प्राइमरी स्कूलों में भरा है पानी, शौचालय टूटे

प्राइमरी स्कूलों में भरा है पानी, शौचालय टूटेस्कूलों के परिसरों में पानी भरने से बच्चों के बैठने के साथ-साथ कई बीमारियों का भी खतरा है।

स्वयं प्रोजेक्ट टीम

लखनऊ। जहां एक तरफ अभियान चलाकर बच्चों को स्कूलों तक लाने की कोशिश की जा रही है, वहीं स्कूलों के परिसरों में पानी भरने, छत टपकने से बच्चों के बैठने के साथ-साथ कई बीमारियों का भी खतरा है। नया सत्र शुरू होने के बाद ‘गाँव कनेक्शन’ ने सरकारी प्राइमरी स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति की हकीकत जानने के लिए सात जिलों में पड़ताल की तो कई स्कूल परिसरों में पानी भरा मिला, तो कहीं गंदगी के ढेर और शौचालय टूटे मिले।

कन्नौज के डबहा गाँव निवासी कामता प्रसाद (30 वर्ष) कहते हैं, “मेरे गाँव के प्राथमिक स्कूल के मैदान में पानी भरता है। बरसात में स्कूल की छत भी टपकती है। गंदगी की वजह से बच्चों में संक्रामक रोग फैलने की संभावना बनी रहती है।”इसी जिले के उमर्दा ब्लॉक के प्राथमिक स्कूल टूसावरी की सहायक अध्यापिका उषा सिंह कहती हैं, “स्कूल परिसर के अंदर तालाब जैसी स्थिति है। हर ओर सिर्फ गंदगी ही दिखाई पड़ती है।

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गाँव के लोग भी गंदगी करते हैं। मच्छर बहुत लगते हैं। मैं खुद बुखार से पीड़ित हूं। डॉक्टर ने टाइफाइड बताया है, इसलिए 17 जुलाई से मैं मेडिकल पर चल रही हूं।” एक तरफ सरकार जहां बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए किताबें, ड्रेस, जूते और मिड-डे मील उपलब्ध करा रही है, वहीं स्कूलों के रखरखाव के लिए जिम्मेदार अधिकारी और अध्यापकों की लापरवाही से स्कूलों का बुरा हाल है।

उत्तर प्रदेश में 1.98 लाख प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक स्कूलों में ज्यादातर की स्थिति बदतर है। इससे इन स्कूलों में पढ़ने वाले लगभग 1.96 करोड़ बच्चों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है।सरकारी प्राथमिक स्कूलों की बदहाली पर संयुक्त शिक्षा निदेशक, बेसिक, ललिता प्रदीप कहती हैं, “स्कूलों का मेंटीनेंस स्कूल मैनेजमेंट कमेटी देखती है और जिले के अधिकारी और ब्लॉक शिक्षा अधिकारी देखते हैं। जलभराव जैसी चीजें स्कूल मैनेजमेंट कमेटी के स्तर से सही करवाना चाहिए।"

मोहनलालगंज से लगभग 45 किमी दूर ग्राम रसूलपुर समेसी प्राथमिक विद्यालय की प्रधानाचार्या आशा देवी बताती हैं, “स्कूल परिसर में बारिश का पानी भरा हुआ है। स्कूल में बाउंड्री वॉल भी नहीं है, जिससे सड़क का सारा पानी स्कूल परिसर में भर जाता है। बाउंड्री वॉल न होने के कारण गाँव के लोगों ने बीच से रास्ता बना लिया है, जिसमें से लोगों के साथ जानवर भी निकलते हैं और गंदगी फैलाते हैं। परिसर में मच्छरों की रोकथाम हो भी तो किस तरह से। कई बार लिखित में एनपीआरसी को शिकायत की, पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।"

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पीलीभीत के ब्लॉक मरौरी के प्राथमिक विद्यालय दयूनी केसरपुर में भी यही हालात हैं। स्कूल की दीवारों पर सीलन है। स्कूल प्रधानाचार्या दीपिका मित्तल बताती हैं, "विद्यालय का निर्माण 20 साल पहले हुआ था। विद्यालय भवन के कमरों की छतों से पानी टपकता है। छतों में लगी निर्माण सामग्री टूटकर बच्चों के ऊपर गिरती है। कमरे की अधिकतर दीवारों पर सीलन आ जाती है।”

