इन 5  किसानों ने किया है ऐसा काम जिससे बरकरार रहेगा आपका देसी स्वाद

इन 5  किसानों ने किया है ऐसा काम जिससे बरकरार रहेगा आपका देसी स्वादमहाराष्ट्र के किसान ने 70 प्रकार के देसी बीज संरक्षित किए।

देश के लाखों किसान इस समय अपनी फसल बोने के लिए बाजार से हाइब्रिड बीज खरीदते हैं। बीते कुछ वर्षों में किसानों के पास अपने खुद के देसी बीज समाप्त हो गये हैं। किसानों के करोड़ों रुपए हर साल बीज पर खर्च हाे रहे हैं। देसी बीजों का संरक्षण हो, किसानों की बाजार से निर्भरता कम हो, इस दिशा में कुछ किसान आगे आए हैं जिन्होंने सैकड़ों प्रकार के देसी बीजों का संरक्षण किया है। जिससे थाली से गायब हुए देसी स्वाद को वापस लाया जा सके। ये किसानों को मुफ्त में देसी बीज देते हैं। किसान फसल पैदा करके इनके बीज वापस कर देते हैं। इनकी इस पहले से ज्यादा से ज्यादा किसानों के पास अपने खुद के देसी बीज हो सकते हैं।

महाराष्ट्र के युवा किसान अनिल गवली (26 वर्ष) के पास 70 प्रकार के देसी सब्जियों के बीज हैं, जो इन्होंने कई जिलों में जाकर संरक्षित किए हैं। इनका कहना है, “हर सब्जी को बोने के लिए हमें बाजार से बीज खरीदने जाना पड़ता था। बाजार में 15-20 प्रकार से ज्यादा सब्जियों के बीज नहीं मिलते थे। पुरानी सब्जियों का स्वाद हमारी थालियों से गायब होता जा रहा था, इसलिए मैंने सब्जियों के बीज इकट्ठा करने शुरू किए।”

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अनिल गवली (26 वर्ष) के पास 70 प्रकार के देसी सब्जियों के बीज।

वो आगे बताते हैं, “कुछ सालों की मेहनत में आज हमारे पास 70 प्रजातियों के देसी बीज हैं। मैं इन बीजों को किसानों को मुफ्त देता हूँ, किसान सब्जी लगाकर अगली साल मुझे ज्यादा मात्रा में बीज वापस कर देते हैं। हम हर साल नये किसानों को बीज देते हैं, और जो भी मुझसे बीज ले जाते हैं उनसे भी मैं यही कहता हूँ कि वो दूसरे किसानों को दें, जिससे ज्यादा से ज्यादा किसानों के पास अपना खुद का बीज हो।” अनिल गवली महाराष्ट्र के सोलापुर जिला के पोखरापुर गांव के रहने वाले हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाली किसान गोष्ठियों में अनिल जाकर देसी बीज का स्टाल लगाते हैं जिससे बहुत सारे किसानों तक देसी बीज पहुंच सके।

बाबूलाल दहिया ने 130 किस्में देसी धान की इकट्ठा की।

अनिल की तरह ही मध्य प्रदेश के 74 वर्षीय किसान बाबूलाल दहिया पर देसी बीज बचाने का जुनून कुछ इस तरह से सवार है कि उनके पास देसी धान की 130 किस्में हैं। इन बीजों को इकट्ठा करने के लिए इन्होंने मध्य प्रदेश के 40 जिलों में यात्रा की और धान सहित 200 किस्मों के देसी बीज एकत्रित कर लिए हैं।

मध्य प्रदेश के सतना जिले से 12 किलोमीटर दूर पिथौराबाद गाँव में रहने वाले बाबूलाल दहिया कविताएं, कहानी, लेख, मुहावरे, लोकोक्तियां लिखने के बहुत शौकीन हैं। देसी बीजों के संग्रह को लेकर अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, “ज्यादातर कहावतें देसी बीजों से जुड़ी होती थीं, मैंने सोचा देसी बीज विलुप्त होते जा रहे हैं तो मेरी कहावतें लिखने से कोई फायदा नहीं है, इसलिए वर्ष 2007 से बीज बचाने का काम शुरू कर दिया।” वो आगे बताते हैं, “शुरुआत में हमारे पास दो तीन किस्म के ही देसी बीज थे, हमारे यहां धान सबसे अच्छा पैदा होता था, उसकी ज्यादातर प्रजातियां विलुप्त हो गयी थीं, धान की किस्मों को बचाना हमारा मुख्य उद्देश्य था।”

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मध्य प्रदेश के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी पीएस बारचे छत्तीसगढ़ से पुराने बीज लाए।

मध्य प्रदेश शासन के खरगौन जिले के ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी पीएस बारचे ने अपने क्षेत्र में देसी बीजों को लेकर एक नई प्रथा शुरू की है। उनका कहना है, “हमारे यहां किसी का जन्मदिन हो या फिर शादी हम तोहफे में देसी बीज ही देते हैं। मैंने ये काम खुद से शुरू किया है, क्षेत्र के किसान इसे अब अपनी आदत में शामिल करने लगे हैं।”

पीएस बारचे कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ की यात्रा पर गये थे वहां से ये सामरी, कुसमी, धान, टाऊ, पिला, सरसों, गोंदली, रामतिल, मक्का, लहसुन, मिर्च जैसी तमाम प्रजातियाँ एकत्रित करके लायें हैं। ये देसी बीज को लेकर अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं, “मेरे पास 40 से ज्यादा प्राजाति के देसी बीज हैं, प्राकृतिक तरीके से खेती करने में देसी बीज की कारगार हैं। हाइब्रिड बीज जैविक खेती करने में उतना उत्पादन नहीं देते जितना देना चाहिए। अगर बंशी गेंहूँ की बात करें तो इसमें 18 पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जबकि बाकी गेहूं में आठ नौ प्रतिशत ही पोषक तत्व होते हैं।”

