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किसान मुक्ति यात्रा (भाग-4) : स्वागत में उड़ते फूल और सिलसिला नए तजुर्बात का

Prabhat Singh | Sep 14, 2017, 10:00 IST
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मंदसौर हिंसा
जंतर-मंतर पर तमिलनाडु के किसानों के प्रदर्शन और मंदसौर कांड के बाद शुरू हुई किसान मुक्ति यात्रा, जो मध्यप्रदेश समेत 7 राज्यों में गई। उस यात्रा में देश कई राज्यों के 130 किसान संगठन और चिंतक शामिल हुए। किसानों की दशा और दिशा को समझने के लिए वरिष्ठ पत्रकार प्रभात सिंह इस यात्रा में शामिल हुए। एक फोटोग्राफर और पत्रकार के रूप में उनकी डायरी का चौथा भाग


दूसरा भाग यहां पढ़ें-

खाचरोद, गोयला, भेरुग्रह तिराहे पर गाड़ियां रोककर स्वागत करने वाले मिले। कुछ जगहों पर गाड़ी से नेताओं के उतरने के पहले ही गुलाब की पंखुडियां हवा में उड़ती और शीशे पर बिखर जातीं। राजनेताओं के स्वागत की तरह की ये रस्में कुछ अटपटी लग रही थीं, मगर मैं तो सिर्फ़ दर्शक की हैसियत में था।

वीएम सिंह की राय थी कि इस तरह की रस्मों से बचा जाए। एकाध जगह उन्होंने गेंदे के हार मंच से हटवाकर रख दिए मगर बाद में देखा कि कुछ नेता माला पहनने से मना नहीं कर पाए। उज्जैन के प्रेस क्लब में नेताओं को संवाददाताओं से बात करनी थी। प्रेस कांफ्रेस में आने वालों और उनके सवालों का मुझ पर काफी गहरा असर रहा है, सदमे की हद तक गहरा। जब रिपोर्टिंग करता था, तब ऐसी महफिलों में शिरकत मजबूरी थी मगर बाद में अपने लिए एक अनकहा उसूल बना लिया, जिधर प्रेस कांफ्रेस होगी, वहां नहीं रुकूंगा।

उज्जैन में यह उसूल थोड़ी देर के लिए भूला, इस एतबार से कि मैं तो देखने वालों में हूं, पूछने वालों में नहीं। देखा जाए, शायद हमारी दुनिया कुछ बदली हो। अभी नेता बैठ रहे थे, संवाददाता चले आ रहे थे कि एक स्थूलकाय ने आकर मुझे देखा और कहा, ‘वहां आगे जाकर बैठ जाओ। यह कुर्सी मेरी है।‘ उसके लहज़े में आग्रह का नहीं, किसी मवाली की ठसक का भाव था। मुझे असंमंजस में देखकर उसने फिर वहीं जुमला दोहराया। हीरामन की कसम याद आई। सोचा कि जहां अख़बारों के नाम दैनिक दबंग हों, वहां रिपोर्टर से शिष्टाचार की उम्मीद ही क्यों करनी? मैं वहां से उठा और वह कुछ बुदबुदाता सा कुर्सी पर जम गया। योगेंद्र यादव यह सब देख रहे थे। उन्होंने लौट आने के लिए पुकारा मगर फिर वहां रुकना मुझे ज़रूरी नहीं लगा।

प्रेस क्लब के बाहर सड़क के पार ख़ूब घने पेड़ थे और हल्की हवा चल रही थी। क़सम को फिर से गांठ दी, कुदरत को मन ही मन आभार कहा। तभी लिंगराज वहां घूमते हुए मिल गए। वह पश्चिम उड़ीसा कृषक संगठन समन्वय समिति के संयोजक हैं, हिन्दी ख़ूब बढ़िया बोलते हैं। ओडिशा में किसानों के हालात समझने के इरादे से बात छेड़ी तो उन्होंने हीराकुड बांध के यश और उसी इलाके में किसानों की सिंचाई की दिक्कतों पर विस्तार से बताया। बताया कि 2004 में आई नई जल नीति में बांधों से पानी देने में उद्योगों को प्राथमिकता देने से किसानों की बदहाली और बढ़ी है। वह हीराकुड बांध के आसपास के इलाकों में सिंचाई के कम हुए संसाधनों का ज़िक्र करते हैं। बताया कि किस तरह उड़ीसा सरकार की प्राथमिकता में उद्योगों के आने से किसान बुरी तरह पिछड़े हैं। और अब तो छत्तीसगढ़ सरकार भी अपने यहां 32 थर्मल प्लांट बनाना चाहती है।

ओडिशा के मुख्यमंत्री ने कहना शुरू किया है कि छत्तीसगढ़ में महानदी का पानी रोकने से हीराकुड के अस्तित्व को ख़तरा पैदा हो जाएगा। बकौल लिंगराज, नेता जिस मुद्दे को दो राज्यों के बीच की लड़ाई साबित करने पर तुले हैं, दरअसल वह लड़ाई कृषि और उद्योगों के बीच है। लिंगराज ने बताया कि पहले उन्हें नहीं लगता था कि ओडिशा में किसान ख़ुदकशी का तरीका अख़्तियार करेंगे। वह अपने इस भरोसे का तर्क यह देते हैं कि ओडिशा में किसान बहुत कम जोत वाले हैं, ज़ाहिर है कि वे बड़े कर्ज़ के दुष्चक्र से बचे रहेंगे. मगर बीस-पच्चीस हज़ार के कर्ज़ की देनदारी से उकताकर वे जान दे रहे हैं।

