बजट से कुछ भी नया नहीं चाह रहे किसान

इस समय भारतीय कृषि के कई उत्पाद अपने बाज़ार ढूंढ पाने में असमर्थ दिख रहे हैं, कई ऐसे उत्पाद हैं जो अधिशेष होने की वजह से अब देश के अंदर नहीं बेचे जा सकते

Suvigya JainSuvigya Jain   3 July 2019 5:36 AM GMT

बजट से कुछ भी नया नहीं चाह रहे किसान

इस साल का बजट पेश होने में हफ्ताभर बचा है। लेकिन बजट से पहले जैसा माहौल होता था वह इस बार नहीं है। मीडिया में ऐसी खबरें लगभग गायब है कि बजट में कौन क्या चाह रहा है। बहुत संभव है यह इसलिए हो क्योंकि जिस भारी बहुमत से मौजूदा सरकार चुन कर आई है, उससे यह मान लिया गया हो कि सरकार बजट के जरिए जो भी करेगी वही लोगों के लिए जरूरी है। हालांकि हाल ही में ग्रामीण भारत पर गाँव कनेक्शन का देशव्यापी सर्वेक्षण आया है। इस सर्वेक्षण के नतीजों से पता चल रहा है कि इस समय देश के बजट में गांव और किसान क्या चाह रहे हैं।

गाँव कनेक्शन की टीम ने देश के 19 राज्यों में 18 हजार का सैंपल लेकर किसानों की मौजूदा स्थिति, समस्याएं और उनकी मांगों पर सर्वे किया है। इसके निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं। सर्वे के मुताबिक 48 फीसद यानी किसानों की आधी आबादी परेशान होकर खेती करना छोड़ देना चाह रही है। यह भी पता चला कि 13.9 फीसद ऐसे किसान परिवार हैं जिनकी अगली पीढ़ी अब कृषि में अपने लिए आजीविका लायक रोज़गार नहीं देखती। ग्रामीण युवा अब गुजारे लायक आमदनी वाले किसी दूसरे काम में लगना चाहते हैं।

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अगर कृषि प्रधान देश के किसानों की आधी आबादी खेती-किसानी से मुह मोड़ने पर मजबूर हो रही है तो यह किसी भी राजव्यवस्था के लिए बहुत गंभीर बात होनी चाहिए। और गंभीरता जताने के लिए बजट से बेहतर और क्या मौका हो सकता है। इस आबादी के आकार के हिसाब से भी बजट में सबसे ज्यादा गौर गांव और किसान पर ही होना चाहिए। हालांकि चुनावी साल होने की वजह से इसीसाल चार महीने पहले अंतरिम बजट पेश हो चुका है। उसमें किसानों के लिए कुछ बातें ज़रूर कही गई थीं। लेकिन हालात को देखते हुए लग रहा है कि 5 जुलाई को आने वाले पूर्ण बजट में सरकार को किसानों के लिए कुछ ज्यादा जगह बनानी पड़ेगी। किसानों के लिए इस बजट में क्या करना जरूरी है? इसे लेकर कुछ बातें।


वक्त पर पानी न मिलने से परेशान हैं किसान

भारत में आधी से ज्यादा खेती आज भी बारिश पर निर्भर है. मौसम की ज़रा सी गड़बड़ी से खेती तबाह हो जाती है। इसीलिए सिंचाई परियोजनाओं में इस समय भारी निवेश की ज़रूरत है। चुनाव से पहले सत्ता दल ने अपने घोषणा पत्र में अधूरी पड़ी 68 सिंचाई परियोजनाओं को दिसम्बर तक पूरा करने का वायदा किया था। यह समय उस वायदे को पूरा करने पर ज़ोर लगाने के लिए बिल्कुल सही समय है। जुलाई आने को है और अभी मानसून आधे देश तक नहीं पहुंच पाया है। इतना ही नहीं पिछले साल की स्थितियों के कारण मानसून के बहुत पहले ही आधा देश सूखे की चपेट में था। हर रोज़ कई शहरों और गाँवों से पानी की किल्लत की भयावह तस्वीरें सामने आ रही हैं। ऐसे में किसान जिसकी आजीविका का साधन ही पानी पर निर्भर है वह किस हालत में होगा उसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। कई जगह किसान पानी खरीद कर खेती करने को मजबूर हैं। भूजल खत्म होने को है। गाँव कनेक्शन के सर्वे में भी 41 फीसद किसानों ने कृषि सुधार की मांगों में सिंचाई को मुख्य मांग के तौर पर रखा है।

