देश का पहला रंगीन वृत्तचित्र था, द दरबार एट दिल्ली, 1912  

देश का पहला रंगीन वृत्तचित्र था, द दरबार एट दिल्ली, 1912  दिल्ली दरबार

आज कम लोग ही इस बात से परिचित होगे कि अंग्रेज भारत में वर्ष 1911 में दिल्ली में हुए तीसरे दरबार का विश्व फिल्म के इतिहास में एक अलग स्थान है। उल्लेखनीय है कि तीसरा दिल्ली दरबार के समारोह नए अंग्रेज राजा बने जॉर्ज पंचम को भारत सम्राट के रूप में स्थापित करने के हिसाब से किया गया था। इसका कारण किनेमाकलर के राज्यारोहण दरबार के लिए अंग्रेज शाही जोड़े, किंग जॉर्ज पंचम और क्वीन मैरी, की भारत यात्रा (1911-1912) के दौरान बम्बई, दिल्ली और कलकत्ता में आयोजित समारोहों, जुलूसों और सार्वजनिक समारोहों के सभी भव्य रंगों को पहली बार अपनी रंगीन फिल्म में समेटना है।

देश का पहला यह रंगीन वृतचित्र "विद् अवर किंग थ्रू इंडिया" को "द दरबार एट दिल्ली, 1912" के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष 1911 के दिल्ली दरबार में कुल पांच फर्मों को शूटिंग, जिसे अब डाक्यूमेंटरी फुटेज कहा जाता है, करनी की अनुमति दी गई थी। इनमें से रंगीन शूटिंग करने वाली अर्बन की ही टीम थी। इस टीम ने अंग्रेज राजा और रानी के मुंबई में अपोलो बंदर (जहां पर बाद में गेटवे ऑफ इंडिया बना) में उतरने-जाने तक की फुटेज तैयार की। शाही युगल दम्पति ने लाल किला के उत्तर में बने सलीमगढ़ किले के द्वार पर बने प्रस्तर हाथियों के बीच से होते हुए दिल्ली में प्रवेश किया। जबकि हकीकत में दिल्ली दरबार अनेक परेडों और शाही घोषणाओं की एक श्रृंखला थी, जिसका अंत अंग्रेज सम्राट की दो घोषणाओं के साथ हुआ। इनमें से पहली बंगाल विभाजन की समाप्ति और दूसरी अंग्रेज साम्राज्य की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की थी।

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इसे आमतौर पर एक एकल फिल्म के रूप में जाना जाता है पर इसे फिल्मों के एक समूह के रूप में देखना अधिक सटीक होगा। जिनमें दिसंबर 1911 में अंग्रेज शाही दम्पति की पहली भारत यात्रा के साथ मुख्य रूप से दरबार समारोह के विवरण का दस्तावेजीकरण किया गया। इस फिल्म के विभिन्न प्रदर्शनों के लिए फिल्मों के विभिन्न सेटों को जोड़ा गया ताकि अलग-अलग अवधि में बनी फिल्मों के शो को प्रदर्शित करना संभव हो। आज इनमें से केवल दो रील ही बची है, जिसमें से एक मुख्य समारोह के बाद सैनिकों का निरीक्षण और दूसरी शाही दम्पति के भारत दौरे के अंत में कलकत्ता में निकला एक जुलूस है। इस फिल्म ने अपने रंग, अवधि और बहु-मीडिया प्रदर्शन के कारण दुनिया भर में देखने वालों को प्रभावित किया।

अगर दिल्ली दरबार को पूरी तरह फिल्माने के साथ उसकी फोटोग्राफी नहीं की गई होती तो 1911 के इस दरबार की विशालता का आकलन करना मुश्किल ही नहीं असंभव होता। यहां एकत्र हुए महाराजाओं, चमकदार पीतल के साथ जुटे 34,000 सैनिकों, अंग्रेज वाइसराॅय के दल सहित शाही अमला, जहां अंग्रेज राजा ने 6,100 हीरे से जड़ित भारत का शाही ताज पहना, मौजूद था। ऐसे में अर्बन के लिए फिल्म शूटिंग के हिसाब से इससे अधिक रंगदार घटना नहीं हो सकती थी।

