देसी बीज अपनाएंगे तभी मिटेगी हर पेट की भूख, बढ़ेगी किसानों की आमदनी

देसी बीज अपनाएंगे तभी मिटेगी हर पेट की भूख, बढ़ेगी किसानों की आमदनीजानिए क्यों जरुरी था हमारे देसी और पारंपरिक बीजों का सुरक्षित होना।

जिस इलाके में गांधीजी ने सेवाग्राम बसाया वह आज कृषि संकट का पर्याय बन गया है। खेती की लागत बढ़ने लगी और आय घटने लगी। आज जिस क्षेत्र में कपास उगाई जा रही है उसका आधा अनाज, दालों और तिलहनों का क्षेत्र था। देसी बीज फेल नहीं होते थे।

केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय से लेकर तमाम राज्यों की सरकारें इन दिनों किसानों की आय को दोगुना करने से जुड़े तमाम सूत्रों पर चिंतन-मनन में लगी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सात सूत्री कार्ययोजना पर सबका जोर है और इसके लिए बीज से बाजार तक के लिए नई रणऩीति तैयार की जा रही है। टिकाऊ खेती की भी बात हो रही है और जीरो बजट से लेकर जैविक खेती की भी। लेकिन पूरी रणनीति में कहीं भी बीजों के समग्र विकास की चिंता नजर नहीं आ रही है और न ही देशी बीजों को बचाने की।

बीते साल विदर्भ के कृषि संकट की पड़ताल करते समय जाने माने किसान नेता विजय जावंधिया और कई प्रगतिशील किसानों से मिला था। उन्होंने बताया कि पहले वहां एक साल ज्वार और अगले साल देसी कपास बोया जाता था। यहां के असिंचित इलाके में किसान साल में एक ही फसल लेते थे और बागवानी उत्पादों से भी कुछ आय जुटा लेते थे। उस दौर तक कोई कृषि संकट नहीं था लेकिन नब्बे के दशक के बाद नकदी खेती जोर पकड़ने लगी।

काफी समय से विदर्भ में बीटी कपास और सोयाबीन का दबदबा है और परंपरागत ज्वार तो दो फीसदी खेतों में नहीं नजर आती। इसी तरह मोटे अनाज, दलहन और तिलहन भी गायब होते गए और स्वावलंबी खेती समाप्त होती गई।

विदर्भ में 56 फीसदी उथली मिट्टी है, जहां देसी कपास ही कारगर हो सकती थी

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किसानों के बचाए देसी बीजों से परम्परागत फसलें कम पानी में पैदा हो जाती थीं। सूखे के साल भी ये कुछ उपज दे ही देती थीं। लेकिन बीटी कपास और सोयाबीन ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया। बीटी कपास के महंगे बीजों से किसानों का भी हिसाब गड़बड़ा गया। पहले सफेद सोना नाम से खूब विज्ञापन निकले और दावा किया गया कि इससे इतना कपास पैदा होगा कि किसान मालामाल हो जाएगा। दावा यह भी किया गया कि कीट व्याधियां नहीं लगेंगी। लेकिन सब उलटा पुलटा हो गया। नई-नई कीट व्याधियां आ गईं और आज विदर्भ में 13 गुना ज्यादा कीटनाशक खपने लगा है। सैकड़ों सालों से संरक्षित देसी कपास के बीज गायब हो चले हैं और 95 फीसदी इलाका मोनसेंटों के बीजों के कब्जे में आ गया।

जिस इलाके में गांधीजी ने सेवाग्राम बसाया वह आज कृषि संकट का पर्याय बन गया है। खेती की लागत बढ़ने लगी और आय घटने लगी। आज जिस क्षेत्र में कपास उगाई जा रही है उसका आधा अनाज, दालों और तिलहनों का क्षेत्र था। देसी बीज फेल नहीं होते थे। लेकिन अंधी होड़ में न तो यहां की जमीनी हकीकत देखी गई न ही मिट्टी-पानी की पड़ताल की गई। विदर्भ में तो 56 फीसदी उथली मिट्टी है, जहां देसी कपास ही कारगर हो सकती थी, लेकिन सब उलटा हो गया तो इस इलाके में संकट पैदा होना ही था।

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लेकिन विदर्भ ही नहीं आज देश के कई हिस्सों में किसान कमोबेश खेती की लागत बढ़ने और फसलों का वाजिब दाम न मिलने के कारण संकट में है। खेती की लागत बढ़ने के तमाम कारणों में महंगा बीज भी एक बड़ा कारण है। हमारे देश के तमाम हिस्सों में सदियों से जो देसी प्रजातियां लोगों को खाद्य और पोषण सुरक्षा दे रही थीं वे नई बयार में गायब हो गईं। इनको बचाने की दिशा में सरकार देर से सजग हुई। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तहत राष्ट्रीय पौध आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो ने राष्ट्रीय जीन बैंक बनाया जिसके पास 1584 पौध प्रजातियों की 3,88,210 किस्में संरक्षित हैं। इन संरक्षित बीजों का उपयोग नए संकर किस्मों के विकास में हो रहा है।

