एमएसपी में 'शानदार बढ़ोतरी' के बावजूद नाखुश क्यों हैं किसान

वास्तविकता यह है कि कोरोना काल में सबसे मददगार रहे किसानों के लिए ठोस रणनीति नहीं बनाने से उनकी खेती की लागत बढ़ी है जबकि दाम नहीं मिल रहा। बीते एक साल में अकेले पेट्रोल 33 फीसदी तो डीजल का दाम 23 फीसदी बढ़ गया है।

Arvind Kumar SinghArvind Kumar Singh   10 Jun 2021 7:10 AM GMT

एमएसपी में शानदार बढ़ोतरी के बावजूद नाखुश क्यों हैं किसान

खेती के काम आनेवाली सभी जरूरी चीजों के दाम बढ़े हैं। फिर ऐसी एमएसपी से किसान कैसे जिंदा रहेगा और कैसे 2022 तक उसकी आय दोगुनी होगी औऱ खेती का कायाकल्प होगा। फोटो: गाँव कनेक्शन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने 2021-22 के लिए खरीफ फसलों के एमएसपी में शानदार बढोत्तरी का जो दावा किया है वह किसानों के गले नहीं उतर रहा है। दावा लाभकारी मूल्य का है और इससे फसल विविधीकरण की परिकल्पना भी की जा रही है। लेकिन किसान संगठन इसे झांसा बताते हुए मांग कर रहे हैं कि अगर सरकार की मंशा ठीक है तो वह एमएसपी A2+FL पर नहीं बल्कि C2+50 पर तय करे और खरीद का इंतजाम भी करे। आम बजट 2021-22 के बाद आंदोलित किसान इसे दूसरा झटका मान रहे हैं।

भारत सरकार ने सामान्य धान का एमएसपी 1868 रुपये प्रति कुंतल से बढ़ाकर 1940 और ए ग्रेड का 1960 रुपए किया है। अगर डीजल, खाद, बीज की महंगाई को जोड़ लें तो दोनों श्रेणी में 72 रुपये की यह बढोत्तरी 50 फीसदी की जगह केवल चार फीसदी बैठती है। पिछले सीजन की तुलना में मक्का पर केवल 20 रुपये, सोयाबीन पर 70 रुपये, मूंग पर 79 रुपए और रागी पर 82 रुपये की बढोत्तरी की गयी है। सबसे अधिक बढोत्तरी 452 रुपये तिल पर हो जो करीब 6.6 फीसदी बैठता है वहीं उड़द और अरहर का एमएसपी 300-300 रुपये पांच फीसदी बढ़ोतरी वाला है, न कि सरकारी दावे के हिसाब से 65 फीसदी या 62 फीसदी। मूंगफली पर 275 रुपये बढ़े हैं। मध्यम रेशे के कपास पर 211 रुपए और लंबे रेशे वाली कपास पर कुल 200 रुपये की बढोत्तरी हुई है। सरकारी दावा है कि निवल बढोत्तरी 50 फीसदी से अधिक है और बाजरा के मामले में तो 85 फीसदी तक है।

मध्य प्रदेश में मंदसौर कांड के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने 11 जून 2017 को 28 घंटे तक उपवास रखा था और फिर दावा किया राज्य में अब एमएसपी से कम पर अनाज खरीदना अपराध माना जाएगा और सरकार इसके लिए नियम बनाएगी। लेकिन उसी राज्य से आने वाले केंद्रीय कृषि मंत्री इस मुद्दे पर अलग लाइन लिए हुए हैं।

असिंचित इलाकों का दर्द अलग है क्योकि सबसे अधिक फसलों की खरीद सिंचित इलाके में होती है। सभी फोटो: पिक्साबे

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वास्तविकता यह है कि कोरोना काल में सबसे मददगार रहे किसानों के लिए ठोस रणनीति नहीं बनाने से उनकी खेती की लागत बढ़ी है जबकि दाम नहीं मिल रहा। बीते एक साल में अकेले पेट्रोल 33 फीसदी तो डीजल का दाम 23 फीसदी बढ़ गया है। राजस्थान के सबसे कृषि प्रधान जिले श्रीगंगानगर में किसानों को एक लीटर डीजल करीब सौ रुपए में मिल रहा है। खेती के काम आनेवाली सभी जरूरी चीजों के दाम बढ़े हैं। फिर ऐसी एमएसपी से किसान कैसे जिंदा रहेगा और कैसे 2022 तक उसकी आय दोगुनी होगी औऱ खेती का कायाकल्प होगा।

दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलनरत संयुक्त किसान मोर्चा ने इस वृद्धि पर असंतोष जताया है। भाकियू नेता राकेश टिकैत का कहना है कि यह बढ़ी महंगाई की भरपाई भी नहीं करता। सरकार अगर दालों और दूसरे कई फसलों की खरीद ही नहीं करती या नाममात्र खरीद होती है तो फिर उनका एमएसपी घोषित करने का तुक ही क्या है। किसान महापंचायत के अध्यक्ष रामपाल जाट का कहना है कि अभी भी किसान षित एमएसपी से 500 रुपए कुंतल कम में चना बेचने को विवश हैं। अरहर,मूंग उड़द का भी यही हाल और सरकार ने दालों के आयात से प्रतिबंध हटा दिया जिससे उनके दाम 1500 रुपए कुंतल तक गिर गए। राजस्थान में देश की 47 फीसदी मूंग पैदा होती है लेकिन अधिकतर किसान औने पौने दामों पर बेच रहे हैं। क्योंकि भारत सरकार ने एमएसपी होते हुए भी दलहन और तिलहन की 75 फीसदी उपज को खरीद की परिधि के दायरे से बाहर किया हुआ है। राजस्थान के किसान सबसे अधिक बाजरा पैदा करते हैं लेकिन औने पौने दानों पर बेचने को मजबूर हैं।

भारत के समग्र कृषि परिवेश को देखें तो देश में 10 शीर्षस्थ फसलों में गन्ना, धान, गेहूं, आलू, मक्का, प्याज, टमाटर, चना, सोयाबीन और बाजरा आता है। लेकिन एमएसपी पर धान 23 राज्यों में और गेहूं 10 राज्यों में खरीदा जाता है। बाकी फसलें भगवान भरोसे हैं। बीते साल बिहार औऱ उत्तर प्रदेश में काफी संख्या में किसानों को एक हजार से 1200 रुपए में धान बेचना प़ड़ा। आंध्र प्रदेश में धान किसानों की समस्याओं को लेकर उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडु को 2 मार्च 2020 को सरकार से हस्तक्षेप करना पड़ा था।

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खऱीफ विपणन सीजन 2021-22 के लिए घोषित एमएसपी। ग्राफ- गांव कनेक्शन

सरकारी खरीद से लाभान्वित किसानों के आंकड़े भी चिंताजनक ही हैं। 2019-20 में एमएसपी पर सबसे अधिक करीब 1.24 करोड़ किसानों से धान औऱ 35.57 लाख किसानों से गेहूं खरीदा गया। जिस देश में 14.50 करोड़ से अधिक किसान हों वहां सरकारी खरीद से कपास के 21.50 लाख किसान, दलहन के 11 लाख किसान और जूट के महज 3744 किसानों को लाभ पहुंचा तो इसे क्या माना जाये। उत्तर प्रदेश में 2020-21 में धान खरीदी 10.22 लाख किसानों से हुई। यहां इतनी विशाल कृषक आबादी में से 10 लाख किसानों का आंकड़ा केवल 2017-18 के गेहूं खरीद के दौरान पार हुआ था बाकी खरीद इससे कम किसानों से हुई। सरकार रबी और खरीफ के 22 फसलों की एमएसपी घोषित करती है लेकिन अपने तीन चौथाई उत्पादों को किसान घाटे में बेचने को विवश हैं।

सरकारी दावा है कि वह 2018-19 से एमएसपी को लेकर स्वामिनाथन आयोग की सिफारिश के तहत मांग को मान कर दाम तय कर रही है। लेकिन हकीकत यह है कि सबसे अधिक धान और गेहूं खरीद ही होती है यही खाद्य सुरक्षा देता है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत नवंबर 2021 तक देश में 80 करोड़ लोगों को हर महीने मुफ्त खाद्यान्न मिलने की घोषणा प्रधानमंत्री ने हाल में की है। इसमें भारत सरकार खाद्य सब्सिडी, अंतर-राज्यीय परिवहन लगात और डीलरों का कमीशन और अतिरिक्त कमीशन वहन कर रही है। लेकिन यह सब जिनके श्रम से चल रहा है वे किसान ठगे खड़े हैं।

एमएसपी घोषणा के साथ किसान संगठनों ने इसकी खरीद गारंटी का कानून बनाने की मांग को दोहराया है और मांग की है कि तीनों कृषि कानूनों को रद्द किया जाये। किसान आंदोलन को करीब 200 दिन होने को आए हैं औऱ 502 किसानों ने प्राणों की आहुति दे दी है लेकिन किसानों की मांगों पर सरकार मौन है। आंदोलित किसानों में सबसे अधिक संख्या देश के अन्न भंडार में योगदान देने वाले पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों की है। यह अलग बात है कि यह आंदोलन का असर ही है कि खरीफ और रबी दोनों में सरकार को अधिक खरीद करनी पड़ी है और वह रोज खरीद के आंकड़े भी जारी कर रही है।