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दूसरे शब्दों में, दिल्ली दरबार की घटनाओं को किनेमाकलर रिकॉर्ड करने वाले चाल्र्स अर्बन के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी। अर्बन ने शाही दम्पति के पूरे भारत के दौरे को किनेमाकलर प्रक्रिया में फिल्म बनाने के लिए अपने साथ चार-पांच कैमरामैन रखे थे। ऐसा इसलिए भी था क्योंकि कई दूसरी कंपनियों ने भी श्वेत-श्याम रंगों में समारोहों को फिल्माया था। अर्बन ने दिल्ली दरबार की घटनाओं, अंग्रेज साम्राज्य के उत्कर्ष की घड़ियों और उसके सबसे बड़े दृश्यमान जमावड़े को फिल्मांकन के लिए अपनी किनेमाकलर प्रक्रिया का इस्तेमाल किया।

किनेमाकलर पहली सफल रंगीन चलचित्र प्रक्रिया थी, जिसका 1908-14 की अवधि के बीच व्यावसायिक उपयोग किया गया। इसका आविष्कार सन् 1906 में इंग्लैंड के ब्राइटन के जॉर्ज अल्बर्ट स्मिथ ने किया था। इसे वर्ष 1908 में चाल्र्स अर्बन की लंदन की अर्बन ट्रेडिंग कंपनी ने शुरू किया था। सन् 1909 के बाद से, इस प्रक्रिया को किनेमाकलर के नाम से जाना गया। यह दो रंग की एक रंगीन रंग प्रक्रिया थी, जिसमें फोटोग्राफी और पीछे से लाल-हरे रंग के फिल्टरों से श्वेत-श्याम फिल्म का चित्रण किया जाता था।

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जॉर्ज पंचम ने इस फिल्म को 11 मई 1912 को स्कला में क्वीन मैरी, क्वीन एलेक्जेंड्रा और रूस की साम्राज्ञी मारिया के साथ देखा। रूस की महारानी ने इस प्रदर्शन के विषय में अपने बेटे निकोलस द्वितीय को लिखा कि कल रात हमने उनकी (अंग्रेज शाही दम्पति) भारत यात्रा देखी। किनेमाकलर की फिल्म बेहद रोचक और सुंदर है और यह सभी घटनाओं को वास्तविकता में देखने का भाव पैदा करती है। यहां तक कि 12 दिसंबर 1912 को इन फिल्मों को बकिंघम पैलेस में भी दिखाया गया।

इतना ही नहीं, इस फिल्म के पहले शो का प्रदर्शन 2 फरवरी 1912 को लंदन में स्कला थियेटर में विद् अवर किंग एंड क्वीन थ्रू इंडिया शीर्षक के तहत किया गया। यह शो करीब ढाई घंटे तक चला। स्काला के मंच को ताजमहल की प्रतिकृति के रूप में तैयार किया गया था। इसके लिए विशेष रूप से संगीत तैयार किया गया था, जिसमें 48 वाद्य यंत्रों का एक ऑर्केस्ट्रा, गाने वाले 24 व्यक्तियों के एक दल सहित बांसुरी-ड्रम बजाने वाले थे जो कि फिल्म प्रस्तुति का अभिन्न अंग थे।

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इस फिल्म ने कामकाजी तबके के लिए एक सस्ते रोमांचक पिक्चर शो को दुनिया भर के भद्रलोक के लिए एक उपयुक्त मनोरंजन का स्थान दिला दिया। उल्लेखनीय है इसे देखने वाले भद्रलोक में ब्रिटिश शाही परिवार, पोप और जापान के सम्राट तक थे। इसके बावजूद कुछ वर्षों के भीतर ही इस फिल्म का फुटेज गायब हो गया था। वर्ष 2000 में इसकी एक रील, रूस के एक शहर क्रास्नोगोस्र्क में मिली। प्राकृतिक रंगीन फिल्मों की पहली पीढ़ी में फिल्म उत्पादन के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने वाली इस भव्य फिल्म के केवल दस मिनट का फुटेज ही शेष बचा है।

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