जीडीपी के आंकड़ों को लेकर मीडिया में बड़ी गंभीरता से हो रही हैं बातें

देश में आर्थिक गतिविधियां कम हुई हैं, इसका एक अर्थ निकलता है कि जनता को रोजगार के मौके कम मिले हैं, यानी बेरोज़गारी का जो आंकड़ा इस समय समझा जा रहा है वह उससे कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है

Suvigya JainSuvigya Jain   20 May 2019 5:56 AM GMT

जीडीपी के आंकड़ों को लेकर मीडिया में बड़ी गंभीरता से हो रही हैं बातें

देश की माली हालत से देश के हर नागरिक का सरोकार होता है। जाहिर है गांव और किसान का भी उतना ही सरोकार है। अब ये अलग बात है कि गांव और किसान की गरीबी और बदहाली के कारण उन्हें देश की अर्थव्यवस्था के हाशिए पर डाल दिया गया हो, फिर भी लोकतांत्रिक देश होने के कारण गांव और किसानों को जोड़े रखना राजनीतिक मजबूरी है। वह इस कारण से क्योंकि देश में कुल मतदाताओं में आधी से ज्यादा संख्या गांव वालों की ही है। भले ही गांव के औसत व्यक्ति के लिए अर्थव्यवस्था और उसके पैमाने जीडीपी की बातें बहुत ही जटिल हों लेकिन उन्हें जानना समझना है बहुत जरूरी।

हाल ही में अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े पैमाने यानी सकल घरेलू उत्पाद के सही आकलन को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ गई है। मसला एनएसएसओ की एक नई रिपोर्ट से जुड़ा है। जीडीपी के आंकड़ों को लेकर मीडिया में बड़ी गंभीरता से बातें हो रहीं हैं। मामला यह है कि पिछले एक दशक से भारत में जिस पद्धति से जीडीपी का आकलन किया जा रहा था वह 2015 में बदल दिया गया और उसमें अब गड़बड़ी की शंका जताई जा रही है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर साभार: इंटरनेट

दरअसल नई सरकार आने के बाद जीडीपी निकालने की पद्धति में दो बदलाव किए गए थे। पहला यह कि आधार वर्ष 2004-2005 से बदल कर 2011-12 कर दिया गया। दूसरा बदलाव उत्पाद के दाम के आंकलन के बारे में है। यह इतना बड़ा बदलाव है कि जीडीपी के आंकड़े पर भारी असर डाल सकता है। दरअसल पहले की व्यवस्था में किसी उत्पाद की कीमत वह मानी जाती थी जिस कीमत पर उत्पादक अपना माल बेचता था। लेकिन नई व्यवस्था में उत्पाद की कीमत वह मानी जाने लगी जिस दाम पर उपभोक्ता कोई उत्पाद खरीदता है।

सब जानते हैं कि कारखाने या खेत से निकले उत्पाद की कीमत और उपभोक्ता के हाथ में पहुंचे उसी उत्पाद की कीमत में भारी अंतर होता है। हम कहते कितना भी रहें कि बाजार में बिचैलियों को कम करेंगे लेकिन यह हकीकत सभी जानते हैं कि उत्पादक स्थल से लेकर उपभोक्ता तक उत्पाद पहुंचने की प्रकिया में कई हस्तक्षेपक होते हैं। बेशक इन व्यापारियों की भी एक अनिवार्यता है। और इसीलिए कई चरणों में इनकी सेवाओं के कारण फैक्टरी और खेत से निकले माल की कीमत में बहुत भारी फर्क आ जाता है।


जाहिर है जीडीपी के आकलन के लिए अगर यह बदलाव हुआ तो इससे जीडीपी का आंकड़ा बहुत ज्यादा बढ़कर आना स्वाभाविक है। बहरहाल यह भी एक तथ्य है कि कई देशों में यह बदली हुई व्यवस्था ही चल रही है। इसलिए अपने देश में नई व्यवस्था के सही गलत असर का पता वक्त के साथ ही चल पाएगा।

