यहां 50 फीसदी घरों में बनती है कच्ची शराब, नहीं होती कार्यवाही

अलीगढ़ जिले का साँकरा वो गांव है जहां कच्ची शराब 50 फीसदी घरों में बनती है और 90 फीसदी लोग नशे के लती हैं जिसमें बच्चे भी शामिल हैं।

Neetu SinghNeetu Singh   7 Nov 2019 11:21 AM GMT

यहां 50 फीसदी घरों में बनती है कच्ची शराब, नहीं होती कार्यवाही

बिजौली (अलीगढ़)। ओमकार की पत्नी ने आग लगाकार केवल इसलिए आत्महत्या कर ली थी क्योंकि उसका पति रोज शराब पीकर आता और उसके साथ मारपीट करता था। वो अपनी तीन बेटियों और एक बेटे के खाने का इंतजाम नहीं कर पा रही थी इसलिए उन्होंने थक हारकर आत्महत्या कर ली।

ओमकार की पत्नी की मौत साँकरा गांव में नशे की लत की एक चिंताजनक तस्वीर बयां कर रहा है। अलीगढ़ जिला मुख्यालय से लगभग 75 किलोमीटर दूर बिजौली ब्लॉक का साँकरा वो आखिरी गांव है जहाँ के लोग आज मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। यहां ज्यादातर परिवारों की आमदनी का मुख्य जरिया कच्ची शराब बनाकर बेचना है। यहां कच्ची शराब 50 फीसदी घरों में बनती है और 90 फीसदी लोग नशे के लती हैं जिसमें बच्चे भी शामिल हैं।

गांव के एक शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "यहां हर दूसरे तीसरे घर में ये शराब बनती है। आप खुलेआम 20 रुपए के पाउच में 200 एमएल शराब खरीद सकते हैं। ये बात जिला प्रशासन तक पता है। कभी कोई दबिश हुई तो दो तीन दिन शांति रही फिर से वही काम शुरू हो जाता। अगर हम विरोध करते हैं तो लड़ाई-झगड़ा होता है। यहां की स्थिति बहुत चिंताजनक है अगर प्रशासन स्तर पर इसे गम्भीरता से नहीं लिया गया तो इस गांव के हालात इससे भी ज्यादा खराब हो जाएंगे।"

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शेखूपुर सटकना के ग्राम प्रधान संतोष शर्मा कच्ची शराब को बंद करने की मांग करते हुए.

यहां के ग्रामीण नशे की इस बुरी लत से छुटकारा पाएं और कच्ची शराब बनाने का व्यवसाय बन्द करें इस दिशा में गांव कनेक्शन फाउंडेशन और राष्ट्रीय समाज रक्षा संस्थान (नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल डिफेंस) के साझा प्रयास से एक जागरूकता कार्यक्रम किया गया था। कई महिलाओं ने अपनी आप बीती बताई। एक महिला ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "मेरे पति इतनी शराब पीते थे कि वो उम्र से पहले ही मर गये। उनकी मौत के बाद छोटे बच्चों की कौन परवरिश करता इसलिए मुझे मजबूरी में कच्ची शराब बनाना पड़ रहा है। हम नहीं चाहते कि इस जहरीली शराब को बनाएं और बेचें जिससे कोई और महिला मेरी तरह विधवा हो पर क्या करें बच्चों का पेट पालने के लिए सब मजबूरी में करना पड़ रहा है।"

इस दौरान गांव कनेक्शन फाउंडेशन की टीम ने कच्ची शराब का एक पाउच एक घर से 20 रुपए में खरीदा भी जिससे इस शराब की जांच कराई जा सके और ये पता चल सके कि ये लोगों के लिए कितनी नुकसानदायक है। चाय की दुकान पर एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "हमारे यहां गंगा का किनारा है जितनी भी लाशें यहां जलती हैं उनकी हड्डियों को उठाकर ये शराब बनाई जाती है। आसपास जो भी जानवर मरते हैं उनकी हड्डियों का भी उपयोग होता है। वो इसलिए क्योंकि हड्डियों के चूरा से शराब दो दिन में तैयार हो जाती है वैसे 10 से 15 दिन लगते हैं। पीने वालों को ये पता है कि कच्ची शराब कैसे बनती है।" हड्डियों से शराब बनने वाली बात गुपचुप तरीके से कई लोगों ने बताई।

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गांव के एक युवा कृष्णा निषाद (16 वर्ष) ने बताया, "हमारे गांव में कच्ची शराब पीकर बहुत लोग मरे हैं। प्रशासन स्तर पर ये बात सभी अधिकारियों को पता है कि यहां बहुत शराब बनती है पर फिर भी कोई कार्यवाही नहीं होती। पुलिस अपने हिस्से का पैसा लेकर चली जाती है। गांव में ही सस्ती दरों में आसानी से शराब मिलने की वजह से लोग इसे धड़ल्ले से पी रहे हैं।" कृष्णा निषाद की तरह गांव के कुछ युवा और महिलाएं घर में कच्ची शराब बनने से काफी चिंतित थे।

कार्यक्रम में आए शेखूपुर सटकना के ग्राम प्रधान संतोष शर्मा ने नशामुक्त जागरूकता कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा, "ये जिले का बहुत ही पिछड़ा गांव है। यहां के लोग शिक्षित नहीं हैं इसलिए पिछले 20 वर्षों से ज्यादा यहां कच्ची शराब बन रही है। पर इस तरह का जागरूकता कार्यक्रम हम पहली बार देख रहे हैं। इस एक कार्यक्रम से तो बदलाव सम्भव नहीं है पर अगर यहां का प्रशासन चाह ले तो यहां कच्ची शराब बनना बन्द हो सकती है।"

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कार्यक्रम में आई कई महिलाओं ने अपना दर्द बताया कि नशे की इस बुरी लत से उनके परिवारों की क्या स्थिति हो गई है। एक बुजुर्ग महिला राममूर्ति देवी (65 वर्ष) ने बताया, "मेरे दो बेटे खूब शराब पीते हैं। एक बेटे की चार लड़के और एक लड़की है उसने शराब पीने के चक्कर में घर के बर्तन तक बेच दिए है। अभी कुछ दिनों से सबको भट्टे पर लेकर काम करने गया है। अगर मेरे गांव में शराब मिलनी बन्द हो जाये तो इस गांव के लोगों का जीवन सुधर जाए।" इस नशामुक्ति जागरूकता कार्यक्रम में 200 से ज्यादा ग्रामीण शामिल थे।

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