दूसरी ओर कासगंज के ग्राम पंचायत कादरवाडी के प्राथमिक विद्यालय, ठठेरपुर के बाहर भी गन्दगी का आलम है। नालियों में गन्दा पानी भरा रहता है। स्कूल के कक्षा तीन के छात्र अभिषेक(10 वर्ष) बताते हैं, "कक्षा में मच्छर बहुत काटते हैं, गंदगी फैली रहती है।" वहीं, स्कूल प्रधानाचार्य उपेंद्र कुमार कहते हैं, "विद्यालय में कोई सफाई कर्मचारी नहीं है, हम अपने निजी खर्चे पर सफाई कराते हैं, कई बार प्रधान और अधिकारियों से कहा पर कोई नहीं सुनता।"

वहीं, वाराणसी समेत पूर्वांचल में पिछले सप्ताह भारी बारिश हुई थी। ऐसे में सेवापुरी ब्लॉक स्थित ठठरा और चित्रसेनपुर प्राथमिकविद्यालय, काशी विद्यापीठ में जफराबाद और महेशपुर, आराजीलाइन में कुरौना और सरपोंजी, चोलापुर में पिपरी और सरैयां, चिरईगांव में उमरहां, पिंडरा में दबेखुआ और भीमपुर प्राथमिक विद्यालय में पानी भर गया था। जलनिकासी न होने के कारण कई दिनों तक इन विद्यालयों में पठन-पाठन कार्य बाधित रहा।

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चिरईगाँव ब्लॉक के विद्यालय के शिक्षक नवनीत पांडेय (36 वर्ष) कहते हैं,“ बारिश के बाद जलभराव देखकर बहुत से बच्चे नहीं आते थे। स्कूल में जलभराव की समस्या है। विभाग की ओर से कोई व्यवस्था उपलब्ध नहीं कराई जाती है। गाँव वालों की मदद से हम लोग खुद पानी निकलवाते हैं।”कक्षा पांचवीं का शिवम पाल कहते हैं, “गाँव में स्कूल आने वाले रास्ते पर पानी रहता है, जिससे स्कूल आने के लिए मां मना करती है। मुझे स्कूल में अच्छा लगता है। घर पर अच्छा नहीं लगता है।”

स्कूलों में जलभराव से पनप रहे मच्छर

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। प्रदेश में सरकारी स्कूलों की हालत खराब है। कहीं बाउंड्री वॉल टूटी पड़ी है। तो बिजली नहीं है। कई स्कूलों में बारिश का पानी भरा है और आस-पास गंदगी की भरमार है, लेकिन न तो प्रशासन को इसकी परवाह है न ही शिक्षा विभाग को।

मोहनलालगंज जिला मुख्यालय से लगभग 45 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम रसूलपुर समेसी प्राथमिक विद्यालय की प्रधानाचार्या आशा देवी बताती हैं, “स्कूल परिसर में बारिश का पानी भरा हुआ है। स्कूल में बाउंड्री वॉल नहीं है, जिससे सड़क का सारा पानी स्कूल परिसर में भर जाता है। बाउंड्री वॉल न होने के करण गाँव वालों ने स्कूल के बीच से रास्ता बना लिया है। कई बार लिखित में एनपीआरसी को लिखित में शिकायत की पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।”

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जिला मुख्यालय सरोजनीनगर से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित प्राथमिक विद्यालय झिलझिलापुरवा की प्रधानाध्यापक आरती सचान कहती हैं, “बारिश के कारण स्कूल में जलभराव हो जाता है। स्कूल की बाउंड्री वॉल भी गिर गई है। बारिश का पानी स्कूल में व आस-पास जमा हो जाता है, जिससे मच्छर पनप रहे हैं। ऐसे में बच्चों के बीमार होने का खतरा बना हुआ है।”

लखनऊ जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित प्राथमिक विद्यालय गोहरामऊ की इंचार्ज अम्बर फातिमा ने बताया, “स्कूल में बाउंड्री वॉल न होने के कारण सारा पानी बरामदे की ओर आता है। स्कूल में फर्नीचर नहीं हैं और बच्चे जमीन में चटाई पर बैठते हैं। सरकार बच्चों को किताबें, जूते, खाना और ड्रेस जैसी सुविधाएं दे रही है जो कि बहुत अच्छा है, लेकिन सरकार को स्कूल में मौजूद इन सारी कमियों पर भी ध्यान देना होगा।”

बदहाल हालत में है विद्यालय

स्वयं कम्युनिटी जर्नलिस्ट

मोहनलालगंज। खुजेहट गाँव का पूर्व माध्यमिक विद्यालय आज भी अपनी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। प्रधानाध्यापक की तमाम कोशिशों के बाद भी विभाग की आंखें नहीं खुलीं। बारिश के दौरान टपकती छतों के नीचे बैठकर बच्चे पढ़ाई करने को मजबूर हैं।

