पद्मावती : जौहर भईं इस्तरी पुरूष भए संग्राम

पद्मावती : जौहर भईं इस्तरी पुरूष भए संग्रामपद्मावती का दिल्ली से नाता।

इन दिनों पद्मावती फिल्म को लेकर विवाद ने तूल पकड़ा हुआ है। विवाद इस बात को लेकर है कि फिल्म में इतिहास को गलत तरह से दर्शाया जा रहा है। ऐसे में स्वतंत्र पत्रकार नलिन चौहान दिल्ली की देहरी में इतिहास के एक नए पन्ने से रूबरू करवा रहे हैं कि रानी पद्मावती का दिल्ली से क्या नाता।

आज यह बात पढ़कर किसी को भी हैरानी होगी कि भला मध्यकाल के चित्तौड़ के राणा रत्नसिंह की रानी पद्मिनी का दिल्ली से क्या नाता? हिंदी फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली की अलाउद्दीन खिलजी-पद्मिनी विषय पर केंद्रित फिल्म 'पद्मावती' राजपूत समाज के गलत चरित्र चित्रण की वजह से देश व्यापी विरोध के कारण ख़बरों की सुर्ख़ियों में है।

इस ऐतिहासिक फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी की भूमिका में रणवीर सिंह है तो दीपिका पादुकोण पद्मिनी की भूमिका में है। राजपूत रानी पद्मिनी की कहानी का एक सिरा अमीर खुसरो के इतिहास से लेकर मलिक मुहम्मद जायसी तक के साहित्य तक फैला हुआ है।

अगर इतिहास को पलटे तो वर्ष 1296 में अलाउद्दीन खिलजी अपने चाचा और ससुर सुलतान जलालुद्दीन की हत्या करके दिल्ली की गद्दी पर काबिज हुआ। ऐसे में अलाउद्दीन ने अपने धतकरम को ढकने के लिए जहां दरबार के अमीरों को जमीने बांटी तो वही अमीर खुसरो को को खुसरो-ए-शौरा की उपाधि दी। वहीं दूसरी तरफ खुसरो ने यह भी कमाल दिखालाया कि दिल्ली की गद्दी पर एक के बाद दूसरे सुलतान प्रायः पहले सुलतान को कत्ल करके बैठे, लेकिन सरकारों की इस हिंसात्मक उठा-पटक में खुसरो बराबर राजकवि बना रहा और तरक्की भी करता रहा।

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हिंदी साहित्य में अमीर खुसरो की पहचान ऐतिहासिक मनसवियों (पहेलियां) तक होने के कारण उसका इतिहासकार का पक्ष अनजाना है। जबकि सच्चाई यह है कि अमीर खुसरो ने अलाउद्दीन को खुश करने की मंशा से 15 वर्ष के खिलजी शासन के इतिहास को अलंकृत शैली वाले गद्य में लिखा जो कि ‘‘खजायनुल फुतूह’’ (विजय कोश) और ‘‘तारीख-ए-अलाई’’के नाम से भी जाना गया। 1311 ई. में लिखे गए ‘‘खजायनुल फुतूह’’ में खुसरो ने दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन की 15 वर्ष की विजयों एवं आर्थिक सुधारों का वर्णन किया है।

उसके वर्णन में पक्षपात की भावना दिखाई देती है। उसने अलाउद्दीन के सिर्फ गुणों पर प्रकाश डाला है, दोषों पर नहीं। उसने अलाउद्दीन के राज्यारोहण का वर्णन किया है, किन्तु जलालुद्दीन के वध का कोई उल्लेख नहीं किया है। इसके बाद भी यह महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ है तथा तत्कालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक दशा की जानकारी का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