धान की करीब 17 हजार किस्में और उप किस्में छत्तीसगढ़ में संरक्षित हैं

भारत में जाने माने कृषि वैज्ञानिक डॉ.आर.एच. रिछारिया ने काफी श्रम से धान की करीब 17 हजार किस्में और उप किस्मों को सूचीबद्ध किया था, जिसे छत्तीसगढ़ में संरक्षित रखा गया है। डॉ. रिछारिया ने स्थापित किया था कि देसी किस्मों में हरित क्रांति की किस्मों से कम ताकत नहीं रही है। हरित क्रांति की बौनी किस्मों और उससे जुडी तकनीक को भी उन्होंने चुनौती दी थी।

डॉ. रिछारिया ने किसानों और आदिवासियों की मदद से जो किस्में जुटाईं, जिसमें से नौ फीसदी ऐसी थीं जो बिना रासायनिक खादों के उपयोग के बहुप्रचारित बौनी किस्मों जितना उत्पादन देने की क्षमता रखती थीं। उऩकी राय थी कि ऐसी किस्मों को ही भारत में धान की खेती का मुख्य आधार बनाना चाहिए। लेकिन देसी बीजों को संरक्षित करने का काम सीमित आधार पर ही हो पाया।

आज जलवायु परिवर्तन की भी गंभीर चुनौती है जिससे निपटने के लिए सुरक्षित और स्थानीय जलवायु के अनुकूल प्रजातियों की दरकार है। हमारा 60 फीसदी इलाका बारानी (वर्षा पर निर्भर) है जहां किसानों की अलग चुनौतियां हैं। कई जैविक और अजैविक कारणों से भी कृषि क्षेत्र को जूझना पड़ रहा है जिससे खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका दोनों प्रभावित होती हैं।

यह भी ध्यान रखने की बात है कि देश में करीब 60 से 80 फीसदी किसान अपने बचाए या फार्म रक्षित बीजों से ही अपना काम चलाते हैं। गरीब किसानों के सामने किफायती मूल्यों पर गुणवत्ता वाले बीजों की उपलब्धता की समस्या है।

पारंपरिक किस्में अपने विशिष्ट गुणों के नाते सदियों से पोषण और भोजन सुरक्षा देती रही हैं

हमारी प्रमुख फसलों में बीज बदलने की दर 10 से 12 फीसदी ही है। गेहूं तथा धान में तो यह दर और भी कम है जबकि सब्जी के उन्नत बीजों की खपत बढ़ी है। लेकिन आज भारतीय बीज कारोबार का 75 फीसदी हिस्सा निजी क्षेत्र के कब्जे में आ गया है। 500 के करीब देशी-विदेशी बीज कंपनियां ताकतवर होती जा रही हैं, जबकि सार्वजनिक बीज कंपनियां डगमगा रही हैं। बीजों की गुणवत्ता और अन्य तथ्यों को लेकर संसद में बीज विधेयक 2004 से लटका हुआ है।

हमारी पारंपरिक देसी किस्में अपने विशिष्ट गुणों जैसे स्वाद, पोषकता और कीट व्याधियों से रोग प्रतिरोधी क्षमता आदि के नाते विभिन्न इलाकों को सदियों से पोषण और भोजन सुरक्षा देती रही है। अनाज, तिलहन और दलहनों की ऐसी तमाम पारंपरिक किस्मों के बीज सालों तक प्रयोग में लाए जाते रहे हैं। इन बीजों की तुलना में मौजूदा संकर बीजों से बेशक बेहतर उत्पादकता है लेकिन उसमें लागत अधिक आती है और बीज को हर साल बदलना होता है।

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कुछ दशकों में हमारी खान-पान की आदतें बदल गई हैं। मोटे अनाजों जैसे ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, सांवा, कोदों, तीसी और अलसी हमारे खेतों से नदारद होते गए। ये हमारी खेती और आहार का अहम हिस्सा थे और अलग-अलग ऋतुओं में इनका सेवन होता था। आजादी के बाद बनी कृषि नीतियों में गेहूं और चावल सबसे अहम हो गया। हालांकि कई मोटे अनाजों को तो सरकार ने एमएसपी के दायरे में रखा है लेकिन उनकी खरीद का कोई ठोस प्रबंध नही है। इनको पीडीएस का हिस्सा बनाया गया होता तो इससे गरीबों को खाद्य और पोषण सुरक्षा दी जा सकती थी।