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राजधानी के मोहनलालगंज ब्लाक के अन्तर्गत पूर्व माध्यमिक विद्यालय खुजेहटा की छत से कक्षों में पानी टपकता है। विद्यालय की बाउंड्री वॉल भी नहीं है। वहीं विद्यालय भवन के कक्षों की दीवारों से प्लास्टर टूट-टूटकर गिर रहा है जो कभी भी किसी बड़ी घटना का सबब बन सकता है।

विद्यालय की सहायक अध्यापिका ललिता ने बताया, “सम्पूर्ण विद्यालय भवन की रंगाई-पुताई के लिए मिलने वाली रकम 6500 रुपए मात्र से विद्यालय की उच्चगुणवत्ता वाली रंगाई-पुताई नहीं हो पाती। लगातार बरसात में भीगते रहने के कारण भवन की खिड़कियां दरवाजे सड़ चुके हैं। विद्यालय परिसर की बाउंड्री वॉल भी नहीं है।”

विद्यालय परिसर का मैदान समतल न होने के कारण बरसात में जगह-जगह पानी भर जाने से छात्रों को खेलने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। साथ ही संक्रमण जनित बीमारियों की सम्भवना बनी रहती है।

बेसिक शिक्षा अधिकारी प्रवीणमणि त्रिपाठी नेे बताया विद्यालयों के रंगरोगन के लिए सरकार द्वारा दी जाने वाली धनराशि महंगाई को देखते हुए न काफी है, फिर भी प्रधानाध्यापक अपने निजी प्रयासों से नई तकनीक के संसाधन इकठ्ठा कर किसी तरह विद्यालय को सुचारु रूप से चलाने का प्रयत्न करते हैं।

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गंदगी के बीच पढ़ते हैं बच्चे

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

पीलीभीत। प्राथमिक विद्यालय दयूनी केसरपुर, ब्लॉक मरौरी के विद्यालय में बच्चों के बैठने के लिए बेंच नहीं हैं। बच्चे टाट की पट्टियों पर बैठते हैं। किसी-किसी क्लास में बच्चे चौकियों पर भी बैठते हैं। यहां कुछ बच्चे अपनी घरेलू पोशाक में ही स्कूल में पढ़ने आते हैं। कुछ बच्चों को नई ड्रेस मिल गई है, जबकि अधिकतर बच्चों को अभी तक ड्रेस नहीं मिली है।

प्रधानाचार्या दीपिका मित्तल ने बताया, “विद्यालय का निर्माण 20 वर्ष पूर्व हुआ था। विद्यालय भवन के कमरों की छत टपकती है। छतों में लगी निर्माण सामग्री टूटकर बच्चों के ऊपर गिरती है। कमरे की अधिकतर दीवारों पर सीलन आ जाती है। विद्यालय में मुख्य द्वार भी नहीं है।”

प्राथमिक विद्यालय रामनगर खरोंसा, ब्लॉक मरौरी में कुल 102 बच्चों का प्रवेश पंजीकृत किया गया, जिसमें 78 बच्चे मौजूद मिले। विद्यालय में कोई फर्नीचर नहीं है बच्चे अभी चटाइयों पर ही बैठकर अध्यापन कार्य कर रहे हैं। कमरों की दीवारें पानी में भीग चुकी हैं। कमरों की छतों पर भी सीलन रहती है। विद्यालय में कुल चार टीचर हैं।

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प्रधानाध्यापक नाजिर-उर-रहमान व सहायक अध्यापिका आत्मा देवी ने बताया कि सफाई कर्मी विद्यालय में आता नहीं है। जिससे कक्षाओं में गंदगी पड़ी रहती है।प्राथमिक विद्यालय खरौंसा, ब्लॉक मरौरी में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है।

स्कूल में बिजली के मीटर तो लगे पर पंखे नहीं

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

गोरखपुर। जिले के प्राथमिक स्कूलों के बच्चे उमस के मारे उबल रहे हैं। स्कूलों में बिजली के मीटर तो लगा दिए गए हैं, लेकिन पंखा नहीं लगा है। अभी तक अधिकांश स्कूलों में बच्चों को ड्रेस, बैग व पाठ्य सामग्री का वितरण नहीं हो सका है। जैसे-तैसे फर्श पर बैठकर ककहरा पढ़ रहे हैं। कुछ स्कूलों में टेबल व मेज हैं, लेकिन वहां पर उमस के मारे बच्चों को बरामदे में बैठाया जा रहा है।