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आकाश चौरसिया ने 15 से ज्यादा किस्मों के देसी बीज एकत्रित किए।

देसी बीज की महत्ता को समझते हुए अब किसान इसके संरक्षण के लिए आगे आ रहे हैं। मध्य प्रदेश के ही सागर जिले के किसान आकाश चौरसिया (28 वर्ष) न सिर्फ एक साथ चार फसलें उगाते हैं बल्कि देसी बीजों का संरक्षण भी करते हैं। आकाश का कहना है, “जब हम किसानों की लागत कम करने की बात करते हैं तो हमें सबसे पहले किसानों की बाजार से निर्भरता हर तरह से कम करनी होगी। किसान बाजार में पैसा खर्च करने की बजाए बाजार से आमदनी ज्यादा पैदा करे। ये तभी संभव होगा जब किसान बीज, खाद, कीटनाशक दवाईयां बाजार से खरीदने की बजाए खुद बनाएगा।”

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आकाश सागर रेलवे स्टेशन से महज छह किलोमीटर दूर राजीव नगर में रहते हैं। इनका कहना है, “गेहूं की मेरे पास 15 से ज्यादा प्रजातियां हैं। अरहर की एक ऐसी प्रजाति है जिसे एक बार बोने पर पांच साल तक उत्पादन ले सकते हैं। जो भी किसान इस बीज को लेना चाहते हैं मुझसे ले सकते हैं। मैं बीज बैंक बड़े पैमाने पर शुरू करने जा रहा हूँ, जिससे हर किसान के पास अपना बीज हो, किसान खुद बीज बैंक बनाकर एक बाजार बनाए जिससे उसकी आमदनी बढ़ सके।”

आकाश के फॉर्म हाउस पर आते हैं हर महीने आते हैं सैकड़ों किसान।

देसी बीज के संरक्षण में युवा और अनुभवी हर तरह के किसान आगे आ रहे हैं। अलग-अलग राज्यों के किसान अपने-अपने स्तर पर बीज संरक्षित करने का काम कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिला मुख्यालय से 17 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में आलापुर गांव में मेन रोड पर अम्बेडकर बायो फर्टिलाइजर के नाम से ज्ञासी अहिरवार का कई एकड़ में प्लांट लगा है। एक साधारण किसान ज्ञासी अहिरवार (59 वर्ष) अपनी बीस एकड़ खेती में पुराने अनाज और सब्जियों की खेती जैविक ढंग से करते हैं। दिल्ली और देहरादून में इनकी सब्जियां और देसी अनाज की मांग होती हैं। ज्ञासी अहिरवार पढ़े-लिखे भले ही न हो पर ये इटली, जर्मनी जैसे कई देशों में खेती का अनुभव साझा करने के लिए जा चुके हैं।

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ज्ञासी अहिरवार का कहना है, “पुराने अनाज कोदो, कुटकी, ज्वार जैसे कई अनाज जो विलुप्त हो चुके हैं उनको दोबारा बचाने का प्रयास है, अपनी बीस एकड़ जमीन में सिर्फ देशी अनाज और सब्जियां उगाते हैं। पुराने अनाजों की मांग अब बहुत ज्यादा हो रही है, बीज भी किसान को बाजार से नहीं खरीदना है और उसका मुनाफा भी अच्छा मिलता है।”

अरहर का एक पौधा जो पांच साल तक देता है उपज।

सीतापुर जिले के 200 युवाओं ने बीज बैंक की शुरुआत की है। पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त करने के लिए इस जिले के तीन ब्लॉक के 10 गांव के युवा इस मुहिम में आगे आए हैं। ये युवा बीज बैंक बनाकर खुद नर्सरी तैयार करते हैं और फिर पौधरोपण करते हैं। सीतापुर जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर कसमंडा ब्लॉक के हरैया गांव में रहने वाली तनुजा रावत (25 वर्ष) का कहना है, “गांव में अब पौधे बहुत कम हो गये हैं, अगर नर्सरी खरीदें तो बहुत महंगी मिलती है, इसलिए 20 लोगों ने मिलकर जून महीने में कई तरह के बीज घड़े में राख में मिलाकर रख दिए, पहली बारिश होने पर नर्सरी लगा दी है, पिछले एक साल में अपने गांव और आसपास 150 पौधे लगा चुके हैं।’’

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सीतापुर के युवा एकत्रित कर रहे देसी बीज।

वो आगे बताती हैं, “इन पौधों की देखरेख 20 लोग ही कर रहे हैं, देखा देखी अब गांव के लोग भी आगे आने लगे हैं। अब तक नीम, जामुन, अर्जुन जैसे कई तरह के पौधे लगाये हैं, आने वाले समय में देसी आनाजों के भी बीजों को संरक्षित करेंगे।’’ तनुजा रावत जिले की पहली लड़की नहीं है जो इस मुहिम में शामिल है बल्कि तनुजा की तरह 200 लड़कियां और लड़के इस बीज बैंक और पौधारोपण की प्रक्रिया को आगे लेकर जा रहे हैं।

ये देश के अलग-अलग राज्यों से कुछ किसानों द्वारा देसी बीज को बचाने के लिए किये गये उनके खुद के अपने प्रयास हैं। अगर दूसरे किसान भी इनसे प्रेरित होकर देसी बाज का संरक्षण करें तो उनकी लागत कम होगी और उनकी थाली में पुराना स्वाद वापस आएगा।

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