औषधीय गुणों की खान हैं पौधों की जड़ें और कंद

जमीन के भीतर भी पौधों के जो अंग होते हैं, विशेषत: जड़ें और कंद, वे भी जबरदस्त औषधीय गुणों की खान होते हैं

औषधीय गुणों की खान हैं पौधों की जड़ें और कंद

वैसे तो माना जाता है कि हर एक पौधे और उसके अंग का अपना एक खास औषधीय गुण होता है और हम सभी इस बात को स्वीकारते भी हैं। जमीन के भीतर भी पौधों के जो अंग होते हैं, विशेषत: जड़ें और कंद, वे भी जबरदस्त औषधीय गुणों की खान होते हैं। इस सप्ताह हम ऐसे ही कुछ पौधों का जिक्र कर रहें हैं जिनके उन अंगों में ज्यादा औषधीय गुण हैं जो जमीन के अंदर होते हैं। अदरक, अरबी, प्याज जैसे पौधों के समस्त अंगों को औषधीय महत्व के हिसाब से अतिमहत्वपूर्ण माना गया है लेकिन आधुनिक विज्ञान भी इस बात को स्वीकारता है कि इनके जमीनी अंगों में ज्यादा बेहतर गुण होते हैं।


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अदरक

आम घरों के किचन में पाया जाने वाला अदरक खूब औषधीय गुणों से भरपूर है। सम्पूर्ण भारत में इसकी खेती की जाती है। अदरक का वानस्पतिक नाम ज़िन्ज़िबर आफ़ीसिनेल है। सभी प्रकार के जोड़ों की समस्याओं में रात्रि में सोते समय लगभग 4 ग्राम सूखा अदरक, जिसे सोंठ कहा जाता है, नियमित लेना चाहिए। स्लिपडिस्क या लम्बेगो में इसकी इतनी ही मात्रा चूर्ण रूप में शहद के साथ ली जानी चाहिए।


आदिवासियों के अनुसार बरसात में खान पान में हल्का भोजन करना चाहिये और भोजन के साथ मे आधा निंबू का रस तथा अदरक जरूर खाना चाहिये। नींबू और अदरक बरसात समय होने वाली अनेक तकलीफों का निवारण स्वत: ही कर देते है। दो चम्मच कच्ची सौंफ और 5 ग्राम अदरक एक ग्लास पानी में डालकर उसे इतना उबालें कि एक चौथाई पानी बच जाये। एक दिन में 3-4 बार लेने से पतला दस्त ठीक हो जाता है। गैस और कब्ज में भी लाभदायक होता है।

गाउट और पुराने गठिया रोग में अदरक एक अत्यन्त लाभदायक औषधि है। अदरक लगभग (5 ग्राम) और अरंडी का तेल (आधा चम्मच) लेकर दो कप पानी में उबाला जाए ताकि यह आधा शेष रह जाए। प्रतिदिन रात्रि को इस द्रव का सेवन लगातार किया जाए तो धीमें धीमें तकलीफ़ में आराम मिलना शुरू हो जाता है। आदिवासियों का मानना है कि ऐसा लगातार 3 माह तक किया जाए तो पुराने से पुराना जोड़ दर्द भी छू-मंतर हो जाता है।


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अरबी

भारत के अनेक प्राँतो में अरबी या घुईयाँ की खेती इसके कंद के लिए की जाती है। अरबी भारतीय किचन की एक प्रचलित सब्जी भी है। अरबी का वानस्पतिक नाम कोलोकेसिया एस्कुलेंटा है। अरबी के पत्तों से बनी सब्जी बहुत स्वादिष्ट होती है। इसके पत्तों में बेसन लगाकर भजिये तैयार किए जाते है और माना जाता है कि ये भजिये वात रोग से पीड़ित व्यक्ति को जरूर खाना चाहिए।

जहाँ एक ओर अरबी का कंद शक्ति और वीर्यवर्धक होता है वहीं इसकी पत्तियाँ शरीर को मजबूत बनाती हैं। आदिवासी हर्बल जानकारों की मानी जाए तो अरबी के कंदों की सब्जी का सेवन प्रतिदिन करने से हृदय मजबूत होता है। अरबी की पत्तियों की डंठल को तोडकर जलाया जाए और इसकी राख को नारियल के तेल के साथ मिलाकर फ़ोडों और फ़ुन्सियों पर लेपित किया जाए तो काफी फ़ायदा होता है।

प्रसव के बाद माताओं में दूध की मात्रा कम बनती हो तो अरबी की सब्जी प्रतिदिन देने से अतिशीघ्र फ़ायदा होता है। अरबी के पत्ते डण्ठल के साथ लिए जाए और पानी में उबालकर पानी को छान लिया जाए, इस पानी में उचित मात्रा में घी मिलाकर 3 दिनों तक दिन में दो बार दिया जाए तो लंबे समय से चली आ रही गैस की समस्या में फ़ायदा होता है। प्रतिदिन अरबी की सब्जी का सेवन उच्च-रक्तचाप में भी काफी उपयोगी है।


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गाजर

गाजर एक चिरपरिचित सब्जी है जो भिन्न-भिन्न व्यंजनों में इस्तमाल की जाती है। गाजर की पैदावार पूरे भारतवर्ष में की जाती है। गाजर का वानस्पतिक नाम डौकस कैरोटा है। गाजर में प्रोटीन, कार्बोहाईड्रेट, चर्बी, फास्फोरस, स्टार्च तथा कैल्शियम के अलावा केरोटीन प्रचूर मात्रा में पाया जाता है। गाजर के सेवन से शरीर मुलायम और सुन्दर बना रहता है तथा शरीर में शक्ति का संचार होता है और वजन भी बढ़ता है।

