जिन्ना भारत के प्रधानमंत्री बनते तो शायद टल जाता बंटवारा मगर रुकता नहीं

हाल ही में दलाई लामा ने एक भाषण में कहा कि महात्मा गांधी ने यदि मुहम्मद अली जिन्ना को भारत का प्रधानमंत्री बना दिया होता तो देश का बंटवारा रुक सकता था। क्या देश को विभाजन से रोकने की गांधी जी की यह तरकीब कामयाब हो पाती?

जिन्ना भारत के प्रधानमंत्री बनते तो शायद टल जाता बंटवारा मगर रुकता नहीं

दलाई लामा ने एक भाषण में कहा कि महात्मा गांधी ने यदि मुहम्मद अली जिन्ना को पूरे भारत का प्रधानमंत्री बना दिया होता तो देश का बंटवारा रुक सकता था। स्वयं महात्मा गांधी ने विभाजन के अन्तिम दिनों में यही सोचा था लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने डटकर इस विचार का विरोध किया। पटेल भी सहमत नहीं थे। यह वही गांधी थे जिन्होंने सुभाष चन्द्र बोस के बजाय नेहरू को वरीयता दी थी और पटेल की जगह नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय लिया था। तब क्या नेहरू के प्रति गांधी जी के विचार बदल गए थे?

ऐसी घड़ी में गांधी जी को सुभाष चन्द्र बोस की याद आई थी और उन्होंने कहा था, "बोस एक सच्चे देशभक्त थे"। तब बहुत देर हो चुकी थी, बोस अब नहीं थे। इतिहासकार दुर्गादास का मानना है कि यदि बोस के हाथ में देश की कमान होती तो बंटवारा नहीं होता। लेकिन जिन्ना पर गांधी जी की उम्मीद का कोई ठोस आधार नहीं था। जिन्ना ने कांग्रेस छोड़ी थी गांधी जी के कारण और कड़वाहट पैदा हई थी नेहरू-जिन्ना टकराव के कारण। इसलिए जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाकर देश का विभाजन टल जाता, इस पर विश्वास नहीं होता। जो भी होता, गांधी जी ने बटवारा रोकने का अन्तिम विकल्प भी आजमाया था।

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गांधी जी ने वायसराय माउन्टबेटन से आग्रह पूर्वक कहा कि भारत का बंटवारा मत कीजिए। वायसराय का जवाब था "विकल्प क्या है"। गांधी जी ने पूरे विश्वास से कहा था, "विकल्प है। अन्तरिम सरकार को बर्खास्त करके जिन्ना के नेतृत्व में वैकल्पिक सरकार बना दीजिए।" जिन्ना शायद यही चाहते थे लेकिन इस प्रस्ताव को नेहरू ने नहीं माना। महात्मा गांधी को यह उम्मीद न रही होगी कि उनकी बात जवाहर लाल नेहरू नहीं मानेंगे जिन्हें कुर्सी तक स्वयं महात्मा गांधी ने पहुंचाया था या पटेल इनकार कर देंगे जिन्होंने गांधी के एक इशारे पर प्रधानमंत्री की कुर्सी नेहरू के लिए छोड़ दी थी। नेहरू सरकार को बर्खास्त करके जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने की बात सोचना ही गांधी जी के मन में कितना पीड़ादायक रहा होगा, इसकी कल्पना मात्र कर सकते हैं ।

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वैसे यह सच है कि जिन्ना को बहुत समय तक भारत विभाजन अथवा पाकिस्तान बनाने में कोई रुचि नहीं थी, यह गांधी जी से छुपा नहीं था। मुहम्मद अली जिन्ना एक ऐसे इंसान थे जो कभी हज करने नहीं गए थे, पांच बार नमाज़ नहीं पढ़ते थे, जिन्हें कुरान की आयतें भी ठीक से नहीं आती थीं, पोर्क से परहेज़ नहीं था, अविभाजित भारत में विश्वास रखते थे, कांग्रेस पार्टी के सदस्य थे और कट्टरपंथी मुसलमानों से दूर रहते थे। तब वह विभाजन परस्त मुस्लिम लीग में कैसे गए, डेलिवरेंस डे मना कर खूनखराबा क्यों कराया, यह इतिहासकार जानें।

जिन्ना को अपमान का घूंट कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में पीना पड़ा था जब उन्होंने खिलाफत आन्दोलन के लिए गांधी जी के सत्याग्रह के तरीके का विरोध करते हुए कहा था "मिस्टर गांधी आप सत्याग्रह के ज़़रिए अनपढ़ हिन्दुस्तानियों को भड़काने का काम तुरन्त बन्द कर दीजिए।" गांधी जी के अनुयायी जिन्ना पर भड़क गए थे और चीख कर बोले, "महात्मा गांधी बोलो।" गांधी जी स्टेज पर मौजूद थे परन्तु बोले कुछ नहीं। धीरे-धीरे जिन्ना का कांग्रेस से मोहभंग होता गया। उन्हें कांग्रेस में अपना भविष्य नहीं दिखा और अलगाववाद का नारा बुलन्द कर दिया।

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सच यह है कि जिन्ना को मुस्लिम लीग की जरूरत पड़ गई और मुस्लिम लीग को "कायदे आज़म" की। दोनों ने एक दूसरे का इस्तेमाल किया। पता नहीं कहां तक सही है, लेकिन कहते हैं कि पाकिस्तान बनने के बाद अपने आखिरी दिनों में एक बार जिन्ना के कमरे से निकलते हुए लियाकत अली को यह कहते सुना गया "बुड्ढे को अपने किए पर पछतावा हो रहा है।" इस बात का उल्लेख दुर्गादास की किताब 'इंडिया फ्रॉम कर्जन टु नेहरू ऐंड आफ्टर' में मिलता है। जिन्ना को सेक्युलर बताने वाले लालकृष्ण अडवाणी के बयान को इसी परिप्रेक्ष में लेना चाहिए।

40 के दशक में जिन्ना के पास समय बहुत कम था। उनके फेफड़ों में टीबी या कैंसर था जिसे बम्बई के चेस्ट स्पेशलिस्ट डाक्टर पटेल और स्वयं जिन्ना के अलावा कोई नहीं जानता था। वह बहुत जल्दी में थे, बेताब थे। यदि उन्हें पूरे देश का प्रधानमंत्री बना भी दिया गया होता तो उसी तरह भारत छोड़ कर चल जाते जैसे पाकिस्तान छोड़ गए। शायद बंटवारा टल जाता मगर रुकता नहीं और भारत की वही दशा होती जो पाकिस्तान की है।

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