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प्रसिद्ध हिंदी आलोचक विजयदेव नारायण साही अपनी पुस्तक ‘‘जायसी’’ में लिखते हैं कि सबसे बढ़कर खुसरो ने अलाउद्दीन की चित्तौड़ विजय का जो आंखों देखा हाल अपने खजायनुल-फतूह में लिखा था, उसी को जायसी ने पद्मावत की कथा का आधार बनाया। जायस के रहने वाले जायसी ने अपनी रचना कवि ने 947 हिजरी में की थी।

सन् नौ से सैंतालिस अहै।

कथा अरंभ बैन कवि कहै।

एक श्रेष्ठ काव्य पद्मावत की कथा का संक्षिप्त रूप जायसी ने स्वयं दे दिया है-

सिंहल दीप पदुमनी रानी,

रतनसेन चितउर गढ़ ज्ञानी।

अलाउदीं दिल्ली सुलतानूं,

राधौ चेतन कीन्ह बखानूं।

सुना साहि गढ़ छेंका आई,

हिन्दू तुरकहिं भई लराई।

आदि अंत जस कथा अहै,

लिखि भाषा चौपाई कहै।

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पद्मिनी सिंहल द्वीप की रानी थी। रत्नसेन उसे चित्तौड़़ ले आये। दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन से राघवचेतन ने उसकी चर्चा की। उसने आकर गढ़ घेर लिया। हिन्दू मुसलमानों में लड़ाई हुई। इसी कथा को जायसी ने विस्तार दिया है। जायसी और खुसरो में कितना अन्तर है, इसे समझने के लिए खुसरो के लिखित वृतांत को ध्यान में रखना आवश्यक है। खुसरो का वृत्तान्त अत्यन्त अलंकृत गद्य में है। उसका सरलीकृत अनुवाद इस प्रकार हैः

इस तारीख को विश्व-विजेता (अलाउद्दीन) ने चित्तौड़ की विजय के लिए डंका बजाने की आज्ञा दी और दिल्ली शहर से अपनी पवित्र ध्वजाओं को गतिमान किया। आकाश तक उठा हुआ सुलतान का काला छत्र उस क्षेत्र में प्रविष्ट हुआ और अपने दमामे की आवाज से, जो आकाश के कानों में गूँजती थी, सुलतान के दीन का सुसमाचार दिशाओं में गुंजरित करने लगा।

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बादशाह ने अपना दरबार, जो आकाश के बादलों जितना ऊंचा था, उस जगह दोआबे के बीच स्थापित किया और उसके उल्लसित उत्साह से दोनों समुद्रों के किनारे तक भूकम्प आ गया। दाहिने और बायें की सेनाओं को आज्ञा दी कि गढ़ पर दोनों ओर से चढ़ाई करें। दो महीने में तलवार की बाढ़ के साथ पहाड़ी की कमर तक ही पहुंच सके और उसके ऊपर न जा सके। विचित्र गढ़ था कि पत्थरों की मार भी उसे तोड़ न सकी।

इस धर्मयुद्ध का कुछ और अलंकृत वर्णन करने के उपरान्त खुसरो बतलाता है कि सोमवार तारीख 8 जमादि उस्सानी, हिजरी संख्या 702 (अर्थात् 28 जनवरी, 1303 ईस्वी) को किला फतेह हुआः

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एक दिन में, बादशाह की प्रचण्ड आज्ञा से, लगभग तीस हजार दोजखी लोग काट दिए गए और खिज्राबाद (चित्तौड़) के मैदान में लगता था कि घास नहीं, लाशें उगी हैं। इस नीले दुर्ग की शाखाओं और जड़ों को महान साम्राज्य के महान वृक्ष खिज्र खां के हवाले कर दिया गया और दुर्ग का नाम खिज्राबाद रख दिया गया। बादशाह ने उन सभी हिंदुओं को, जो इस्लाम के वृत्त के बाहर पड़ते थे, कत्ल कर डालने का कर्तव्य काफिरों का वध करने वाली अपनी दोधारी तलवार को इस तरह सौंपा कि अगर आज के दिन राफिजी, अर्थात् भिन्न मत रखनेवाले नाम को भी इन काफिरों के हक की मांग करें, तो सच्चे सुन्नी लोग ईश्वर के इस खलीफा का समर्थन सौगन्ध खाकर करेंगे।

