क्योंकि वे गरीब किसान और मजदूर हैं, इसलिए इनकी मौतों पर चर्चा नहीं होती

क्योंकि वे गरीब किसान और मजदूर हैं, इसलिए इनकी मौतों पर चर्चा नहीं होतीनाव दुर्घटनाओं में हर साल सैकड़ों लोग मारे जाते हैं।

संचार क्रांति के इस दौर में भी भारत के कई दुर्गम देहाती इलाकों में छोटी बड़ी नदियों को पार करने के लिए जर्जर नौकाएं ही सहारा बनती हैं। देश में हर साल औसतन एक हजार लोग नौका दुर्घटनाओं में मरते हैं। इनमें अधिकतर किसान और मजदूर होते हैं। लेकिन उनकी तरफ न तो सरकार का ध्यान जाता है न ही प्रशासन का। किसी घटना पर मीडिया में अधिक हल्ला मचा तो कुछ मदद कर दी जाती है।

जिस दिन भारत में बुलेट ट्रेन की आधारशिला रखी जा रही थी उसी दिन भारत की राजधानी दिल्ली से सटे उत्‍तर प्रदेश के बागपत जिले में भोर 6.30 बजे यमुना नदी में हुई एक नाव दुर्घटना में 19 लोगों ने अपनी जान गंवा दी। मरने वालों में 14 खेतिहर मजदूर महिलाएं थीं। जिला मुख्यालय से महज छह किमी दूर काठा गांव के पास हुई यह दुर्घटना मीडिया की सुर्खियों में आयी। 14 सितंबर को ही राष्ट्रपति भी अपने नागरिक अभिनंदन में लखनऊ पहुंचे थे, इस नाते आनन फानन में प्रशासन सक्रिय हुआ। मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये की सहायता और माजिस्ट्रेटी जांच की घोषणा कर दी।

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यमुना के तटीय इलाको में कांठा गांव जैसे तमाम गांव हैं, जहां के लोगों की जमीन उस पार यमुना नदी से लगी हरियाणा की सीमा में पड़ती है। रोज किसान और मजदूर नाव से ही अपने खेतों में काम करने जाते हैं। उनकी जिंदगी में लकड़ी की ये नौकाएं ही संचार का सबसे बड़ा जरिया हैं। उस भोर में भी रोज की तरह काम करने निकले थे लेकिन यह उनकी आखिरी यात्रा साबित हुई। 22 लोगों की क्षमता वाली इस नाव पर55 लोग सवार थे। ऐसे इलाकों की नौकाओं में सुरक्षा जैकेट से लेकर दूसरे सुरक्षा इंतजाम नहीं होते और न ही इनकी हालत की पड़ताल करने कोई अधिकारी पहुंचता है।

इस घटना में गनीमत यह थी कि इलाकाई सांसद और केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह दल बल के साथ पहुंचे और देर से ही सही पीएसी और एनडीआऱएफ ने शव निकाल लिए। लेकिन किसान आंदोलन के गढ़ रहे इस इलाके में हुई इस घटना ने ग्रामीणों को ऐसा आक्रोशित कर दिया कि उन्होंने शवों के साथ दिल्ली- सहारनपुर हाईवे जाम कर दिया और काफी हंगामा किया।

नाव चालक रिजवान मौके से ही फरार हो गया था लेकिन बाद में पकड़ा गया औऱ उसने माना कि नाव पर जरूरत से अधिक लोग सवार थे। घटना के बाद कई विपक्षी नेता भी मृतकों के घर पहुंचे। कांग्रेस नेता पीएल पूनिया ने इसे प्रदेश सरकार की लापरवाही मानते हुए 20-20 लाख के मुआवजे की मांग की। वही बागपत की घटना पर शोक जताते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के अभिनंदन समारोह के आखिर में मृत व्यक्तियों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की गयी।