प्राथमिक विद्यालय डिभिया में बच्चों के बैठने के लिए टेबल-मेज की व्यवस्था है, लेकिन उमसभरी गर्मी में बिना हवा-पंखे के कैसे बच्चे यहां पढ़ाई कर सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस स्कूल में बिजली के मीटर भी लगा दिए गए हैं। यानी कागजों में यहां पर विद्युतीकरण हो चुका है, लेकिन पंखा न होने के चलते बच्चे उमस भरी गर्मी से परेशान हैं।

यह स्कूल नगर क्षेत्र के अंतर्गत आता है। इसके अलावा इस स्कूल में आग बुझाने की मशीन भी शोपीस के लिए टंगी है, जो खराब है। बच्चों को अभी तक ड्रेस व बैग नहीं देने की बात पर स्कूल की प्रधानाचार्य दुर्गावती देवी ने बताया, “अभी बजट नहीं आया है। जैसे ही आएगा सभी तैयारी पूरी कर ली जाएगी।”

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एडी बेसिक डॉ. एसपी त्रिपाठी ने बताया प्राथमिक स्कूलों में बच्चों के बैठने के लिए टाट-पट्टी की ही व्यवस्था है। कुछ स्कूलों में टेबल व मेज भी है। स्कूलों के स्वरूप को बेहतर करने का प्रयास किया जा रहा है। ड्रेस के लिए स्कूलों को बजट भेज दिया गया है। हां, ड्रेस उपलब्धता को लेकर इधर कुछ दिक्कत आ रही है, प्रयास जारी है। शीघ्र ही ड्रेस, बैग व पाठ्य सामग्री की सभी समस्याओं को दुरुस्त कर दिया जाएगा।

पिछले हफ्ते दस स्कूलों में जलभराव से बाधित थी पढ़ाई

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

वाराणसी। जनपद के आठ ब्लाकों में करीब 1014 प्राथमिक और 354 उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं, लेकिन एक सप्ताह पहले बारिश के कारण करीब 10 स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई बाधित थी। विद्यालय परिसर और क्लास रूप में जलभराव के कारण बच्चे खुले मैदान में पढ़ाई कर रहे थे।

वाराणसी समेत पूरे पूर्वांचल में पिछले सप्ताह भारी बारिश हुई थी, जिसके चलते सेवापुरी ब्लाक स्थित ठठरा और चित्रसेनपुर प्राथमिक विद्यालय, काशी विद्यापीठ में जफराबाद और महेशपुर, आराजीलाइन में कुरौना और सरपोंजी, चोलापुर में पिपरी और सरैयां, चिरईगांव में उमरहां, पिंडरा में दबेखुआ और भीमपुर प्राथमिक विद्यालय में पानी भर गया था।

खंड शिक्षा अधिकारी स्कंद गुप्ता ने बताया हमारे ब्लाक में ऐसी कोई समस्या नहीं है। हां, जब जोरदार बारिश होती है तो कुछ स्कूलों में पानी भर जाता है, लेकिन क्लास में पानी आने पर साफ कराया जाता है। बुधवार को मैंने संकुल प्रभारियों के साथ बैठक कर स्कूलों की स्थिति की समीक्षा की। इस दौरान जलभराव की समस्या तो नहीं सुनने को मिली।

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गाँव वालों ने स्कूल को बनाया कूड़ा घर

स्वयं कम्युनिटी जर्नलिस्ट

कासगंज। जनपद के तराई इलाकों में मौजूद प्राइमरी विद्यालयों की हालात बदतर है। विद्यालयों में पढ़ाई न के बराबर होती है तो वहीं बच्चों को सांप-बिच्छुओं का सामना भी करना पड़ता है। अधिकतर विद्यालयों में गाँव के लोग कूड़ा डालते हैं तो वहीं कई विद्यालयों के कमरों में भूसा भरकर कब्जा कर लिया गया है। गाँव कनेक्शन टीम ने जब गंगा किनारे विद्यालयों का हाल जाना तो देखा कि बच्चे जान जोखिम में डालकर शिक्षा ग्रहण करने आते हैं।

मल्लाहनगर के जूनियर विद्यालय में मौजूद कक्षा सात के छात्र शाकिब से पूछा तो उसने बताया, “पढ़ाई के वक़्त मच्छर काटते हैं। कई बार कमरे में सांप आ जाते हैं।” कक्षा आठ के छात्र जहूर (13 वर्ष) ने बताया, “स्कूल में पढ़ाई कम होती है। टीचर मोबाइल पर लगे रहते हैं, यहां दिन में भी मच्छर काटते हैं।”