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हालात के लिहाज से बजट का जोर जल प्रबंधन पर होना चाहिए। बेशक यह खर्चीला काम है। लेकिन कृषि क्षेत्र भी अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा है। रोजगार के लिहाज से तो खेती किसानी की हिस्सेदारी आधी से भी ज्यादा है। इतना ही नहीं सरकार के लिए पहले सूखा राहत और फिर बाढ़ राहत पर भारी रकम खर्च करना हर साल की मजबूरी बनती जा रही है। जाहिर है जल प्रबंधन से दोनों मोर्चे संभालने में मदद मिलेगी।


उपज का वाजिब दाम दिलाने का काम

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जिस रफ़्तार से दूसरे क्षेत्रों का विकास हुआ है वैसी रफ़्तार कृषि विकास में नहीं रही। एक कृषि ही है जिसके उत्पाद के दाम सबसे धीमी रफ़्तार से बढे हैं। इसीलिए देश की सबसे ज्यादा आबादी को रोज़गार देने वाले और 130 करोड़ लोगों के लिए भोजन का इंतज़ाम करने के बाद भी सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा बेहद कम है। पिछले साल कृषि विकास दर चिंताजनक स्थिति तक घट गई है। आलम यह है कि खेती करने के लिए ज़रूरी खाद, बीज, बिजली, पानी जैसे दूसरे उत्पादों के दाम तक जिस तेजी से बढ़े उसके मुकाबले किसान की उपज का दाम सरकारें नहीं बढ़वा पाईं। आज अपनी लागत निकालने में भी किसान को दिक्कत आ रही है।

जाहिर है कि कृषि उत्पाद के सही मूल्य निर्धारण और सरकारी खरीद में बढ़ोत्तरी का काम इस बजट के प्रमुख कामों में शामिल दिखना चाहिए। गाँव कनेक्शन के सर्वे में भी 43.6 फीसद किसानों ने कृषि उत्पाद के दामों को ही कृषि की सबसे बड़ी समस्या और कृषि से पलायन का कारण बताया है।


कृषि बाज़ार और अनाज भंडारण का वायदा

इस समय भारत में कुल उपज का एक तिहाई हिस्सा रखरखाव की कमियों से सड़ गल कर बर्बाद हो जाता है। अपने चुनावी घोषणा पत्र में सत्ता दल ने राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे वेयर हाउसिंग ग्रिड और ग्राम भण्डारण व्यवस्था बनाने का वायदा किया था। बजट में दिखना चाहिए कि सरकार को यह वायदा याद है। इसी के साथ कृषि उत्पाद के लिए बाज़ार के विकल्प देने वाली 22,000 ग्रामीण हाट बनाने की दो साल पुरानी योजना है। यह योजना अपनी समीक्षा होने के इंजतार में है। क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में अगर ग्रामीण बाज़ार खोले गए होते तो नज़र जरूर आते।

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समस्या घरेलू बाज़ार चुक जाने की भी है

इस समय भारतीय कृषि के कई उत्पाद अपने बाज़ार ढूंढ पाने में असमर्थ दिख रहे हैं। कई ऐसे उत्पाद हैं जो अधिशेष होने की वजह से अब देश के अंदर नहीं बेचे जा सकते। ऐसे उत्पादों के लिए एक प्रभावी कृषि निर्यात कार्यक्रम इस साल के बजट में दिखना चाहिए। कृषि निर्यात बढ़ाने का कार्यक्रम युद्धस्तर पर चलाने के लिए सरकारी निवेश बढ़ाने की दरकार है। इस मामले में बजट से क्या मिलता है इस पर भी किसानों की नज़र रहेगी।

कुल मिलकर किसान इस समय आने वाले बजट से कुछ भी नई उम्मीद नहीं लगाए हैं। उनकी वही पुरानी मांगें है। मसलन सही दाम, अच्छे बाज़ार, गोदाम, बिजली, पानी. बस इस बार उनकी समस्याओं की गंभीरता और आकार पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुका है। इसीलिए राष्ट्रीय बजट में उन्हें प्राथमिकता मिलना पहले से कहीं ज्यादा ज़रूरी दिख रहा है।

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