हालांकि देसी बीजों को बचाने की मुहिम फिर से चल पड़ी है। सरकार पर इसके लिए दबाव पड़ रहा है। किसानों की कई पीढ़ियों ने जाने कितने श्रम से हजारों किस्मों को सहेज कर रखा था और आने वाली हर पीढ़ी ने उसे और विकसित किया लेकिन वे गायब हो गए। वहीं उदारीकरण के बाद चली नई बयार में भारत में कृषि क्षेत्र में निजी पूंजी निवेश और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रवेश के बाद हाईब्रिड प्रजातियों ने खूब जोर पकड़ा।

जब हमारी नीम और हल्दी का चिकित्‍सा गुण के कारण यूरोप में पेटेंट हो गया तो सरकार को भी इस मोर्चे पर सतर्क होना पड़ा। तब तक भारत में दुनिया की सबसे ताकतवर बीज कंपनियों का जाल बिछ चुका था। मोनसेंटो इंडिया लिमिटेड, सिंजैंटा इंडिया लिमिटेड, पायनियर हाईब्रिड इंटरनेशनल इंक और बायर क्राप साइंस जैसी विशाल कंपनियां बीज कारोबार में भारी धन कमा रही हैं। बेल्जियम, अमेरिका और उत्तरी कोरिया समेत कई देशों की कंपनियों ने बीज क्षेत्र में हाल के सालों में काफी निवेश किया है।

खान-पान की आदतें बदलीं तो ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी जैसे मोटे अनाज खेतों से गायब हो गए

हरित क्रांति बेशक जिन कारकों से आई उसमें बीज भी अहम कारक थे। लेकिन आज हरित क्रांति के दुष्परिणाम सामने हैं। रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाइयों ने मिट्टी की सेहत पर बहुत बुरा असर डाला है। भूजल के अत्यधिक दोहन और खारापन बढ़ने की वजह से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नया संकट खड़ा हो गया है और भारी बेचैनी दिख रही है।

अगर पंजाब की यह दशा है तो विदर्भ, मराठवाड़ा या बुंदेलखंड की दशा सहज समझी जा सकती है। किसान पहले आपस में अपने बचाए बीजों को जरूरतमंद किसानों के बीच बांट कर काम चलाते थे। लेकिन आज देश के तमाम हिस्सों में नकली बीजों का बड़ा बाजार खड़ा है। बीटी कपास के नकली बीजों की बिक्री की रिपोर्ट पर हाल में भारत सरकार के कृषि सचिव एस.के.पटनायक ने इसकी जांच का काम भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद को सौंपा है।

हाल के वर्षों में बीजों का आयात बढ़ रहा है। 2014-15 में 22,292 टन, 2015-16 में 23,477 टन और 2016-17 में 21,064 टन बीजों का आयात किया गया। इसमें से अधिकतर फल, फूल, सब्जियों आदि के साथ अन्न के बीज शामिल हैं। भारत सरकार बीजों के विकास पर काफी जोर दे रही है। देश में बीजों की उपलब्धता 380 लाख कुंतल है जो कि कुल मांग यानि 353 लाख कुंतल से अधिक है। 2017-18 के दौरान बीज ग्रामों की संख्या को दोगुना कर 60 हजार करने का काम गति पर है।

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हमारे प्रजनक या ब्रीडर बीजों के उत्पादन का जिम्मा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों पर है। राज्यों के कृषि फार्मों, राज्य बीज निगमों, सहकारी समितियों, राष्ट्रीय बीज निगम, कृभको और निजी कंपनियों के माध्यम से आधारी बीज तैयार होते हैं। बीजों की आपूर्ति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी मुख्यतया राज्यों की है।

भारतीय बीज कार्यक्रम के तहत तीन प्रकार की बीज श्रेणियां हैं प्रजनक, आधारी और प्रमाणित बीज। इस समय कृषि अनुसंधान परिषद देश की कृषि जलवायु के लायक नई बीज प्रजातियां विकसित कर रही है। बीते पांच सालों में खाद्य फसलों की 371 प्रजातियां और संकर किस्‍में विकसित हुई हैं। जैविक खेती पर भी सरकार ने जोर दिया है। लेकिन जरूरी है कि अगर परंपरागत खेती पर ध्यान देना है तो हमें देसी बीजों को बचाने की एक ठोस रणनीति बनानी होगी और क्षेत्रीय स्तर पर बीज संरक्षण के लिए एक संस्थागत आधार भी तैयार करना होगा।

देसी बीजों से दूरी का सबसे ज्यादा नुकसान कपास के किसानों को हुआ।

(लेखक राज्यसभा टीवी में वरिष्ठ पत्रकार हैं। गांव और किसान के मुद्दे पर देश का भ्रमण कर चुके हैं। ‘खेत-खलिहान’ गांव कनेक्शन में आपका साप्तहिक कॉलम है। )

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