जब इस सम्बन्ध में विद्यालय के प्रधानाचार्य छोटेलाल कहना है, “मैं पिछले 14 वर्षों से विद्यालय में तैनात हूं, यहां कभी भी दवा का छिड़काव नहीं किया गया, विद्यालय के समीप ही गाँव के लोग कूड़ा डालते हैं।” ठठेरपुर के प्राथमिक विद्यालय के बाहर गंदगी का आलम है। नालियों में गंदा पानी भरा रहता है। कक्षा तीन के छात्र अभिषेक ने बताया, “मच्छर बहुत काटते हैं। पढ़ने में परेशानी होती है।” विद्यालय के प्रधानाचार्य उपेन्द्र कुमार ने बताया, “विद्यालय में सफाई कर्मचारी नहीं है। हम अपने निजी खर्चे पर सफाई कराते हैं। कई बार प्रधान से व अधिकारियों से कहा पर कोई नहीं सुनता, विद्यालय के बाहर गंदगी रहती है।”

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कादरवाडी के प्राथमिक विद्यालय में बच्चों के बैठने के लिए फर्श पर टाटपट्टी बिछी है। यहां बच्चों को पीने का पानी मयस्सर नहीं है। विद्यालय में जो हैंडपम्प है उसमें से खारा पानी निकलता है। विद्यालय के सामने गंदगी के ढेर लगे हुए हैं। कक्षा तीन के छात्र नवीन ने बताया, “हमें पीने का पानी नहीं मिलता। नल से खारा पानी आता है, मच्छर भी काटते हैं।” विद्यालय की प्रधानाचार्य नीता बतातीं हैं, “विद्यालय में सफाई कर्मचारी सप्ताह में एक बार आता है, बाकी दिनों में अपने निजी खर्च पर या सफाई करानी पड़ती है। यहां कभी भी दवा का छिड़काव नहीं किया गया।” उढेरपुख्ता के प्राथमिक व जूनियर विद्यालय के कमरों में ग्रामीणों का कब्जा है। एक कमरे में भूसा भरा हुआ है। परिसर में बड़ी-बड़ी घास खड़ी है।

बीएसए गीता सिंह ने बताया सफाई कर्मचारी की जिम्मेदारी प्रधान पर होती है। मच्छर रोधी दवा का छिड़काव स्वास्थ्य विभाग की ओर से कराया जाता है। हमारे पास इससे सम्बंधित बजट नहीं होता। जिन विद्यालयों के कमरों में भूसा भरा हुआ है उन्हें संज्ञान में लिया जाएगा और सम्बंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

टीचर खुद टाइफाइड से पीड़ित, स्कूलों में गंदगी

स्वयं कम्युनिटी जर्नलिस्ट

कन्नौज। जिले के परिषदीय स्कूलों में मच्छरों से निपटने के इंतजाम नहीं हैं। कई गंदगी वाले स्कूलों में मच्छरों का आतंक रहता है, जिससे बच्चे ही नहीं शिक्षक-शिक्षिकाएं भी बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। एक शिक्षिका टाइफाइड से पीड़ित हैं।

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जिला मुख्यालय कन्नौज से करीब 17 किमी दूर बसे उमर्दा ब्लाक क्षेत्र के प्राथमिक स्कूल टूसावरी की सहायक अध्यापिका ऊषा सिंह कहती हैं, ‘‘विद्यालय परिसर के अंदर तालाब और गंदगी रहती है। गाँव के लोग भी गंदगी करते हैं। मच्छर बहुत लगते हैं। मैं खुद बुखार से पीड़ित हूं। टाइफाइड बताया गया है। 17 जुलाई से मेडिकल पर चल रही हूं।’’

कन्नौज से करीब 28 किमी दूर डबहा गाँव निवासी कामता प्रसाद (30 वर्ष) कहते हैं, ‘‘मेरे गाँव के प्राथमिक स्कूल के मैदान में पानी भरता है। बरसात में छत भी टपकती है। हेडटीचर विमलेश कुमारी हैं। गंदगी की वजह से संक्रामक रोग फैलने की संभावना है।’’ प्राथमिक स्कूल बर्छज्जापुर के हेड टीचर राघवेंद्र कुमार बताते हैं, ‘‘पानी का निकास ठीक नहीं है। हालांकि ईंट बिछवा दी गई हैं।’’

रिपोर्टिंग टीम: लखनऊ से मीनल टिंगल, गोरखपुर से जितेंद्र तिवारी, पीलीभीत से अनिल चौधरी, कासगंज से मो. आमिल, राजेश पाठक, दीपक तोमर, वाराणसी से विनोद शर्मा, कन्नौज से मो. परवेज और रवींद्र सिंह, मोहनलालगंज से श्वेता मिश्रा

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