आरक्षण में खोट नहीं, उसे लागू करने में खोट है

अम्बेडकर का प्रावधान पर्याप्त था क्योंकि दलितों को संसद या विधान भवन में जाने के लिए कोई डिग्री, कोई योग्यता या क्षमता की आवश्यकता नहीं थी, उनमें आत्मविश्वास पैदा करने का प्रयास तक नहीं किया गया।

आरक्षण में खोट नहीं, उसे लागू करने में खोट है

संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने दलितों के लिए 10 साल यानी 1960 तक आरक्षण का प्रावधान किया था। बाद के नेता उनके सुझाव दरकिनार करके आज तक इसे बढ़ाते गए। अम्बेडकर का प्रावधान पर्याप्त था क्योंकि दलितों को संसद या विधान भवन में जाने के लिए कोई डिग्री, कोई योग्यता या क्षमता की आवश्यकता नहीं थी, उनमें आत्मविश्वास पैदा करने का प्रयास तक नहीं किया गया।

उच्चतम न्यायालय ने अन्य पिछड़ी जातियों के मामले में आरक्षण व्यवस्था में सुधार करने का प्रयास किया और आर्थिक रूप से क्रीमी परत के लिए आरक्षण बन्द करने का निर्णय लिया। लेकिन जातीय आरक्षण में संशोधन के लिए सेकुलर पैमाना कभी सार्थक नहीं हो सकता। इसके लिए क्रीमी जातियों की पहचान करनी होगी यानी जो हुकूमत करती है और जिनके हाथ में खजाने की चाभी है।

आजादी के बाद बड़े पैमाने पर सत्ता हस्तांतरण यानी पावर शिफ्ट हुआ है। पहले केन्द्र और देश के अधिकांश प्रदेशों में सवर्णों की हुकूमत और उन्हीं के पास खजाने की चाभी हुआ करती थी। अब तो केन्द्र और प्रदेशों की हुकूमत दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों के हाथ में हैं, इसलिए उनके साथ किसी प्रकार के भेदभाव की गुंजाइश नहीं। देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव, राम नरेश यादव, कल्याण सिंह और अखिलेश यादव के नाम ध्यान में आते हैं। बिहार में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार, मध्य प्रदेश में उमा भारती और शिवराज सिंह चौहान, गुजरात में शंकर सिंह बाघेला, नरेन्द्र भाई मोदी और आनन्दी बेन पटेल की हुकूमत रही है, देश के दूसरे भागों में भी कमोवेश यही हाल है।

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उत्तर भारत में यादव और कुर्मी, आंध्र में रेड्डी, पश्चिमी भारत में जाट और गूजर, कर्नाटक में वोक्कलिंगा, गुजरात में पटेल जैसी जातियों को क्रीमी जातियों की श्रेणी में गिनना चाहिए और उन्हें आरक्षण सूची से बाहर करना चाहिए अन्यथा अति पिछड़े कभी कुछ नहीं पाएंगे। वास्तव में आरक्षण में खोट नही हैं उसे लागू करने में खोट है और उसकी जड़ में हैं वोट बैंक की राजनीति। आरक्षण का बंदर बांट हो रहा है, सम्पन्न को और बनाया जा रहा है। जिन्हें एक बार आरक्षण मिल चुका है, उन्हें ही बार-बार मिल रहा है।

जब प्रखर बुद्धि वाले बेरोजगारी के कारण अपराधी बन जाएंगे तो पकड़ पाना भी कठिन होगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने आन्दोलित मेधावी छात्रों को पेट्रोल पम्प, मिट्टी तेल बेचने का परमिट का वचन दिया था। इससे दुखद क्या हो सकता है कि जो विद्यार्थी रिसर्च और आविष्कार कर सकते हैं, उन्हें तेल बेचने के लिए कहा जाए। यदि आरक्षण व्यवस्था को लागू करने का ढंग न बदला गया तो दलितों और पिछड़ों का विकास तो होगा ही नहीं, दूसरे वर्गों में असन्तेाष बढ़ता जाएगा।

