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शहर वापस लौट रहे मजदूरों से वसूला जा रहा दोगुना-तिगुना किराया, प्राइवेट बस मालिक बना रहे 'आपदा को अवसर'

बिहार से दिल्ली के लिए बारह सौ से पंद्रह सौ किलोमीटर की दूरी को पूरा करने में 24 घंटे से अधिक का समय लगता है। इस 24 घंटे में यात्री अपने मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित रहते हैं, वहीं बस में सोशल डिस्टेंसिंग के मानकों का भी पालन नहीं किया जा रहा है।

Jagannath JagguJagannath Jaggu   8 Sep 2020 6:16 AM GMT

शहर वापस लौट रहे मजदूरों से वसूला जा रहा दोगुना-तिगुना किराया, प्राइवेट बस मालिक बना रहे आपदा को अवसर

अपने चार अन्य साथियों के साथ सुपौल से दिल्ली जा रहे 30 वर्षीय अकरम किसी गैराज में काम करते हैं। लॉकडाउन के लगभग 6 महीने बाद वह एक प्राइवेट बस से फिर से दिल्ली जा रहे हैं ताकि उन्हें रोजगार मिल सके। वह बताते हैं कि उनके दो साथियों का पहले से बुकिंग था, जो 1500 रुपये का था लेकिन बाद में उनके दो अन्य साथी भी चलने को तैयार हुए। इन दो साथियों से बस परिचालक ने 1800 रुपये लिया क्योंकि उनका पहले बुकिंग नहीं था।

प्राइवेट बसों से महानगरों की तरफ लौट रहे प्रवासी मजदूरों के किराये में इस तरह की अनियमितता इन दिनों आपको लगातार देखने को मिलेगी। वे इस महामारी के दौर में शहर के तरफ क्यों लौट रहे हैं, जबकि स्थिति अभी भी सुधरी नहीं है? इसके जवाब में अकरम के एक अन्य साथी कहते हैं कि लॉकडाउन के दौरान वे सोचकर आएं थे कि अब फिर कभी वापिस शहर नहीं लौटेंगे, अपने गांव के बाजार में ही कोई रोज़गार तलाशेंगे। लेकिन इस 6 महीने के लॉकडाउन में उनके सारे रखे हुए सेविंग पैसे खर्च हो गए।

अब चूंकि उनके पास घर चलाने के लिए भी पैसा नहीं है, इसीलिए उन्हें वापिस लौटना पड़ रहा है। वह कहते हैं, "इस लौटने में भी लूट मची है। इससे पहले भी बस से आते-जाते रहे हैं लेकिन इस तरह का भीड़ कभी नहीं देखी और ना ही इस तरह की लूट। सामान्य दिनों में एक सीट का सिर्फ एक हज़ार रुपये ही किराया होता था और स्लीपर का डेढ़ हजार लिया जाता था। लेकिन अब स्लीपर सीट को ख़त्म ही कर दिया दिया है। एक स्लीपर सीट पर चार-चार लोगों को बैठाया जा रहा है और किराए भी पहले से दोगुनी वसूली जा रही है। इस दौरान सोशल डिस्टेंसिंग के किसी भी मानक (SOP) का पालन नहीं किया जा रहा है।


यात्रा के दौरान बस मालिक और चालक-परिचालकों की मनमानी

इतना किराया चुकाने के बाद भी बस कर्मी किसी तरह की कोई जिम्मेदारी नहीं ले रहे हैं। जब चाहे किसी को खड़ा कर दिया जा रहा है। ऐसी मनमानी कई यात्रियों के साथ किया जा रहा है। दरभंगा के 50 वर्षीय रामू दिल्ली में ई-रिक्शा चलाते हैं। वे अपने ही गांव के एक एजेंट से बस का टिकट बनवाए थे। लेकिन उन्हें सीट नहीं मिली।