खरीफ और रबी विपणन सत्र 2020-21 में एमएसपी पर 816.65 लाख टन से अधिक धान खरीदी हुई। इसमें 1.20 करोड़ से अधिक किसानों तक 1,54,184 करोड़ रुपए की राशि पहुंची। सरकारी एजेंसियों ने 7.80 लाख टन दलहन और तिलहन ख़रीदी भी की। 8 जून 2021 तक गेहूं की खरीद 418.47 लाख टन हुई जो पिछले साल हुई जिससे 46 लाख किसानों को 82,648.38 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ। उत्तर प्रदेश से 47.16 लाख टन गेहूं खरीदा गया जबकि पंजाब से सबसे अधिक 132 लाख टन से अधिक।

लेकिन यह बात किसी से छिपी नहीं है कि कोरोना संकट में सबसे अधिक तबाही किसानों की हुई है। अन्न ही नहीं सब्जी और बागवानी उत्पादक सभी किसान परेशान हैं। औने पौने दामों पर उत्पादों की खरीद हो रही है और उपभोक्ताओं को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। सरसों का किसानों को क्या भाव मिला था और सरसों का तेल आसमान छू गया। मतलब बिचौलिया तंत्र सबसे फायदे में है। थोक मंडियों में कृषि उपज के मूल्यो में लगातार गिरावट का फायदा उपभोक्ताओं को नहीं कारोबारियों को हुआ है। कृषि उत्पादों का कारोबार करीब 25 लाख करोड़ रुपए का है। किसान ही नहीं आम उपभोक्ता चिंतित हैं कि अगर यह चंद बड़े कारोबारियों तक सिमट गए तो क्या हालत होगी।

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर वकालत कर रहे हैं कि गेहूं और धान की खेती के बजाय किसान दलहन और तिलहन की खेती की ओर अग्रसर हों। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का गन्ना किसान हो या फिर मालवा का सोयाबीन किसान, विदर्भ का कपास किसान हो या केरल का रबड़ और पश्चिम बंगाल का जूट किसान सभी वाजिब दाम न मिलने की शिकायत कर रहे हैं। आलू, प्याज और टमाटर का हाल तो सबको पता है। किसान कम पैदा करें तो मुसीबत और अधिक पैदा करें तो अधिक मुसीबत।

एमएसपी से चंद फसलो में किसानों को कुछ फायदा पहुंचा लेकिन जो फसलें एमएसपी के दायरे में नहीं उसके किसान भारी अनिश्चितता के शिकार है। उसमें भी 85 फीसदी छोटे किसानों की दशा सबसे खराब है जिनके पास आधा हैक्टेयर से कम कृषि भूमि है और इसमें वे सब्जी भी उगाएं तो भी गुजारा कठिन है। कृषि लागत और मूल्य आयोग की सिफारिशों पर भारत सरकार जिन 22 फसलों की एमएएसपी घोषित करती है, उसके लिए उसका दावा है कि इसके तहत कवर की गयी फसलों का योगदान करीब 60 फीसदी है। लेकिन उऩकी खरीद कितनी होती है। औऱ शेष 40 फीसदी फसलों जिनमें बागवानी उत्पाद भी हैं, उनकी क्या दशा है।

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असिंचित इलाकों का दर्द अलग है क्योकि सबसे अधिक फसलों की खरीद सिंचित इलाके में होती है। हमारा करीब 60 फीसदी मानसून पर निर्भर इलाका कुल खाद्य उत्पादन में 40 फीसदी योगदान देता है। इसी इलाके में 88 फीसदी मोटा अनाज, 87 फीसदी दलहन, 48 फीसदी चावल और 28 फीसदी कपास पैदा होता है। लेकिन सरकारी खरीद औऱ सब्सिडी का अधिकतम लाभ सिंचित इलाकों को मिलता है। इस नाते वहां के किसानो की अलग चिंताएं हैं।

1960 में भारत और चीन का कृषि उत्पादन करीब बराबर था, लेकिन आज दावे कुछ भी हों लेकिन चीन के मुकाबले हमारी प्रमुख फसलों की उपज लगभग आधी है। फिर भी विपरीत हालात के बावजूद 1950-51 से हमारा अनाज उत्पादन चार गुना, बागवानी छह गुना, मछली उत्पादन नौ गुना और दूध उत्पादन में छह गुना से अधिक बढ़ा है। सरकार को लगता है कि पीएम किसान के माध्यम से साल में छह हजार की मदद किसानों की समस्या हल कर देगी, जबकि निदान वाजिब दाम में निहित है। लेकिन सरकार एमएसपी पर खरीद की गारंटी का कानून बनाने में आनाकानी कर रही है।