नई सरकार ने यह बदलाव करने का भी फैसला किया था कि सकल घरेलू उत्पाद को मापने के लिए औपचारिक उद्योग जगत के और विस्तृत आंकड़े देखे जाएंगे। अब एनएसएसओ के नये सर्वेक्षण से यह निकल कर आया है कि सरकारी डेटाबेस यानी एमसीए 21 के तहत वर्गीकृत जिन कंपनियों के आधार पर नए तरीके से जीडीपी निकाली गई है उनमें से 38.7 फीसद कंपनियां या तो गायब पाई गईं या उन्हें गलत श्रेणी में वर्गीकृत पाया गया था।

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प्रतीकात्मक तस्वीर साभार: इंटरनेट

इसके अलावा 35,456 ऐसी इकाइयां चिन्हित हुईं जिन्हें ढूँढा नहीं जा सका। इसी के आधार पर यह अनुमान लगना शुरू हुआ कि अगर इन अदृश्य कंपनियों के आंकड़े जीडीपी के आकलन से हट जाएंगे तो भारत की आर्थिक वृद्धि दर भी कम निकल कर आएगी। वो भी सिर्फ अभी की ही नहीं बल्कि पद्धति बदले जाने के बाद के सभी वर्षों के जीडीपी आंकड़े कम हो जाएंगे।

हालांकि इस बात पर सरकार की तरफ से यह सफाई आई कि अगर जीडीपी के आंकड़ों में ऐसा कोई फर्क निकला भी तो वह नगण्य होगा। सरकार और सरकार समर्थकों का यह तर्क जानकारों को कच्चा लग रहा है। कुछ विशेषज्ञों को तो आंकड़ों का घपला तक लग रहा है। विवाद बढ़ने के बाद सरकार की तरफ से ताज़ा तर्क यह दिया जा रहा है कि सरकार ने केवाईसी के ज़रिए कई फर्जी कंपनियां पकड़ ली थीं और उन्हें सरकारी डेटाबेस से हटाया गया है। अगर इस तर्क को हूबहू मान भी लिया जाए। तब भी अब तक जो आर्थिक वृद्धि दर गलत आंकड़ों के आधार पर निकाल कर देश को बताई जाती रही उसकी ज़िम्मेदारी किसी को तो लेनी ही पड़ेगी।

कम वृद्धि दर के मायने

पिछले कुछ साल से भारत को विकास के पथ पर दौड़ता हुआ दिखाने की भरपूर कोशिश होती रही है। इसमें सबसे बड़ा आंकड़ा फ्रांस को पछाड़ कर भारत के दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने का है।


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इसी तरह नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद तीनों मुख्य क्षत्रों यानी मैन्युफैक्चरिंग, सर्विसेज और कृषि के अच्छे या बुरे प्रदर्शन का पैमाना भी हमने इन क्षत्रों की वृद्धि दर को ही बनाए रखा। इसी तरह कई वैश्विक रैंकिंग, उत्पादन बढ़ने के तर्क से रोज़गार सृजन के दावो पर सवाल उठा करते थे लेकिन वृद्धि दर बढ़ने के तर्क से उन सवालों कों दबा दिया जाता था। वे दावे अब फिर सवालों के घेरे में आ गए हैं।

अब चूंकि हम अपनी जीडीपी के आंकलन में गड़बड़ी देख रहे हैं। तो जीडीपी में यह कथित कमी कई क्षत्रों को प्रभावित करेगी। इनमें बड़ा सवाल महंगाई के आंकड़ों को लेकर भी उठता है। क्योंकि अर्थशास्त्र का नियम है कि अगर उत्पादन कम हुआ है तो बाज़ार में मांग बढ़ेगी जिससे हर हाल में महंगाई बढती है। तथ्य ही जब सवालों से घिर जाएं तो अब यह जनता की प्रतीति पर छोड़ देना चाहिए कि महंगाई का कितना असर महसूस किया गया और कितना नहीं?