अमीर खुसरो ने जो कि चित्तौड़ युद्ध के समय सुल्तान अलाउद्दीन के साथ ही रहा था, इतना ही लिखा था कि भयंकर युद्व के बाद चित्तौड़ का किला सुलतान के हाथ लग गया। अंग्रेज इतिहासकार जेम्स टॉड ने ‘‘एनल्स एण्ड एण्टिक्किटीज ऑफ राजस्थान’’ में लिखा है कि रत्नसिंह की रानी पद्मिनी के नेतृत्व में हिन्दू ललनाओं ने जौहर किया। अलाउद्दीन ने चित्तौड़ को तो अधीन कर लिया पर जिस पद्मिनी के लिए उसने इतना संहार किया था, उसकी तो चिता की अग्नि ही उसके नजर आई।

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चित्तौड़ के किले के टूटने और जौहर का उल्लेख जायसी ने पद्मावत के अन्त में इस दोहे से किया हैः

जौहर भईं इस्तिरी पुरूख भये संग्राम।

पातसाहि गढ़ चूरा चितउर भा इसलाम।।

शायद जायसी के दोहे में अमीर खुसरो के शेर की स्मृति है। लेकिन दोनों की मनःस्थिति में भारी अंतर है। खुसरो काफिरों के खून से धुलकर पृथ्वी को पाक होता देखता है और उल्लसित होकर इस साम्राज्यवादी सत्ता-संघर्ष को इस्लाम की विजय मानता है।

जायसी का समूचा पद्ममावत अमीर खुसरो की इस मनोवृत्ति पर जबर्दस्त टिप्पणी है। खुसरो का एक प्रसिद्ध शेर हैः

मुल्के दिल करदी खराबज तीरे नाज

व-दरीं वीराना सुलतानी हनोज।

(तूने हदय के देश को अपने नाज की तलवार से उजाड़ डाला और अब इस वीराने में तू सुलतान बनकर बैठा है।)

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इतिहासकार खुसरो पर सबसे अच्छी टिप्पणी गजल कहने वाले अमीर खुसरो का यह शेर ही है। जायसी की कथा का अन्त करने वाले दोहे में, जिसमें स्त्रियां जल गई, पुरूष संग्राम में लड़ मरे, दुर्ग चूर-चूर हो गया-और इस वीरान में इस्लाम के नाम पर सुलतान बैठा हुआ है, शायद अमीर खुसरो के इस प्रसिद्ध शेर की अनुगूंज है। अमीर खुसरो और जायसी के तुलनात्मक अध्ययन पर विस्तृत शोध की अपेक्षा है। लेकिन इसके संकेत काफी मिलते हैं कि जायसी के सामने खुसरो की कविता और अन्य रचनाएं, विशेषतः खजायनुल-फतूह थीं।

जायसी कवि और सन्त हैं, खुसरो सत्ता के चाटुकार कवि। जायसी ने पद्यावत में अलाउद्दीन खिलजी की जीत पर लिखा-

जौहर भईं इस्तरी पुरूष भए संग्राम।

पात साहि गढ़ चूरा चितउस भा इस्लाम।

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उल्लेखनीय है कि वर्ष 1303, 1535 और 1568 के चित्तौड़ के तीनों शासकों के अवसर पर पद्मिनी, कर्मावती एवं पत्ता तथा कल्ला की पत्नियों की जौहर कथा इतिहास जगत में प्रसिद्ध है। अकबर के समय तो जौहर ने इतना भीषण रुप धारण कर लिया था कि चित्तौड़ का प्रत्येक घर तथा हवेली जौहर स्थल बन गयी थी।

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