एजेंट ने आकर उन्हें बस में ड्राइवर वाली केबिन में बैठा दिया लेकिन रात होते-होते कंडक्टर ने उन्हें वहां से भी उठा दिया। जब उन्होंने कहा कि वह भी पैसे देकर बैठे हैं तो कंडक्टर सीधा कहता है कि जिसे दिए हो, उनसे बात करो। जब वह इस मामले में एजेंट से बात करने की कोशिश करते हैं, तब एजेंट फ़ोन नहीं रिसीव करता है।

उसी बस में सवार बाकी यात्रियों ने भी बताया कि ये लोग इस तरह की बदमाशी करते ही रहते हैं। कई बार स्थिति यह हो जाती है कि कोई बीच रास्ते से उतरे भी तो कैसे? मजबूरन जैसे-तैसे सफर करना ही पड़ता हैं। यात्री शिकायत करें भी तो किससे? बस वाले लोगों की पहुंच भी बहुत ऊपर तक होती है। कोई भी सुनने वाला नहीं होता है। रामू ने हमसे बात करते हुए कहा, वे इससे पहले कभी बस से इतनी दूरी का सफर नहीं किए हुए हैं, वे पहले ट्रेन से ही जाते थे।

वह कहते हैं, 'मजबूरी है, इसलिए बस से जा रहे हैं।' वह ट्रेन के टिकट का इंतजार 10 दिनों से कर रहे थे। कई एजेंट से भी बात किए कि लेकिन कोई जुगाड़ नहीं बैठा। इसलिए मजबूरन बस से जाना पड़ रहा है। आगे वह कहते हैं, "घर पर कब तक बैठ कर खाएंगे, कोई काम नहीं है। खेती भी इतनी नहीं कि उससे अपनी आजीविका चला सकूं। 7 सदस्यों के परिवार में अकेला कमाने वाला हूं इसलिए बाहर जाना ही पड़ता। दिल्ली में मेट्रो भी शुरू होने वाली है इसलिए अब थोड़ी बहुत कमाई भी होने की संभावना है।" रामू जैसे यात्री अकेले नहीं है। इस बस में कई यात्री बस कर्मियों व मालिकों के इस तरह की मनमानी के लिए लड़ते ही रहे हैं।


यात्रियों से किया जा रहा अमानवीय व्यवहार

बिहार से दिल्ली के लिए बारह सौ से पंद्रह सौ किलोमीटर की दूरी को पूरा करने में 24 घंटे से अधिक का समय लगता है। इस 24 घंटे में यात्री अपने मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित रहते हैं। बात करने के दौरान एक यात्री ने बताया कि शौच या लघुशंका करने जैसे मूलभूत क्रियाओं के लिए भी यात्रियों को घंटों इंतजार करना पड़ता हैं। बसों में एक शौचालय ही रहता है, वह भी महज नाम का। अगर किसी को जाना हो तो आठ-आठ घंटे ही बस रूकती है।

एक अन्य यात्री बताते हैं कि वे पर्याप्त मात्रा में खाते-पीते भी नहीं हैं क्योंकि उन्हें लघुशंका ना लगे। बार-बार शौचालय जाना पड़ सकता है, जो सुविधा बस में उपलब्ध नहीं है। बसों में आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए फर्स्ट एड बॉक्स की भी सुविधा उपलब्ध नहीं है। अगर यात्रा के दौरान किसी को प्राथमिक दवा की जरूरत पड़े तो भी दवा दुकान के तरफ ही जाना होगा।

"एक महिला अचानक कल रात से पेट दर्द से बहुत परेशान है। प्राथमिक तौर पर उन्हें पेन किलर दिया जा सकता है लेकिन बस वाले रखते ही नहीं हैं। फिर उन्हें काफी दूरी तय करने के बाद एक मेडिसिन सेंटर से दवा लाकर दिया गया," यात्री ने बताया। बस के ही एक कर्मी ने बताया कि बसों में ऐसी घटनाएं रोज होती हैं, यह उनके लिए कुछ नया नहीं है।

फिर भी विवश जनता सफर करने को मजबूर हैं। परिवार की भरण-पोषण के लिए उन्हें काम चाहिए ही। ज़ाहिर है इसके लिए पलायन करना ही होगा। ट्रेन की अनुपलब्धता उन्हें बस से सफर करने के लिए मजबूर कर रही है। सरकारें भी इस मसले पर उदासीन रवैया अख्तियार की हुई हैं। प्राइवेट बसों के परिचालन के लिए कोई ठोस नियम नहीं बनाए गए हैं। ऐसे में गरीब मजबूर जनता करे भी तो क्या?

