जानवरों की दुनिया में ज्यादा आम है समलैंगिकता

"अगर सेक्स का मकसद वंश वृद्धि है तो जैव विकास की प्रक्रिया में यह गैर उत्पादक किस्म का सेक्स समाप्त क्यों नहीं हो गया?"

जानवरों की दुनिया में ज्यादा आम है समलैंगिकता

पक्षियों और पशुओं की 500 से ज्यादा प्रजातियों में समलैंगिकता के ढेरों उदाहरण देखे जा सकते हैं। मानव सभ्यता की शुरूआत से लगभग हर संस्कृति में समलैंगिकता की मौजूदगी देखी गई है। अगर सेक्स का मकसद वंश वृद्धि है तो जैव विकास की प्रक्रिया में यह गैर उत्पादक किस्म का सेक्स समाप्त क्यों नहीं हो गया?

समुद्री पक्षी लायसन एल्बाट्रॉस उम्र भर एक ही साथी के साथ रहने के लिए मशहूर हैं। लेकिन जीवविज्ञानियों ने पाया कि हवाई में इन पक्षियों की जनसंख्या में लगभग 60 प्रतिशत पक्षी मादा हैं। इसलिए प्रजनन के मौसम में 30 प्रतिशत जोड़े मादा-मादा पक्षियों के होते हैं।


नर पक्षियों की कमी की वजह से बहुत से मादा पक्षियों को प्रजनन का मौका नहीं मिल पाता। एक मादा एल्बाट्रॉस पक्षी साल में एक ही बार अंडा देती है और इसे सेने के लिए कम से कम दो पक्षियों की जरूरत पड़ती है। इसलिए कुछ मादा पक्षी एक वैकल्पिक रणनीति का इस्तेमाल करते हैं। वे चुपचाप उन नर पक्षियों से मिलन कर लेते हैं जिनकी पहले से मादा पक्षियों के साथ जोड़ी बनी होती है। मिलन करने के बाद ये मादा पक्षी अपनी मादा जोड़ीदार के साथ मिलकर अंडे सेने का काम करती हैं।

एल्बाट्रॉस के ये समलैंगिक जोड़े ठीक नर-मादा जोड़ों जैसी प्रणयलीला करते हैं: एक-दूसरे की गर्दन रगड़ना, एक-दूसरे की चोंच को चूमना यहां तक कि एक-दूसरे पर सवार होना भी। 2007 में ब्रेंडा जुआन नाम की एक जीवविज्ञानी ने एल्बाट्रॉस की एक ऐसी समलैंगिक जोड़ी का उल्लेख किया था जिनका साथ 19 साल तक चला।

तब क्या समलैंगिक बर्ताव महज विपरीत लिंग वाले साथी की कमी की पूर्ति के लिए होता है?

यह भी देखें: क्या जानवर भी इंसानों की तरह रेप करते हैं?

जीवविज्ञानियों का अनुमान है कि जब एल्बाट्रॉस पक्षियों में नर-मादा का अनुपात बराबर का होता है तब भी उनमें समलैंगिक जोड़ियां पाई जाती हैं। अपनी ख्याति के मुताबिक ये जीवन भर एक ही जोड़ी बनाते हैं भले ही वह समलैंगिक क्यों न हो।

नर डॉलफिन भी इसी तरह के समलैंगिक संबंधों वाले समूह बनाते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है इससे उनके आपसी संबंध और मजबूत होते हैं और मादा डॉलफिनों तक उनकी पहुंच आसान हो जाती है।

भेड़ पालने वाले बताते हैं कि उनके करीब 8 फीसदी नर भेड़ समलैंगिक होते हैं और मादा भेड़ों के साथ संबंध बनाने से इनकार तक कर देते हैं। जीवशास्त्रीय नजरिए से देखा गया तो पाया गया कि इन नर भेड़ों के दिमाग का एक हिस्सा हाइपोथैलेमस छोटा होता है। उनके दिमाग का यही हिस्सा सेक्स संबंधी उनकी इच्छाओं को नियंत्रित करता है।

यह भी देखें: चूहे पकड़ने की कला और उसमें माहिर ये आदिवासी शिकारी

हालांकि फल मक्खी में समलैंगिकता आनुवंशिक प्रतीत होती है, लेकिन अभी तक स्तनपायी जीवों में समलैंगिकता को निर्धारित करने वाला कोई जीन नहीं मिला है। दिलचस्प तौर पर इंसानों के जुड़वां बच्चों में जेनेटिक मैटीरियल तो समान होता है इसके बावजूद यह जरूरी नहीं है कि सेक्स के बारे में उनकी मान्यताएं भी समान हों।