बच्चों को गाजर का रस पिलाने से उनके दांत आसानी से निकलते हैं और दूध भी ठीक से पच जाता है। जिन्हें पेट में गैस बनने की शिकायत हो उन्हें गाजर का रस या गाजर को उबालकर उसका पानी पीना चाहिए। आदिवासियों के अनुसार गाजर के रस की 4-5 बूंदे नाक के दोनों छेदों में डाली जाए तो हिचकी दूर होती है। हिचकी को दूर करने के लिए गाजर को पीसकर सूंघने से लाभ मिलता है।


पातालकोट के आदिवासी हर्बल जानकारों के अनुसार गाजर का रस शहद के साथ लेने से वीर्य गाढ़ा होता है और नपुंसकता दूर होती है। डाँग- गुजरात के आदिवासी गाजर के बीज (25 ग्राम) लेकर पीस लेते है और उन महिलाओं के देते है जिन्हें मासिकधर्म सम्बंधी परेशानियां हो। इनका मानना है कि गाजर के बीजों को पीसकर पानी में छानकर पीने से बंद मासिकधर्म पुन: शुरू हो जाता है। गाजर का 125 ग्राम रस को खाली पेट सुबह तीन दिनों तक लगातार पीने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।

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प्याज

रसोई में अगर प्याज ना हो तो रसोई अधूरी होती है। प्याज का वानस्पतिक नाम एलियम सीपा है। प्याज एक अत्यंत गुणकारी पौधा है। प्याज में ग्लुटामिन, अर्जीनाइन, सिस्टन, सेपोनिन और शर्करा पायी जाती है। प्याज के बीजों को सिरका में पीसकर लगाने से दाद-खाज और खुजली में अतिशीघ्र आराम मिलता है। प्याज के रस को सरसों के तेल में मिलाकर जोड़ों पर मालिश करने से आमवात, जोड़ दर्द में आराम मिलता है।

वृद्धों और बच्चों को ज्यादा कफ हो जाने की दशा में प्याज के रस में मिश्री मिलाकर चटाने से फायदा मिलता है। प्याज के रस और नमक का मिश्रण मसूड़ो की सूजन और दांत दर्द को कम करता है। प्रायः प्याज सफेद और लाल रंग के होते हैं। सफेद प्याज हृदय के लिए गुणकारी होता है जबकि लाल प्याज बलदायक होता है।

गर्मियों में माथे पर दर्द होने से प्याज के सफेद कंद को तोड़कर सूँघना चाहिए तथा चंदन में कपूर घिसकर कपाल पर लगाने से अतिशीघ्र आराम मिलता है। वीर्यवृद्धि के लिए सफेद प्याज के रस के साथ शहद लेने पर फायदा होता है। पातालकोट के आदिवासी मधुमख्खी या ततैया के काटे जाने पर घाव पर प्याज का रस लगाते हैं। बच्चों के शारीरिक विकास के लिए प्याज और गुड़ का सेवन की सलाह गुजरात के डाँगी आदिवासी देते है। इन्हीं आदिवासियों का मानना है कि प्याज के सफेद कंद का रस, शहद, अदरक रस और घी का मिश्रण २१ दिनों तक लगातार लेने से नपुंसकता दूर होकर पुरूषत्व प्राप्त होता है।


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जिमीकन्द

इसे प्रचलित भाषा में सूरन या जिमीकंद कहते हैं। इसका वानस्पतिक नाम अमोरफ़ोफेल्लस कम्पेनुलेटस है। ग्रामीण और शहरी अंचलों में इस पौधे के कंद को सब्जी के रूप में सेवन किया जाता है। इस पौधे का सबसे औषधीय गुणों वाला अंग इसका कंद होता है। सूरनकंद एक मजबूत, बड़े आकार का कंद होता है जिसमें मुख्य रूप से प्रोटीन, वसा, कार्बोहाईड्रेड्स, क्षार, कैल्शियम, फॉस्फोरस, लौह तत्व और विटामिन ए व बी पाए जाते हैं।

कंद का अधिकतर उपयोग बवासीर, स्वास रोग, खाँसी, आमवात और कृमिरोगों आदि में किया जाता है। सूरनकंद के प्रमुख गुणों में से एक इसका उपयोग अर्श अथवा बवासीर में होना है और इसी वजह से इसे अर्शीघ्न भी कहते हैं। आदिवासी इस कंद को काटकर नमक के पानी में धोते हैं और बवासीर के रोगी को इसे कच्चा चबाने की सलाह देते हैं। जिन लोगों को लीवर (यकृत) में समस्या हो उनके लिए भी सूरनकंद एक वरदान है।

सूरनकंद की सब्जी बनाकर सेवन करने से यकृत से जुड़ी तमाम समस्याओं में फायदा होता है। आंव अथवा दस्त लगातार होने की दशा में कंद को सुखाकर, चूर्ण बनाकर इसे घी में सेका जाता है और फिर रोगी को इसमें थोड़ी शक्कर ड़ालकर दिया जाता है। आदिवासियों के अनुसार यह दस्त रोकने का अचूक उपाय है। सूरनकंद की सब्जी कमजोरी, दुर्बलता और वीर्य को कमी को भी दूर करती है। इसके सेवन से वातरोग में भी फायदा होता है। सूरनकंद को पानी में पीसकर लेपन करने से जोड़ दर्द और आमवात में आराम मिलता है।

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