क्या ‘अम्मा’ की तरह तमिलनाडु की राजनीति में भी चलेगा रजनीकांत का जादू ?

क्या ‘अम्मा’ की तरह तमिलनाडु की राजनीति में भी चलेगा रजनीकांत का जादू ?रजनीकांत का जादू

तमिलनाडु के लोगों का दो चीजों से जुड़ाव बहुत गहरा है - सिनेमा और राजनीति। जब ये दोनों चीजें एक साथ जुड़ जाती हैं तो फिर समझिए सोने पर सुहागा हो गया। अभी हाल ही में तमिलनाडु की राजनीति में लोग जयललिता को देवी की तरह पूजते थे। अब दक्षिण के सुपरस्टार रजनीकांत के राजनीति में आने की घोषणा के बाद क्या जयललिता जैसा दौर वापस आ पाएगा? रजनीकांत व जयललिता दोनों में ही एक ख़ास बात और है वो ये कि ये दोनों ही तमिल नहीं हैं। जयललिता कन्नड़ थीं तो रजनीकांत मराठी हैं।

क्या बीजेपी से मिलाएंगे हाथ

जैसे ही रजनीकांत के राजनीति में आने की ख़बरें आईं उसके साथ ही एक और चर्चा ने ज़ोर पकड़ लिया कि रजनीकांत बीजेपी से हाथ मिला सकते हैं यानि कि अगर तमिलनाडु में उनकी पार्टी जीतती है तो वह केंद्र में बीजेपी का साथ देंगे। हालांकि 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जिस तरह ए राजा और करुणानिधि की बेटी कनिमोझी को क्लीनचिट मिली है उससे ये भी अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि कांग्रेस से समर्थन वापस लेकर करुणानिधि की पार्टी डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) बीजेपी से हाथ मिला सकती है।

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2016 के विधानसभा चुनाव में एआईएडीएमके ने 134 सीटें जीती थीं जबकि डीएमके व कांग्रेस के गठबंधन ने 98 सीटों पर जीत हासिल की थी लेकिन जयललिता की मौत के बाद एआईएडीएमके का हाल बुरा है और अब डीएमके पर लगा 2 स्पेक्ट्रम घोटाले वाला दाग भी मिट चुका है। ऐसे में डीएमके के लिए अगला विधानसभा चुनाव बेहतर साबित हो सकता है, वहीं अगर रजनीकांत की पार्टी ने बहुमत हासिल कर लिया तो तस्वीर कुछ अलग ही होगी।

ये है अभी राजनीति का हाल

जयललिता की मौत के बाद से तमिलनाडु की राजनीति बहुत बुरे दौर से गुज़र रही है। उनकी पार्टी एआईएडीएमके (ऑल इंडिया अन्ना द्रमुक मुनेत्र कड़गम) दो हिस्सों में बंट गई। एक तरफ शशिकला हैं तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री पलनिसामी और पूर्व मुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम हैं। राजनीतिक विशेषज्ञ ऐसा अनुमान लगा रहे थे कि पन्नीरसेल्वम बीजेपी का हाथ थाम लेंगे लेकिन हाल ही में आरकेनगर की सीट पर हुए चुनाव शशिकला के भतीजे दिनकरन की जीत हो गई जिसके बाद एआईएडीएमके व बीजेपी के समीकरण बिगड़ते नज़र आ रहे हैं।

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फिल्मी दुनिया का असर

दक्षिण की राजनीति में हमेशा से ही फिल्मी दुनिया के लोग शामिल रहे हैं। 1977 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने वाले एमजी रामचंद्रन तमिल सिनेमा के मुख्य अभिनेताओं में से एक थे। वह 1977 से 1987 तक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे। उनकी शिष्या जयललिता 1991 से 1996 , 2001 में, 2002 से 2006 तक और 2011 से 2014 तक तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं। 2016 में एक बार फिर उन्हें तमिलनाडु का मुख्यमंत्री चुनाव गया। इसके अलावा डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) प्रमुख करुणानिधि भी तमिल फिल्मों के पटकथा लेखक थे। इन सभी का राजनीतिक करियर तमिलनाडु में बेहतरीन रहा। तमिलनाडु की जनता ने खुली बाहों से इनका स्वागत किया था। ऐसे में रजनीकांत के राजनीति में आने के फैसले के बाद ये अनुमान लगाया जा रहा है कि तमिलनाडु के जो राजनीति इस समय बेहद बुरे दौर से गुज़र रही है उसे नई उम्मीद मिलेगी।

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जनता का प्यार

तमिलनाडु की जनता की ये खास बात है कि वहां रील राइल के हीरो लोगों के लिए रियल लाइफ हीरो बन जाते हैं। आपने देखा होगा कि कैसे रजनीकांत के जन्मदिन पर लोग उनके आदमकद पोस्टर बनवाते हैं। उनके ऊपर दूध, फूल - माला चढ़ाकर उनकी पूजा करते हैं। रजनीकांत की जब कोई नई फिल्म रिलीज़ होती है तो लोग करोड़ों रुपये में एक टिकट खरीदने तक को तैयार हो जाते हैं। जयललिता की मौत के बाद उनके कई समर्थकों के आत्महत्या करने की ख़बरें भी आई थीं। ये वहां की जनता का अपने सिनेमा और राजनीति के स्टार के लिए प्यार है और जुनून भी। एक फिल्म स्टार के तौर पर वहां की जनता ने रजनीकांत को जो प्यार दिया है अगर उनका वही जादू राजनीति में भी चल गया तो ये दक्षिण की राजनीति में नया इतिहास रचेगा।

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