दिल्ली की देहरी : जब दिल्ली वालों ने अपनाया, पाइप वाला पानी 

दिल्ली की देहरी : जब दिल्ली वालों ने अपनाया, पाइप वाला पानी दिल्ली की देहरी।

जब अंग्रेज सरकार ने पहली बार पाइप से आबादी वाले इलाकों में पानी को पहुंचाने की योजना बनाई तो उनके दिल में खटका था। सरकार इस बात को लेकर दुविधा में थी कि क्या यमुना के जल को शुद्व मानने वाले हिंदू, लोहे के पाइप में आने वाले पानी को सहजता से स्वीकार करेंगे। दूसरा, क्या वे इस पानी का मोल चुकाने के लिए तैयार होंगे? सरकार को इस बात से हैरानी हुई कि जब इस योजना को लागू किया गया तो उसकी आशंकाएं निर्मूल साबित हुई। दिल्ली के नागरिकों ने इस सुविधा को हाथों हाथ लेते हुए दिल-दरिया को इसके लिए पैसा खर्च करने की इच्छा जताई।

इतिहासकार नारायणी गुप्ता "दिल्ली बिटवीन टू एम्पायर्स 1803-1931" पुस्तक में लिखती है कि वर्ष 1896 में पंजाब के सफाई (सैनिटरी) आयुक्त ने यमुना के पानी के उपयोग के लिए एक वाटरवक्र्स के निर्माण और उसकी लागत निकालने के लिए कर (टैक्स) लगाने का सुझाव दिया। अंग्रेजों को इस बात पर संशय था कि क्या स्थानीय नागरिक कर चुकाने के लिए तैयार होंगे और क्या हिंदू भूमिगत पाइपों से बहकर आने वाले यमुना के जल को स्वीकार करेंगे। दिल्ली नगर पालिका के सर्वसम्मति से इस योजना को मानने के कारण यह संदेह गलत साबित हुआ।

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दिल्ली के निवासियों ने इस योजना को स्वीकार करते हुए सफाई में सुधार के लिए अलग से पैसे देने की भी सहमति दी। इतना ही नहीं, व्यापारी और समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति पानी की निजी पाइप-कनेक्शन के लिए पैसे का भुगतान करने के लिए तैयार थे। पर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि दिल्ली में वाटरवर्क्स निर्माण के काम के लिए धन की व्यवस्था के सवाल पर आसानी से या सर्वसम्मति से फैसला नहीं हुआ।

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लेखक अवधेन्द्र शरण "इन द सिटी, आउट ऑफ प्लेस" पुस्तक में लिखते हैं कि पाइप के पानी को सुरक्षित जल के एकमात्र स्रोत मानने के कारण वर्ष 1869 में दिल्ली नगर निगम समिति ने राजधानी में जल आपूर्ति की एक नई प्रणाली का निर्माण करने का प्रस्ताव रखा। यह योजना किसी न किसी कारण से सरकार के विभिन्न विभागों के बीच लगभग दो दशकों तक इधर-उधर उलझी रही।

इसी तरह, नगर निगम के अधिकारियों और सरकार के बीच भी लाल किले में सैनिकों और दरियागंज छावनी को होने वाली पानी की आपूर्ति की एवज में सरकार के इस व्यय को उठाए जाने के संबंध में विवाद थे। इतना ही नहीं, धन के साथ इस काम के लिए विशेषज्ञों की जरूरत थी। यह इसलिए भी जरूरी था क्योंकि स्वच्छ पानी के काम को पूरी तरह एक अलग वैज्ञानिक क्षेत्र के रूप में लिया जा रहा था, जिसमें पारंपरिक ज्ञान की कोई भूमिका नहीं थी। मार्ग से प्रकाशित जट्टा-जैन-नेउबाउर की संपादित “वाटर डिजाइन, इनवायरमेंट एंड हिस्ट्रिज” पुस्तक में जेम्स एल वेशकोट जूनियर लिखते हैं कि बृहत्तर दिल्ली में पानी की चार प्रमुख धाराएं थी। इनमें से एक हौजखास तालाब में पहुंचती थी, कुशक नाला दक्षिणपूर्व दिल्ली को सिंचित करता था, मध्य रिज की पहाड़ी धाराएं थीं और अंतिम घुमावदार धाराएं थीं, जिससे लोदी मकबरे के बागों और गांवों को पानी पहुँचता था। ये सभी अंग्रेजों के अपनी राजधानी नई दिल्ली के निर्माण के साथ खत्म हो गईं।

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इस विषय में धन की व्यवस्था और आवश्यक तकनीकी विशेषज्ञता को जुटाने को लेकर काफी विचार-विमर्श और तोल-मोल हुआ और आखिरकार उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में दिल्ली में पीने के पानी की व्यवस्था पर काम शुरू हुआ। इस परियोजना के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली स्थित एसपीजी मिशनरी की पत्नी श्रीमती विंटर ने इंगलैंड में अपने घरवालों को चिठ्ठी लिखकर यह बात बताई।

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आखिरकार, यह एक प्रशासनिक नवाचार न होकर यह एक स्थानीय रूप से एक बड़ी घटना थी। इस तरह, वर्ष 1892 और वर्ष 1894 में करीब 173,000 की अनुमानित आबादी के प्रत्येक व्यक्ति को रोजाना लगभग 10 गैलन (45.5 लीटर) पानी उपलब्ध करवाने के हिसाब से यमुना किनारे चंद्रावल गांव में दो-दो के जोड़ों में चार कुंए खोदे गए। वर्ष 1897 में इस पूरी योजना को पूरा कर लिया गया।

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