गाँव और किसान के लिए इस बात के मायने

संबधित क्षेत्र के जानकार एक बात बखूबी समझते हैं कि ये ज़रूरी नहीं है कि भारत में आर्थिक वृद्धि ग्रामीण विकास की भी सूचक हो। यह सच्चाई किसी से छुपी नहीं है कि भारत में आर्थिक वृद्धि के आंकड़े पिछले कई दशक में कभी भी समावेशी नहीं रहे। आज कुल सकल घरेलू उत्पाद में गाँव के मुख्य व्यवसाय यानी कृषि का हिस्सा सिर्फ 15 फीसद है। सकल घरेलू उत्पाद के आंकलन में गड़बड़ी की बात से गाँव वालों की स्थिति पर कोई सीधा असर होता साबित नहीं किया जा सकता। क्योंकि जीडीपी में कृषि की भागीदारी तो उतनी की उतनी ही है। लेकिन यह साफ दिखाई दे रहा है कि इस क्षेत्र का संकट बड़ा होता जा रहा है। जब देश के आर्थिक हालात अच्छे बताये जाते हैं तब भी यह क्षेत्र मदद की गुहार लगा रहा होता है। और अगर माली हालत बिगड़ती हैं तब भी वह उचित मूल्य, अच्छे बाज़ार की चिंता में रहता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर साभार: इंटरनेट

आगे की चुनौती

अब देखने की बात यह होगी की अगले बजट में इस अनियमितता से कैसे निपटा जाएगा। क्या आर्थिक वृद्धि दर पिछले साल के मुकाबले कम होती दिखाई जाएगी। आने वाले समय में देश की आर्थिक व्यवस्था के सामने और भी चुनौतियाँ हैं। चुनाव से ठीक पहले इस साल के बजट में आयकर सीमा ढाई लाख से पांच लाख की जा चुकी है। उससे कर संग्रह में कमी तय है। इसके अलावा चुनाव से कुछ पहले ही किसानों को 500 रूपए महीना देने का काम भी शुरू हो चुका है।

इस खर्च को जुगाड़ने के लिए जीएसटी संग्रह का लक्ष्य बढ़ाने और सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बेचने के ज़रिए रकम जुटाने की बात कही गई थी। इन फैसलों का असर भी अगले बजट में दिखेगा। लेकिन फिलहाल अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से सोचने की बात यह है कि अगर सकल घरेलू उत्पाद कम रहा है तो इसका मतलब है कि कहीं न कहीं उत्पादन कम हुआ है।

देश में आर्थिक गतिविधियां कम हुई हैं। इसका एक अर्थ निकलता है कि जनता को रोजगार के मौके कम मिले हैं। यानी बेरोज़गारी का जो आंकड़ा इस समय समझा जा रहा है वह उससे कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है। बेरोजगारी को लेकर जिस तरह का असंतोष पिछले दिनों दिखाई दिया था वह गंभीर मसला था। उसे आर्थिक वृद्धि के आंकड़े दिखाकर नकार दिया गया था। लेकिन अब उससे भागने के लिए तर्क ढ़ूढ़ना मुश्किल हो जाएगा।



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फिर भी सरकार के लिए फौरी चिंता की बात नहीं

फौरी चिंता इसलिए नहीं क्योंकि हमारा देश अच्छा खासा बड़ा है। आबादी के लिहाज से दुनिया में दूसरे नबंर का सबसे बड़ा देश। अपने आकार के कारण हमारी अर्थव्यवस्था दौ सौ लाख करोड़ की कही जाती है। दो चार साल के लिए दस पंद्रह लाख करोड़ की ऊंच नीच अपना देश झेल सकता है। झेल सकता क्या बल्कि झेल ही रहा है। कर्ज बढ़ाते रहना एक विकल्प दिख ही रहा है।

पिछले पांच साल में कोई चैंतीस लाख करोड़ का कर्ज बढ़ ही चुका है। लेकिन कर्ज की एक सीमा होती है। उसके बाद और ज्यादा कर्ज लेकर घी पीने का दर्शन भी काम नहीं करता। इसीलिए जानकार और समझदार लोग बताते रहते हैं कि अभी फौरी तौर पर चिंता जरूर न दिखती हो लेकिन आने वाले समय में कहीं मुश्किल में न फंस़ जाएं। और अगर मुश्किल में पड़े तो सबसे पहले असर देश के उस तबके पर ही पड़ेगा जिसे इस समय अर्थव्यवस्था के हाशिए पर डाल कर रखा है यानी गांव और किसान पर।

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