोप और ऑस्ट्रेलिया को सब्जियां निर्यात कर मैंने अच्छी कमाई की है। साल 2015 को छोड़कर, जब केंद्र ने नियम में बदलाव किया था,तब हमने एक साल का ब्रेक लेने का फैसला किया था ताकि तब तक परिस्थितियां हमारे अनुकूल हो जाए।" सामना, अमलोह और भादसों के 35 किलोमीटर के दायरे में 40 छोटे किसानों ने जिन्होंने हमें संयुक्त पूल के लिए एक से डेढ़ एकड़ जमीन दी वो सभी किसान सिद्धू जितना ही कमाते हैं।सुगर स्नैप्स और स्नो पी के उत्पादन से सिद्धू की सालाना बिक्री सवा करोड़ से तीन करोड़ के बीच है। साल 2015 में बदले हुए क्वारेंटाइन नॉर्म्स की वजह से सालाना बिक्री घटकर महज 11 लाख रह गई। यहां तक कि उन्हें काफी सारे उत्पादों को छोड़ना भी पड़ा।


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जिंदगी में खुशियां भरनेवाली प्याज

सिद्धू अपने प्याज के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं। पिछले दो साल से उन्होंने 50 एकड़ में प्याज की खेती शुरू की है, जो कि राज्य में इस फसल की सबसे बड़ी खेती है। वो बताते हैं, "पंजाब सालाना साढ़े सात लाख टन प्याज की खपत करता है और उत्पादन महज डेढ़ टन ही करता है। मेरा लक्ष्य किसानों को प्रति एकड़ 50,000 रुपये शुद्ध मुनाफा दिलवाना है, यह एक बड़ी चुनौती है लेकिन मैंने इसे स्वीकर किया है"। सरकार से प्राप्त सब्सिडी की मदद से उन्होंने 50 में से 20 एकड़ क्षेत्र में ड्रिप सिंचाई व्यवस्था लगवा दी है।उनके लिए प्याज की तीन ऋतुएं हैं। "सबसे अच्छा रबी है, जिसमे मध्य दिसंबर में पौधारोपण होता है और अप्रैल में कटाई। खरीफ फसल में बुआई जुलाई-अगस्त में होती है और कटाई नवंबर महीने में और विलंबित खरीफ फसल का मौसम सितंबर-अक्टूबर में शुरू होता है। विलंबित खरीफ फसल के सामने कई खतरे होते हैं लेकिन हम लोग तीन सीजन पर प्रयोग कर रहे हैं।"सिद्धू की कंपनी विस्टा फूड के साथ मैकडोनल्ड्स (हैमबर्गर फास्ट फूड रेस्टोरेंट की दुनिया में सबसे बड़ी श्रृंखला) के साथ प्याज की आपूर्ति की बात कर रही है। इसके लिए उन्होंने एकीकृत हाइब्रिड किस्म विकसित की है। अगर करार पर बात बन जाती है तो उन्हें उम्मीद है कि 25 रुपये प्रति किलोग्राम का मूल्य उन्हें मिलेगा।

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लहसुन और ऐस्परैगस (एक प्रकार की साग) के साथ प्रयोग

चीन की एक कंपनी के लिए सिद्धू पहली बार पांच एकड़ जमीन में लहसुन की खेती कर रहे हैं, जिसे अमेरिका में बेचा जाएगा। अगर प्रयोग सफल रहा तो वो अमेरिकन कंपनी से सीधा संपर्क करेंगे। एक एकड़ क्षेत्र में वो ऐस्परैगस (एक प्रकार की साग) को उगाने को लेकर भी प्रयोग कर रहे हैं। फसल तीन साल में पूरी तरह तैयार हो जाएगी, उसके बाद उन्हें उम्मीद है कि उन्हें प्रति किलोग्राम 300 रुपये मिलेंगे और प्रति एकड़ तीन लाख का मुनाफा होगा। यह फसल अगले 20 साल तक उन्हें फल देता रहेगा।उद्यमी या व्यवसायी गांव के गरीब परिवार के करीब 100 भूमिहीन महिलाओं को मजदूरी पर रखते हैं और उन्हें प्रतिदिन डेढ़ सौ रुपये देते हैं। अधिकांश मामले में एक परिवार की सभी महिलाएं काम पर आती हैं और मिलकर प्रति महीने करीब 20,000 रुपये तक कमा लेती हैं।

नौकरी में घाटा, लेकिन कोई मलाल नहीं

कृषि में सिद्दू की सफलता सरकारी नौकरी में विकास नहीं होने की कीमत देकर चुकानी पड़ी है। वो बताते हैं, " मैंने सात बार वेतनमान में इजाफा और एक प्रमोशन खो दिया। मेरे जूनियर मुझसे आगे निकल गए। अगर मैं लगातार काम कर रहा होता तो मैं ज्वाइंट कमिश्नर के पद से रिटायर होता।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि, "अगर मैं नौकरी नहीं कर रहा होता तो खेती में और भी अच्छा करता। लेकिन ये भी सच है कि मैंने ईटीओ की नौकरी से कई संपर्क हासिल किया"। किसानों की पटियाला हॉर्टिकल्चर कंपनी तापमान नियंत्रित सब्जियों की खुदरा दुकान खोलने की योजना बना रहा है, जिसकी शुरुआत अप्रैल में पटियाला से दो दुकानों से होने जा रही है। दो साल में 15 करोड़ के निवेश के साथ फूड पार्क के लिए उन्होंने पंजाब सरकार के साथ एक करार पर हस्ताक्षर किया है। वो बताते हैं, "सब्जी पैदा करनेवाले हमारी पहल या प्रस्ताव की प्रतीक्षा कर रहे हैं।'

साभार: इफको लाइव

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