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बागपत की घटना के बाद 18 सितंबर को असम के गोआलपाड़ा जिले में शाबोंग नदी में तीन नौकाओं के पलटने से 10 लोगों की मौत हो गयी। ये ग्रामीण सबोन गांव में नौका दौड़ देखने गए थे। इसी तरह कुछ और दुर्घटनाएं भी हुई हैं। इसी साल अप्रैल के अंत में इलाहाबाद के घूरपुर थाना क्षेत्र में ग्रामीण इलाके में यमुना नदी में ही एक नाव पलटने से दो बच्चों समेत तीन लोगों की मौत हो गयी थी। इस घटना पर भी मुख्यमंत्री ने संवेदना जतायी थी। यहां भी नाव पर क्षमता से ज्यादा भार और सवारी लदी थी। घूरपुर के पालपुर गांव स्थित यमुना घाट से सैकड़ों लोग रोज ऐसी ही नावों से इस पार से उस पार आते जाते हैं।

21वीं सदी और भारत की आजादी के 70 सालों के बाद भी देश के तमाम दुर्गम और विकास से कटे कई ग्रामीण इलाकों में संचार और परिवहन क्रांति के बावजूद प्राचीन तकनीक की लकड़ी की नौकाएं किसानों और मजदूरों के लिए जीवन रेखा बने हुए हैं। देसी नौकाओं की दुर्घटनाओं से हर साल 700 से एक हजार लोगों की औसतन मौतें होती हैं और काफी माल भी डूब जाता है। गनीमत यह है कि नदी किनारे के लोगों को नदियों से मुकाबला करना आता है और बाढ़े उनको तैरना और धारा के खिलाफ लड़ना सिखा देती है अन्यथा मौतों का यह आकंड़ा और बड़ा हो जाता।

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नावें उन इलाकों में चलती हैं, यहां पुल नहीं बने हैं या सड़क से दूरी कई गुना अधिक है। तमाम इलाकों में देसी नौकाएं भी मयस्सर नही है तो दूसरे जुगाड़ पार करने के काम आते हैं। लेकिन ऐसी नाव दुर्घटनाओं के शिकार आम तौर पर किसान और मजदूर और गरीब लोग ही होते हैं। उनको न तो ठीक से मुआवजा मिलता है न इनकी बदहाली देखने कोई आता है।

आज भी असम, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, केरल और कई राज्यों में देसी नौकाएं लाखों लोगों के यातायात और माल परिवहन के काम आ रही हैं। तमाम दावों के बावजूद इनकी सुरक्षा का इंतजाम और फेरीघाट भगवान भरोसे चल रहे हैं। अंतर्देशीय जल परिवहन नीति (2001) में भी इस तथ्य को स्वीकार किया गया जल परिवहन क्षेत्र का सुरक्षा रिकार्ड उत्साहवर्धक नहीं है। खास तौर पर बाढ़ के दिनों में देसी नौकाओं की कई बार दुर्घटनाएं होती हैं।

जिला प्रशासन द्वारा उचित निगरानी तंत्र का अभाव, क्षमता से अधिक यात्रियों को लादना और पुरानी नौकाओं की समय पर मरम्मत या देखरेख न होने जैसे कारण इसके पीछे जिम्मेदार हैं। इस क्षेत्र की सुरक्षा और संरक्षा का जिम्मा राज्य सरकारों पर है, जबकि राष्ट्रीय जलमार्गों पर सुरक्षित नौवहन का दायित्व भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण पर है। लाइफ जैकेट और दूसरे सुरक्षा उपायों पर कहीं ध्यान नहीं दिया जाता और दुर्गम इलाकों की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। हमारे यहां अधिकतर नौका दुर्घटनाएं मानसून में होती हैं। पूर्वोत्तर भारत में बड़ी संख्या में इंजनों से लैस नौकाएं काफी बड़ा खतरा बनी हुई हैं। बिना लाइसेंस के भी बहुत सी नौकाएं चलती हैं। असम में तो करीब 60 से 70 फीसदी नौकाओं को ग्राम पंचायतों से लाइसेंस मिला हुआ है। वे राज्य सरकार से फिटनेस प्रमाणपत्र लेने में भी विफल रहती हैं।