कुछ वैज्ञानिकों का कहना है चूंकि समलैंगिकता पीढ़ी-दर-पीढ़ी पाई जाती है इसलिए निश्चित तौर पर इसका कोई आनुवंशिक आधार होना चाहिए। विषमलिंगी पुरुषों की तुलना में समलैंगिक पुरुषों के कई पुरुष रिश्तेदार भी समलैंगिक होते हैं। हालांकि, महिला समलैंगिकों के मामले में यह बात सही नहीं बैठती।

इटली में हुए एक अध्ययन के मुताबिक समलैंगिक पुरुषों की माओं, चाचियों और दादी-नानियों की अधिक संतानें होती हैं। सामोआ द्वीप के फाफाफाइन परिवारों में भी यही देखा गया। ऐसा लगता है कि जिस कारक की वजह से महिलाओं ने ज्यादा संतानों को जन्म दिया उसी ने उनके कुछ बेटों की सेक्स के मामले में पसंद को बदल दिया।

यह भी देखें: आखिर तेंदुए क्यों बन जाते हैं आदमखोर?

दिसंबर 2012 में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया के विकासवादी जीवविज्ञानी विलियम राइस ने एक थ्योरी पेश की। इसके मुताबिक, हमारे आनुवंशिक पदार्थ में डीएनए के अलावा कुछ ऐसे ऑन-ऑफ स्विच होते हैं जो समलैंगिकता के लिए जिम्मेदार हैं। इन्हें एपीजिनेटिक मार्कर कहते हैं। ये जिंदगी भर तय करते हैं कि कैसे, कब और कौन से जीन्स वातावरण से प्रभावित होकर सक्रिय हो जाएं। गर्भ में यही मार्कर बालक शिशुओं को पुरुष हार्मोन टेस्टोस्टेरॉन की कमी और कन्या शिशुओं को टेस्टोस्टेरॉन की अधिकता से बचाते हैं।

आमतौर पर ये मार्कर आनुवंशिक नहीं होते लेकिन कभी-कभी ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंच जाते हैं। ऐसी स्थिति में लड़कियों में उनके पिताओं के गुण आ जाते हैं और वे मर्दाना हो जाती हैं वहीं लड़कों में उनकी माओं के गुण आ जाते हैँ और उनमें स्त्रियों सरीखे लक्षण आ जाते हैं।

कुछ वैज्ञानिक इस सोच में पड़ जाते हैं कि क्या समलैंगिकता किसी मकसद को पूरा करती है। हो सकता है कि यह किसी फायदेमंद अनुकूलन के साथ जुड़कर बार-बार पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती जाती हो।

इस तरह यह तो पता चलता है कि समलैंगिकता विभिन्न जीवों में पाई जाती है लेकिन इसकी कोई एक वजह है यह दावे से नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि यह कुछ लोगों के लिए साथी की कमी की भरपाई का साधन हो, या पुरुषों के बीच दोस्ताना बर्ताव हो या फिर किसी जेनेटिक साइड इफेक्ट का नतीजा हो।

यह भी देखें: "जब सभी सांप चूहे खाते हैं तो कुछ सांप जहरीले क्यों होते हैं?"

समलैंगिकता से जुड़े सवालों को जवाब देने के हमारे प्रयास मुख्यत: समान लैंगिक संबंधों की निरर्थकता में ही उलझ कर रह जाते हैं। लेकिन यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि जरूरी नहीं सभी सेक्स क्रियाएं बच्चे पैदा करने के लिए ही की जाएं। चूंकि सेक्स भी सुख का एक जरिया है इस लिहाज से समलैंगिकता विषमलैंगिकता से किसी मायने में अलग नहीं है। मेरे ख्याल से यही इसका जवाब भी है।

जानकी लेनिन एक लेखक, फिल्ममेकर और पर्यावरण प्रेमी हैं। इस कॉलम में वह अपने पति मशहूर सर्प-विशेषज्ञ रोमुलस व्हिटकर और जीव जंतुओं के बहाने पर्यावरण के अनोखे पहलुओं की चर्चा करेंगी।

'मैं एक सेक्स वर्कर हूं, ये बात सिर्फ अपनी बेटी को बताई है ताकि...'

Share it
Top