लॉकडाउन के बाद हुए गांव कनेक्शन के सर्वे में भी यह निकल कर सामने आया था कि आधे से अधिक प्रवासी मजदूर फिर से शहर वापस लौटना चाहते हैं और यह सिलसिला अनलॉक की घोषणा होने के बाद से मध्य जुलाई से ही चालू है। इस सर्वे ेमें अधिकतर प्रवासी मजदूरों ने कहा कि हालात कुछ सुधरने पर उन्हें वापिस महानगरों की तरफ लौटना ही होगा क्योंकि गांवों में रोजगार के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं और जिस तरह वे लॉकडाउन के दौरान शहरों में भूखमरी के कगार पर पहुंच गए थे, अगर वे फिर से पलायन नहीं किए तो वैसे ही हालात गांवों में भी हो सकते हैं।


गांव कनेक्शन के सर्वे में लोगों से सवाल पूछा गया कि 'लॉकडाउन में जब ढील दी जाने लगेगी या कोरोना महामारी का प्रकोप कम होने लगेगा, तो क्या वे फिर से शहरों की तरफ पलायन करेंगे?' इसके जवाब में 33 फीसदी ने तुरंत हां में उत्तर दिया, जबकि 8 फीसदी लोगों ने कहा कि वह शहर तो जाएंगे लेकिन किसी दूसरे शहर जाएंगे। वहीं 15 फीसदी लोग असमंजस में भी दिखें। हालांकि उन्होंने भी माना कि उन्हें मजबूरन ही सही पर वापिस जाना पड़ सकता है। इस तरह से कुल 56 फीसदी लोग ऐसे मिले, जिन्होंने कहा कि उन्हें रोजी-रोटी के चक्कर में फिर से पलायन की चक्की में पिसना होगा। हालांकि 16 फीसदी लोग ऐसे भी थे जो अभी तय नहीं कर पाए हैं कि वे क्या करें। जबकि 28 फीसदी लोगों ने नहीं में जवाब दिया, इसका अर्थ है कि सिर्फ 28 फीसदी लोग अब फिर से वापिस नहीं जाना चाहते।

इस सर्वे के अनुसार जो प्रवासी मजदूर दूसरे राज्यों से अपने गांव लौटे हैं, फिर से वापिस जाने वालों की संख्या भी उन्हीं की अधिक है। 70 फीसदी ऐसे प्रवासी फिर से दूसरे राज्यों के बड़े शहरों की तरफ जाना चाहते हैं।


सर्वे में लगभग 93 फीसदी ग्रामीणों ने माना कि बेरोजगारी उनके गांव या उनके क्षेत्र की बहुत बड़ी समस्या है और लॉकडाउन के कारण इसमें इजाफा ही हुआ है। 37 फीसदी लोग इस समस्या को बहुत ही गंभीर, 40 फीसदी लोग गंभीर और 16 प्रतिशत लोग कुछ हद तक गंभीर मानते हैं।


इस सर्वे में 62 फीसदी लोगों ने कहा कि उनके गांव और जिले में रोजगार के कोई साधन नहीं हैं इसलिए वह पलायन करते हैं जबकि 19 फीसदी ने कहा कि बड़े शहरों में अच्छा पैसा या मजदूरी मिलती है, इसलिए वे जाते हैं। जबकि 16 फीसदी लोग ऐसे हैं जो लोग बेहतर अवसर या बेहतर जीवन-शैली को प्राप्त करने के लिए शहरों की तरफ पलायन करते हैं।


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