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2012 में असम में हुए भयानक नौका हादसे ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। इसमें करीब 400 मौतें हुईं और राहत तथा बचाव का काम तीन दिनों तक चला था जिसमें एनडीआरफ से लेकर बीएसएफ और सेना तक की तैनाती की गयी थी। इस दुखद घटना के बाद सरकार ने सुरक्षित नौवहन के लिए कई कदम उठाए हैं। कई राज्यों ने भी पहल की लेकिन बाद में फिर वही ढाक के तीन पात। असम के बाद बिहार में नावें लाखों लोगों को आर पार पहुंचाती है लेकिन यहां बुरी दशा है। जिस नाव पर 15 से 20 लोगों को सफर करना चाहिए उसमें 80 से अधिक लोग सवार रहते हैं औऱ ऊपर से मोटर साइकिल और काफी सामान लाद लिया जाता है। नाव माफिया और घाट माफिया को लोगों की जिंदगी की परवाह नहीं होती है।

इसी साल जनवरी में पटना के सबलपुर दियारा में गंगा नदी में 40 लोगों को ले जा रही एक नाव के डूब जाने से अब तक 24 लोगों की मौत हो गयी, जबकि 10 लोगों को बचा लिया गया। सायंकाल हुई इस घटना पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी चिंता जतायी औऱ मृतको के परिजनों को दो लाख रुपये और गंभीर घायलों को पचास हजार की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की।

हाल के सालों में नौका दुर्घटनाओं में 2009 में केरल में हुई दुर्घटना भी काफी चर्चा में रही जिसमें 45 पर्यटकों की मौत हो गयी थी। इस नौका में भी 70 लोगों की क्षमता के बावजूद 17 अतिरिक्त लोग सवार थे और किसी भी यात्री ने लाइफ जैकेट नहीं पहना हुआ था। बाद में हुई जांच पड़ताल औऱ हाईकोर्ट की सख्ती के बाद कई कड़े कदम उठे और नौकाओं को जरूरी साजो सामान से लैस किया गया। जब केरल जैसे राज्य में यह हाल हो सकता है तो बाकी इलाकों का अंदाज लगाया जा सकता है जहां घाट और नौकाएं दोनों भगवान भरोसे हैं।

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हाल की घटनाओं की समीक्षा से तमाम गंभीर खामियां उजागर होती हैं। सिंतबर 2009 में बिहार में खगडिय़ा में बागमती नदी में हुई एक बड़ी नौका दुर्घटना में 56 मौतें हुईं। इसमें भी क्षमता से अधिक और सौ लोग सवार थे। 15 जून, 2010 को बलिया में एक जर्जर नौका के दो हिस्सों में बिखर जाने से 47लोगों ने जानें गंवा दी। 24 मई 2011 को बदायूं फर्रूखाबाद सीमा पर गंगा नदी में एक नौका डूब जाने से इसमें सवार 26 लोग डूब गए। उसहैट (बदायूं) के अटैना गंगा घाट से करीब सवार होकर ये लोग फर्रूखाबाद जा रहे थे।

इसी प्रकार मऊ जिले के रणवीरपुर गांव के पास तमसा नदी में डोंगी पलटने से मनरेगा की छह महिला मजदूर मारी गयीं। जिला प्रशासन ने इनके परिजनों को 20-20 हजार रुपए देने की घोषणा की। डोंगी ती क्षमता पांच सवारियों की थी पर 14 लोग सवार हो गए थे। इसमें पतवार भी नहीं थी और महिलाएं डोंगी को चप्पल से ही खे रही थीं। बिहार में खगड़िया जिला बाढ़ ही नहीं नौका दुर्घटनाओं के लिए भी कुख्यात है। यहां 2006 से अब तक हुई नौका दुर्घटनाओं में 158 लोगों ने जान गंवाई हैं, जबकि सरकार ने इनके परिजनों को 1 करोड़, 74 लाख रुपये की मदद का दावा किया है। अगर ये रेल या हवाई जहाज में मरे होते तो इनकी जान की कीमत कई गुना अधिक होती।

