अब लद्दाख घूमने जाएं तो याद रखें आप एक रेगिस्तान में आए हैँ, पानी सहेजें

लद्दाख के संकट के पीछे भी वही कारण जिम्मेदार हैं जो शिमला के लिए मुसीबत की वजह बने थे। ये कारण हैं पर्यटकों की बाढ़, गेस्ट हाउसों की तादाद में बेरोकटोक बढ़ोतरी और जल संसाधनों का दुरुपयोग।

अब लद्दाख घूमने जाएं तो याद रखें आप एक रेगिस्तान में आए हैँ, पानी सहेजें

आधुनिक दुनिया की आपाधापी से दूर स्वर्ग सरीखी छवि वाले लद्दाख को भी आधुनिक दुनिया का रोग लग गया है। इस खूबसूरत इलाके में पानी की कमी का संकट सर उठाने लगा है। इसी महीने से इस प्रांत के सबसे बड़े शहर लेह में पानी की कटौती शुरू हो गई है। अब यहां सिर्फ सुबह और शाम पानी की सप्लाई होती है वह भी महज दो-दो घंटे के लिए। लद्दाख के दूसरे इलाकों की हालत भी अच्छी नहीं है।

महीने भर पहले हिमाचल की राजधानी शिमला भी पानी के संकट से गुजर रही थी। लोगों का कहना है कि अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए तो वह दिन दूर नहीं जब लद्दाख में भी शिमला जैसे हालात हो जाएंगे। कमोबेश लद्दाख के संकट के पीछे भी वही कारण जिम्मेदार हैं जो शिमला के लिए मुसीबत की वजह बने थे। ये कारण हैं पर्यटकों की बाढ़, गेस्ट हाउसों की तादाद में बेरोकटोक बढ़ोतरी और जल संसाधनों का दुरुपयोग।

2017 में लद्दाख में रेकॉर्ड 2.77 लाख टूरिस्ट आए, खुद लद्दाख की आबादी 2.74 लाख है।

स्थानीय जनता से ज्यादा है पर्यटकों की संख्या

1974 में लद्दाख को टूरिस्टों के लिए खोला गया था उस बरस कुल 527 पर्यटक आए थे। 2017 में लद्दाख में रेकॉर्ड 2.77 लाख टूरिस्ट आए, जबकि खुद लद्दाख की आबादी 2.74 लाख है। 2016 में 2.3 लाख टूरिस्ट आए थे। 2016 में ही रेकॉर्ड कम बारिश हुई थी, महज 20.9 मिलीमीटर, जबकि लद्दाख का सालाना औसत 100 मिलीमीटर बारिश का है।

लद्दाख में टूरिस्टों की तादाद बढ़ती गई और बारिश जो बर्फ के रूप में होती थी कम होती गई। 2013 से 2017 के बीच यानि चार साल लगातार 50 से 80 पर्सेंट कम बारिश हुई। इतनी बारिश स्थानीय जनता और पर्यटकों की बड़ी तादाद के लिए पर्याप्त नहीं है, जबकि पर्यटक पानी ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। लद्दाख इकोलॉजिकल डिवेलपमेंट ग्रुप नाम के एक एनजीओ की स्टडी के मुताबिक, लद्दाख का एक औसत नागरिक गर्मियों के सीजन में हर रोज 21 लीटर और सर्दियों में 10 से 12 लीटर पानी इस्तेमाल करता है, वहीं एक टूरिस्ट को 75 लीटर पानी की जरूरत होती है।

हर साल बढ़ रहे हैं गेस्ट हाउस

जम्मू-कश्मीर के टूरिज्म विभाग के डिप्टी डायरेक्टर सेरिंग एंगमो का कहना है, "हर साल 25-30 नए गेस्ट हाउसों का पंजीकरण होता है। नवंबर 2017 तक लद्दाख में 826 गेस्ट हाउस थे। इनमें 13,732 बेड थे। ये तो हैं आधिकारिक आंकड़े पर बहुत बड़ी तादाद ऐसे गेस्ट हाउस भी हैं जो रजिस्टर्ड नहीं हैं। हर बेड पर दो लोगों के हिसाब से अंदाजा लगाएं कि अगर किसी दिन सभी रजिस्टर्ड गेस्ट हाउस फुल हों तो लद्दाख को लगभग 20,59,800 लीटर अतिरिक्त पानी की जरूरत होगी।"

लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद के कार्यकारी पार्षद सेरिंग सैंडअप ने बताया," 2005 से पहले लद्दाख में मुख्यत: विदशी टूरिस्ट ही आते थे। उनकी तादाद हर साल 23 से 30 हजार के आसपास रहती थी। पर इसके बाद बड़ी संख्या में घरेलू पर्यटक आने लगे। 2015 से 2017 के बीच घरेलू टूरिस्ट 43 पर्सेँट और विदशी टूरिस्ट 28 पर्सेंट बढ़े।"

स्थानीय जल संसाधनों का दुरुपयोग

पानी की बढ़ती मांग और सार्वजनिक नलकों के सूखने के बाद स्थानीय लोग बोरवेल खुदवाने लगे हें। लद्दाख इकोलॉजिकल डवलपमेंट ग्रुप के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नॉर्डन ओत्जर का कहना है, "लगभग हर घर, होटल, गेस्ट हाउस ने अपना निजी बोरवैल खुदवा रखे हैं, इन पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। लेह में बहने वाले सारे झरने सूख चुके हैं मेरे ख्याल से यह भूजल के हद से ज्यादा दोहन की वजह से हुआ है। सवाल महज बोरवैल की संख्या नियंत्रित करने का नहीं बल्कि इनसे कितना पानी निकाला जाए इसका है।"

कुछ समय पहले हिमाचल की राजधानी शिमला भी पानी के संकट से गुजर रही थी।

बढ़ते टूरिस्टों का असर, स्थानीय जनता ने बदले तौर तरीके

सेरिंग सैंडअप का मानना है कि अब स्थानीय जनता भी पहले से ज्यादा पानी का इस्तेमाल करने लगी है। वह कहते हैं, "मौसम गर्म होता जा रहा है इसकी वजह से लोग ज्यादा बार नहाने लगे हैं।" सैंडअप गलत नहीं हैं, 1973 से 2008 के बीच लद्दाख का तापमान 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है, जबकि पूरे देश में यह बढ़ोतरी महज 1 डिग्री की हुई है। इसकी पुष्टि इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरू की जयारमन श्रीनिवासन ने भी की है।

लेकिन पानी इस्तेमाल करने की आदतों में आए इस बदलाव के लिए केवल मौसम ही जिम्मेदार नहीं है। नॉर्डन ओत्जर कहते हैं,"स्थानीय लोग पर्यटकों की कुछ आदतों को अपना रहे हैं। हमने देखा है कि कुछ इलाकों में जहां पानी की नियमित सप्लाई है वहां के रहने वालों ने घरेलू कामकाज, साफ-सफाई के लिए आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।"

ऐसा अनुमान है कि लेह पानी के लिए जिस ग्लेशियर पर निर्भर है वह अगले पांच-छह साल में पूरी तरह पिघल जाएगा, 2019 तक पानी की डिमांड बढ़कर 60 लाख लीटर हो जाएगी वहीं बारिश की मात्रा भी कम होती जाएगी। ऐसे में जरूरी है कि जो लोग लद्दाख घूमने जाएं वे जिम्मेदाराना बर्ताव करें और पानी का कम इस्तेमाल करें। वे इतना तो कर ही सकते हैं कि उन्हीं गेस्ट हाउस या होटलों में रहें जहां पारंपरिक लद्दाखी कॉम्पोस्ट टॉयलेट हो, नहाने में शॉवर का इस्तेमाल कम करें और जब करें तो कम देर के लिए ही। याद रखें कि आप एक रेगिस्तान में आए हैं।

(इस लेख के लेखक शुभोजीत गोस्वामी हैं, यह लेख मूलरूप से डाउन टू अर्थ में प्रकाशित हुआ था।)

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