विपक्षी दल ही नहीं भाजपा के किसान नेता भी इस पक्ष में रहे हैं कि खरीद गारंटी का कानून बने। राज्य सभा में 19 जुलाई, 2019 को गैर-सरकारी सदस्यों के संकल्प के तहत भाजपा किसान मोर्चा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय पाल सिंह तोमर ने मांग की थी कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि फसलों को सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर खरीदा या बेचा न जाए और इसका उल्लंघन करने पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए। मध्य प्रदेश में मंदसौर कांड के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने 11 जून 2017 को 28 घंटे तक उपवास रखा था और फिर दावा किया राज्य में अब एमएसपी से कम पर अनाज खरीदना अपराध माना जाएगा और सरकार इसके लिए नियम बनाएगी। लेकिन उसी राज्य से आने वाले केंद्रीय कृषि मंत्री इस मुद्दे पर अलग लाइन लिए हुए हैं।

भारत में किसान जिन वस्तुओं को खरीदता है वे एमआरपी के दायरे में है तो एमएसपी के लिए ठोस व्यवस्था बनाना असंभव तो नहीं है। साढे 14 करोड़ किसानों की भूजोतों के लिहाज से सरकारी खरीद ऊंट के मुंह में जीरा जैसी हो रही है। निजी क्षेत्र को भी खरीद का लाइसेंस दे देने के बाद बिना गारंटी के किसान का कितना शोषण होगा, इसका अंदाजा नीतियां बनाने वालों को भी है। इस नाते वह चाहता है कि एमएसपी पर खरीद की वैधानिक गारंटी हो और मंडी व्यवस्था से छेड़ छाड़ न हो। तमाम विसंगतियों के बाद भी यही मंडियां उनको उचित मूल्य दिलाने में मददगार हैं। बेशक देख को खाद्य सुरक्षा दे रहा पंजाब अपनी बेहतरीन मंडी व्यवस्था के नाते ही खाद्य सुरक्षा की सबसे अहम फसल गेहूं और धान की खरीदी में अव्वल रहता है। लेकिन यह व्यवस्था बाकी राज्यों में भी करना असंभव नहीं है।

छत्तीसगढ़ ने अपनी मंडी व्यवस्था को सुधारी है जिस नाते वह आज 20.52 लाख किसानों से 92 लाख टन तक धान खरीदी कर रही है जो राज्य बनने के दौरान सात से आठ लाख टन थी। किसान जो धान बेचना चाहे सरकार खरीद रही है। पिछले साल मध्य प्रदेश ने पंजाब से ट्रेनिंग लेकर देश में सबसे अधिक 1 करोड़ 28 लाख टन गेहूं खरीद लिया। पहली बार गेहूं खरीद में पंजाब पीछे हो गया। लेकिन मध्य प्रदेश की खरीद चुनावी थी और इस साल फिर पंजाब नंबर एक पर आ गया लेकिन यह तो साफ हो गया कि मध्य प्रदेश में जिन 15 लाख 72 हजार ने अपना गेहूं सरकार को बेचा था उसमे 8.12 लाख से अधिक छोटे और सीमांत किसान थे। उत्तर प्रदेश में छोटे किसानों की मदद इस राह से और सफलता से हो सकती है, अगर सरकार चाहे। देश में कुल गेहूं उत्पादन का 83 फीसदी हिस्सा उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्यप्रदेश, हरियाणा और राजस्थान का होता है। गेहूं धान के बाद दूसरे नंबर पर आता है लेकिन पंजाब हरियाणा अभी भी खाद्य सुरक्षा की धुरी भारी सरप्लस अनाज पैदा करने और मजबूत सरकारी खरीद तंत्र के नाते बने हुए हैं। ऐसा तंत्र बाकी राज्यों में बनाना असंभव नहीं है। अगर यह काम खुद भारत सरकार नहीं कर सकती तो निजी खरीद के मामले में वह किसानों को कानूनी संरक्षण देने से क्यों हिचक रही है?

लेखक- अरविंद कुमार सिंह, ग्रामीण और संसदीय मामलों के जानकार हैं। खेत खलिहान आपका गांव कनेक्शन में कॉलम है, इसमें छपे विचार आपके निजी हैं।


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