सरकार की ओर से 23 जीन्स के लिए न्यूनतम मूल्य तय हैं। धान तक खरीदने के लिए सरकारी इन्तज़ाम पूरे नहीं हैं, बाक़ी के बारे में क्या सोचें? शिक्षित युवाओं की आकांक्षाएँ हैं मगर खेती से उन्हें सिर्फ निराशा मिली है. गावों से निकलकर वे छोटी-मोटी नौकरियां कर तो रहे हैं मगर यह सब भी छलावे से ज्यादा कुछ नहीं।

उज्जैन पहुंचने से पहले बहुमत की इच्छा के मुताबिक तय हुआ था कि नेता प्रेस कांफ्रेस करेंगे और बाक़ी लोग महाकाल के दर्शन के लिए मंदिर जाएंगे। मगर फिर जाने क्या हुआ कि मंदिर का कार्यक्रम रद्द हो गया। अब जो लोग प्रेस क्लब के बाहर थे, उन्होंने तय किया कि इस खाली समय का उपयोग खाना खाने में करेंगे। सो वे सब चले गए और मैं वहां अकेला ही बचा। यहां से देवास और फिर रात को इंदौर पहुंचकर रुकना था। देवास में बड़ी सभा और रास्ते में कुछ जगहों पर वही स्वागत-सभाएं।

जबलपुर के अलावा खंडवा, सागर और देवास ऐसी जगहें हैं, जिनके ज़िक्र भर से परसाई याद आ जाते हैं। इसकी कोई ख़ास वजह नहीं जानता सिवाय इसके कि वह मेरे प्रिय लेखकों में एक हैं। तो जब हम देवास पहुंचे, सूरज सिर के ऊपर पहुंच चुका था। किसान संघर्ष समिति के लीलाधर चौधरी की ओर से जवाहर चौक पर सभा का इंतज़ाम था। नेताओं के बैठने की जगह तो ख़ैर ढंकी हुई थी। स्वराज अभियान के लोग फटाफट तस्वीरें और कलश-हल गाड़ी से उतारकर मंच पर ले गए। नेता भी पहुंचकर जम गए मगर ऐन बाज़ार के बीच उस चौक में सुनने वालों के लिए रखी गई कुर्सियां ख़ाली थीं, एकदम ख़ाली।

कुछ लोगों को ख़ाली कुर्सियों की फोटो उतारते देखकर डॉ.सुनीलम् ने माइक पर आकर बरजने के अंदाज़ में कहा कि वे ऐसी तस्वीरें उतारने से बाज़ आएं, साथ चल रहे लोगों से वहां आकर बैठने का आग्रह किया। दिक्कत यह थी कि जवाहर चौक भीड़-भाड़ वाले बाज़ार का इलाक़ा है। बहुत सी गाड़ियां तब तक पहुंची ही नहीं थीं औऱ जो पहुंच पाई थीं, ट्रैफिक के लिहाज़ से पुलिस ने उन्हें दूर खड़ा करा दिया था। माइक से बार-बार हो रही अपील का नतीजा यह हुआ कि गाड़ियों से उतरकर लोग कुर्सियों पर आकर जम गए। सामने की कुछ क़तारों में हरी पगड़ियां चमकने लगीं। नेताओं के वक्तव्य आने लगे। मैं बाज़ार का जायज़ा लेने बढ़ गया। खाद और पेस्टिसाइड की महक से थोड़ा दूर दवाख़ाना, बिसातख़ाना, किराना, कपड़े और मिठाइयों की दुकानें थीं।

पटरी पर फल के फड़ों के साथ दो-तीन स्टॉल पर ताले बिक रहे थे मगर उन पर तालों से कहीं ज्यादा कुंजियां रखी थीं। नई-पुरानी, चमकती और जंक लगी चाभियों के ढेर लगे थे। दिल्ली-नोएडा में अक्सर चाभी की तस्वीर वाले बोर्ड दिखाई दे जाते हैं, जिन पर एक मोबाइल फोन नम्बर के साथ पहचान लिखी होती है- सरदार जी चाभी वाले। कई बार सोचा मगर इस सवाल का जवाब नहीं ढूंढ पाया कि इस धंधे में लगे सारे लोग ख़ुद को सरदार जी ही कहलवाते हैं या फिर कोई एक सरदार जी हैं, जिनका कारोबार इतना फैला हुआ है। बहरहाल देवास में न तो ऐसा कोई बोर्ड था और न ही सरदार जी दिखे।

नेताओं की ललकार पूरे इलाके में गूंज रही थी। कुछ लोग हाथ रोककर उन्हें सुन रहे थे और कुछ अविचल अपने काम में मग्न. डॉ.सुनीलम् की आवाज़ फिर सुनाई दी, वह बता रहे थे कि इंदौर में सभा करने की इजाज़त अफसरों ने रद्द कर दी है। उन्होंने चेताया कि अफसर चाहे जो कर लें, सभा होकर रहेगी।



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