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अनुसूचित जाति का आनुपातिक प्रतिनिधित्व इसलिए पूरा नहीं हो रहा है कि ग्रामीण दलितों के हिस्से की नौकरियां शहर के मुट्ठी भर दलित बटोर रहे हैं। गाँव के दलित नरेगा में फावड़ा चला रहे हैं। दलितों में जो सम्पन्न, शिक्षित और नौकरी पेशा हैं, उन्हें प्रोन्नति में आरक्षण की चिन्ता है, परन्तु गाँव के गरीब अनुसूचित अशिक्षा के कारण नौकरी के दावेदार ही नहीं बन पाते तो प्रमोशन की क्या सोचें। समाज की गैरबराबरी तभी समाप्त होगी जब शहर और गाँव की गैरबराबरी मिटेगी। इसके लिए गाँवों को 70 प्रतिशत आरक्षण देना होगा, भले ही उस आरक्षण को जातीय आधार पर विभाजित कर दिया जाए। बिना प्रयास ही जातीय कोटा पूरा हो जायगा।

कुछ दिन पहले इंग्लैण्ड की संसद ने इस आशय का एक प्रस्ताव पारित किया कि जातिभेद वैसा ही पूर्वाग्रह पैदा करता है जैसा रंगभेद या नस्लभेद। अर्थात जातीय पूर्वाग्रह स्थानीय समस्या नहीं है, बल्कि अब अन्तर्राष्ट्रीय पटल पर आ गई है। भारतीय लोगों और सरकार को इंग्लैण्ड की संसद का यह प्रस्ताव बुरा लगा क्योंकि हम कहते रहे हैं कि जातिभेद केवल भारत की स्थानीय समस्या है।

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मुझे याद है कनाडा में निउफाउन्डलैंड की मेमोरियल यूनिवर्सिटी में भौतिक विज्ञान के एक एसपी रेड्डी, असोशिएट प्रोफेसर और उसी विभाग में डॉ. रिच्छैया शोधकर्ता थे। रेड्डी और रिच्छैया दोनों ही आन्ध्र प्रदेश के थे और यह बात 1966-67 की है, जब मैं भूविज्ञान विभाग में शोध छात्र था और फ्रेंड्स आफ़ इंडिया एसोसिएशन का सचिव था। एक बार रिच्छैया ने रेड्डी की शिकायत साइंस के डीन से यह कह कर किया कि अनुसूचित जाति का होने के नाते उनका अपमान किया गया है। इस तरह कनैडियन डीन को पता चला कि जातीय आधार पर कितना भेदभाव है भारत में।

प्रतिभा आरक्षण की मोहताज नहीं । वाल्मीकि, कबीर, रविदास, तुकाराम, अम्बेदकर, कर्पूरी ठाकुर, जगजीवनराम, वल्लभभाई पटेल जैसे हजारों लोगों की जाति कोई नहीं पूछता। उनके समय में आरक्षण की सोच नहीं थी जिसने जातीय भेदभाव की दीवार खड़ी कर दी है। भारत की विभिन्न जातियों में जातीय भेदभाव तब तक नहीं जाएगा, जब तक सहज भाव से हुक्का पानी का सम्बन्ध कायम नहीं होगा। यह सम्बन्ध तब तक नहीं बनेगा, जब तक जातीय आधार पर पूर्वाग्रह बने रहेंगे। राजनेता जातियों को गोलबन्द करके इन दीवारों को मजबूत कर रहे हैं।

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यदि आरक्षण व्यवस्था अम्बेडकर के अनुसार अनुसूचित जातियों तक सीमित रहती तो भी ठीक था। परन्तु वोट की राजनीति के कारण 1992 में तथाकथित पिछड़ी जातियों के लिए भी आरक्षण का प्रावधान लागू हुआ। परिणामतः कृष्ण के वंशजों को आरक्षण मिल गया और सुदामा के वंशज भीख मांगते रहेंगे। राजनीति करने वालों ने सच्चर कमीशन बिठा दिया। यह कमीशन उस वर्ग के लिए बिठाया गया, जिसने भारत पर 1000 साल तक हुकूमत की थी। माननीय उच्चतम न्यायालय ने हस्तक्षेप करके देश को बचा लिया। स्वार्थी नेता यह जानते हैं कि मुस्लिम समाज के साथ इस देश में कभी भेदभाव नहीं हुआ, उनका कभी हक नहीं छीना गया, उन्हें शिक्षा से वंचित नहीं किया गया फिर भी हथकंडे खेलते रहते हैं। आशा की जानी चाहिए कि आरक्षण व्यवस्था की सम्यक समीक्षा होगी और देशहित में निर्णय लिया जाएगा।

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