जल परिवहन सुरक्षा के लिए बने मानकों के तहत नौकाओं के लाइसेंस लेना औऱ उनका हर साल नवीनीकरण कराना जरूरी है। नौका चालक का लाइसेंस होना भी जरूरी है और क्षमता से अधिक सवारियां नहीं बैठें, यह सुनिश्चित करना भी। बिना इंजन की नाव पर अधिकतम 35 सवारी बैठ सकती है, जबकि 15 हार्सपावर के इंजन वाली नौका पर अधिकतम 52 लोगों के बैठने की अनुमति है। इसी तरह नावों में जीवन रक्षा जैकेट होना जरूरी है। सू्र्यास्त के बाद नाव चलाने की मनाही है। नावों का पट्टेदार अतिरिक्त नाव और दो गोताखोर भी तैनात रखे और अगर नाव इंजन चालित है तो उसे ठीक दशा में रखा जाये। लेकिन दुर्गम इलाकों में इन सारे प्रावधानों की अनदेखी आम बात बनी हुई है।

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तमाम दुर्गम ग्रामीण इलाकों में नौका दुर्घटनाएं होती हैं तो जिला मुख्यालय से आपदा प्रबंधन टीम पहुंचने में इतनी देर हो जाती है कि केवल लाशें ही निकाली जा सकती हैं। अधिकतर दुर्घटनाएं ऐसे इलाकों में होती है जहां न मीडिया पहुंचता है न ही प्रशासन। नौका दुर्घटनाओं में मरने वालो के आश्रितों को मुआवजा देने की ठोस नीति नहीं है। कहीं परिजनों को 20 हजार रुपए दे दिया जाता है तो कहीं एक या दो लाख। मीडिया या विपक्ष अधिक हल्ला मचा देता है तो मुआवजा बढ़ जाता है।

लेकिन नौका दुर्घटनाओं को रोकने के लिए राज्य सरकारों ने जो कानून बनाए हैं, पर वे भी देसी नौकाओं जैसे ही जर्जर हो चुके हैं। बिहार जैसे राज्य में कड़ा कानून है तो भी तस्वीर बदली नहीं है। जबकि विकास से कटे कई नदी तटीय इलाकों में नौकाएं ही ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ा संचार का जरिया हैं। तमाम छोटे शहरों में भी पुल और फ्लाईओवरों का जाल बिछ रहा है लेकिन बड़ी नदियों को छोड़ दें तमाम छोटी या सहायक नदियों पर भी बहुत से ऐसे जगहो पर हम पुल नहीं बना पाए हैं, जहां उनकी बहुत जरूरत है।

हर बार चुनावों में पुलों का मसला उठता है। वायदे करके नेता भूल जाते हैं। कई जगहों पर ग्रामीणों ने खुद बांस या लकड़ी के पुल बनाने की कोशिश की है। लेकिन मानसून के दिनों में कई इलाकों में नौकाएं ही सबसे मददगार होती हैं। काफी संख्या जर्जर नौकाओं का संचालन प्रशासन की जानकारी में होता है।

इस नाते जरूरी है कि नदी तटीय इलाकों के लिए ठोस नीति बने। जहां अभी भी पुलों या वैकल्पिक व्यवस्था संभव नही है वहां पर नौका घाटों को बेहतर बनाने की दिशा में ठोस पहल की जानी चाहिए। नदी घाटों पर आधारभूत ढांचे पर अगर धन खर्च करके सुरक्षा इंतजामों को दुरुस्त कर लिया जाये तो ऐसी दुर्घटनाओं को टाला जा सकता है।

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