वाह ! जिन्हें बचाने के चक्कर में 6 महीने कोमा में रहे, जिंदा लौटे तो गरीब बच्चों के नाम कर दी जिंदगी

वाह ! जिन्हें बचाने  के चक्कर में 6 महीने कोमा में रहे, जिंदा लौटे तो गरीब बच्चों के नाम कर दी जिंदगीबच्चों के साथ कृष्ण पांडेय

गोरखपुर। आपने अक्सर होटलों, रेलवे स्टेशनों, दुकानों और बाजरों में फटे पुराने कपड़े पहने बच्चों को अक्सर भीख मांगते देखा होगा। आपमें से कई उन्हें भीख में एक या दो रुपये दे देते होंगे तो कई लोग गालियां देकर भगा देते होंगे। लेकिन एक शख्स ने इन बच्चों के लिए अपनी जिंदगी सौंप दी है।

कृष्ण पांडेय उर्फ आजाद पांडेय स्माईल रोटी बैंक संस्था के चीफ कैम्पेनर हैं। वर्ष 2006 में एक सड़क दुर्घटना के दौरान बेसहारा को बचाने के दौरान पांडेय का एक्सीडेंट हो गया और कोमा में चले गए। छह माह तक कोमा में रहने के बाद मासूमों के बारे में कुछ करने की इन्होंने ठान ली। इनकी यही जिद आज बेसहारा बच्चों के लिए वरदान साबित होने लगी है।

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स्माईल रोटी बैंक संस्था द्वारा चलाया जा रहा ‘स्माइलियन कमांडोज’ वर्ष 2006 से शुरू हुई यात्रा देश के आधा दर्जन शहरों में पहुंच चुकी है। यह कारवां बढ़ता ही जा रहा है। वर्तमान में इस संस्था के दो सौ के करीब कार्यकर्ता हैं, जो नि:शुल्क सेवा दे रहे हैं। इनमें कई कार्यकर्ता सरकारी संस्थाओं में सेवा दे रहे हैं।

स्माईल रोटी बैंक संस्था का उद्देश्य देश से बाल भिक्षावृत्ति को समाप्त किया जाए, इसी के लिए संस्था के कार्यकर्ता दिन-रात लगन से कार्य करते हैं। संस्था की ओर से समाज के भटके हुए मासूमों को मुख्य धारा से जोडऩे के लिए सभी इंतजाम किए जाते हैं।

सड़क किनारे बच्चों को पढ़ाते स्माईल रोटी बैंक संस्था के सहयोगी

मासूमों को दी जाने वाली सुविधाएं

जनसहयोग से चलने वाली संस्था स्माईल रोटी बैंक की ओर से मासूमों को नि:शुल्क भोजन, कपड़ा व पठन सामग्री आदि उपलब्ध कराई जाती है। संस्था के कार्यकर्ता प्रतिदिन रेलवे स्टेशन पर इन मासूमों की क्लास लगाते हैं। इनके स्वास्थ्य से जुड़ी सभी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती है। इसके अलावा बच्चों को पठन-पाठन के अलावा शहर के विभिन्न स्थानों में मनोरंजन के लिए भ्रमण भी कराया जाता है।

गोरखपुर की यात्रा आधा दर्जन शहरों तक पहुंची

स्माईल रोटी बैंक के चीफ कैम्पेनर आजाद पांडेय ने बताया, “ वर्तमान में संस्था गोरखपुर के अलावा ग्वालियर, जबलपुर, पटना और बनारस में कार्य कर रही है। इन शहरों के बेसहारा मासूमों को साक्षर बनाने के साथ ही हर तरह से जागरूक किया जा रहा है। यह क्रम जारी है। लोग इस अभियान की सराहना कर रहे हैं। अभियान का यह कारवां बढ़ता जा रहा है। जो निस्वार्थ सेवा के लिए आगे आ रहे हैं। ”

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