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गोवंश विकास एवं अनुसंधान केन्द्र चित्रकूट : दूध से ज्यादा महंगा बिकता है गोमूत्र

चित्रकूट (सतना)। छुट्टा जानवर यानी अन्ना प्रथा से प्रभावित बुंदेलखंड के मध्यप्रदेश वाले हिस्से में एक ऐसी जगह है जहां दूध से महंगा गौमूत्र बिकता है। यहां देसी नस्ल की हजारों गायों में मिलेंगी, वो भी अलग-अलग नस्ल की। गाय भी ऐसी की आप देखते रह जाएंगे। ये राजनेता से सामाजिक कार्यकर्ता बने नानाजी देशमुख की देन है।

बांदा, ललितपुर, महोबा, चित्रकूट से लेकर बुंदेलखंड के ज्यादातर जिले छुट्टा गोवंश  यानि पशुओं से परेशान हैं। वहीं मध्यप्रदेश के चित्रकूट वाले हिस्से में हजारों गाए पाली गई हैं और उन्हें बढ़ावा दिया जा रहा है, यहां देश की विलुप्त हो रहीं देसी गाय की नस्लों के संरक्षण और नस्ल सुधार का काम किया जा रहा है।

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मध्य प्रदेश के सतना जिले से 87 किमी. दक्षिण दिशा में गोवंश विकास एवं अनुसंधान केन्द्र चित्रकूट में देश की 14 नस्लों के गोवंश एक साथ मिल जाएंगे। यहां पिछले 25 वर्षों से देसी गायों की 14 नस्लों के संरक्षण और विकास के लिए शोध किया जा रहा है। यहां पर गाय के दूध के साथ ही उनका गोमूत्र, गोबर से 28 तरह के उत्पाद भी बनते हैं।

अनुसंधान केन्द्र में साहीवाल (पंजाब), हरियाणा (हरियाणा), गिर (गुजरात), लाल सिंधी (उत्तरांचल), मालवी  (मालवा मध्यप्रदेश), देवनी  (मराठवाड़ा महाराष्ट्र), लाल कंधारी  (बीड़ महाराष्ट्र) राठी (राजस्थान), नागौरी (राजस्थान), खिल्लारी  (महाराष्ट्र), वेचुर (केरल), थरपरकर (राजस्थान), अंगोल (आन्ध्र प्रदेश), काकरेज (गुजरात) जैसी देसी गायों के नस्ल संरक्षण पर अनुसंधान चल रहा है।

केन्द्र के संचालक डॉ. राम प्रकाश शर्मा बताते हैं, "केन्द्र का मुख्य उद्देश्य देशी गायों के संरक्षण के लिए है, हमारे देश में लोगों की सोच बन गयी है कि दूध मतलब सिर्फ भैंस का अच्छा होता है। गाय का दूध 24 रुपए लीटर बिकता है वहीं गोमूत्र 140 रुपए लीटर बिकता है। एक गैर दुधारु गाय भी जितना खाती है उससे ज्यादा हमें देकर जाती है।"

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केन्द्र में हर एक नस्ल की गाय और उनके बच्चों को अलग-अलग बाड़ों में रखा जाता है। साथ ही हर नस्ल के साड़ों को नंदी आवास में अलग रखा जाता है। सांड़ों को उनके नाम से जाना जाता है जैसे रमेश, राजा, कबरा।

अनुसंधान केन्द्र में साल 2001 से केरल की दुर्लभ नस्ल वेचुर नस्ल का भी संरक्षण भी शुरु किया गया। अब यहां से गाय केरल भेजी जाती है। राम प्रकाश शर्मा वेचुर नस्ल के बारे में बताते हैं,  ''वेचुर नस्ल देश की सबसे छोटी नस्ल है जितना खाती है उससे ज्यादा हमें देती है, इसकी खास बात ये है कि ये कभी बीमार नहीं होती है हमारे यहां ही एक बार भी ये बीमार नहीं हुई।" राम प्रकाश शर्मा आगे बताते हैं,  ''लेकिन दुखद बात ये है कि कुछ गाय की नस्लें खत्म हो रही हैं जिनका दो-तीन वर्षों में अगर संरक्षण किया तो ये खत्म हो जाएंगी।"

अनुसंधान केन्द्र में गोबर से जैविक खाद, पंचगव्य निर्मित दवाएं भी बनती हैं। यहां पर 25 घन मीटर के दो गोबर गैस सयंत्र भी लगे हैं जिससे यहां के दस घरों में 24 गैस की सप्लाई होती है जिससे सभी घरों में गोबर गैस पर ही खाना बनता है। यहां पर हर साल जनवरी और जून के महीने में गाय और बछड़ों की बिक्री भी होती है। यहां पर दूसरे प्रदेश से भी लोग गाय खरीदने आते है।

अन्ना प्रथा में हो रहा है सुधार

अन्ना प्रथा के बारे में डॉ राम प्रकाश शर्मा बताते हैं,  ''अन्ना प्रथा में लोग ऐसी गायों को खुला छोड़ते हैं, जो गाय दूध नहीं देती है। इस लिए हम अपने यहां से अच्छी नस्ल के साड़ों को दूसरी जगह भेजते हैं जिससे उनकी नस्ल सुधार में मदद मिलेगी।

नस्ल सुधार के लिए मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश के अलग-अलग गाँवों में गिर, राठी व साहीवाल के 48 सांड़ भेजे गए हैं, जिससे अन्ना प्रथा पर रोक लग सके।

प्रोटीन के लिए एजोला है बढिय़ा विकल्प

यहां पर दुधारु गायों को चारे के साथ एज़ोला फर्न दिया जाता है। एजोला एक तरह का फर्न होता है जो पशु आहार में प्रोटीन की कमी को पूरा करता है। डॉ राम प्रकाश शर्मा बताते हैं,  ''ये एक तरह का फर्न होता है इसे पक्की नाली में उगाया जा सकता है। अगर पक्की नाली न हो तो गड्ढा खोदकर एक पॉलीथीन बिछाकर उसपर एक इंच मोटी गोबर और मिट्टी की तह बिछा देते हैं और उस में पानी भर देते हैं। पानी भरने के बाद उसमें एजोला डाल देते हैं जो कुछ दिनों में बढ़ जाती है। जिसे धोकर हर पशु को एक किलो की मात्रा में देते हैं। जो की सस्ता पशु आहार है।"

बकरियों का भी हो रहा नस्ल सुधार

केन्द्र ने ललितपुर से बुंदेलखंड नस्ल के बकरे भी दिए हैं, जिससे अब 4000 से भी ज्यादा बकरियों का नस्ल सुधार हो गया है। लोगों ने यहां बरबरी व जमुनापारी बकरी का पालन शुरु किया था, जो यहां के वातावरण में ढ़ल नहीं पा रहे थे, इसलिए बुंदेलखंड नस्ल के बकरों से नस्ल सुधार किया जा रहा है।

काम के अनुसार तीन भागों में बांटा जाता हैं इन्हें

दुग्ध प्रधान जाति

साहीवाल, गिर, राठी, और लाल सिंधी गाय दुग्ध उत्पादन के लिए ठीक होती हैं।

वत्स्य प्रधान

वत्स्य प्रधान में वो नस्ल आती हैं जिनके बैल खेती के काम आते हैं।  इनमें नागौरी, खिल्लारी, वेचुर और मालवी नस्ल आती है।

द्विगुण सपन्न

इनमें वो नस्ल आती हैं जो दुग्ध उत्पादन और खेती दोनों के काम आती है।