बातें गांधी की करेंगे और काम नेहरू का, तो किसान तो मरेगा ही 

बातें गांधी की करेंगे और काम नेहरू का, तो किसान तो मरेगा ही खैरात बांटने का काम मायावती और अखिलेश यादव ने भी किया था और उसके पहले वालों ने भी।

उत्तर प्रदेश के किसानों का फसली कर्जा माफ़ कर दिया गया तो मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, पंजाब और तमिलनाडु से कर्जा माफी की आवाज उठने लगी । कल सारे देश से आवाज उठेगी हमें कर्जा दो और उसे माफ कर दो। या फिर मुफ्त में बीज, खाद, पानी दे दो और हम जो पैदा कर पाएंगे, औने-पौने बेचते रहेंगे। यदि यही है तो नई सरकार ने नया क्या सोचा किसानों के बारे में। क्या किसान पिछली सरकारों से बेहतर हालत में है आज ? खैरात बांटने का काम मायावती और अखिलेश यादव ने भी किया था और उसके पहले वालों ने भी।

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क्या पुरानी सरकारों की खैरात वाली डगर पर चलकर किसान की आय दूनी हो जाएगी? उसकी आय दूनी होगी जब उसका आलू, टमाटर और प्याज उसकी लागत से दूने दाम पर बिकेगा। दालों के दामबढ़े तो आप ने दाल का आयात कर लिया और दालों के दाम चौथाई स्तर पर आ गए। किसान को क्यामिला क्योंकि किसान तो जो बोता है, वहीं खाता है, दाल खरीद कर नहीं खाता। किसान मेन्था बोता है तो उसके बच्चों की पढ़ाई शायद हो जाए लेकिन सेहत नहीं सुधरेगी । बहुतों को पता होगा कि चीन नेमेंथा की खेती प्रतिबंधित कर दी थी।

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आप ने खैरात बांट कर किसानों की आत्महत्याएं बन्द करनी चाहीं, लेकिन यह नहीं सोचा किआत्महत्या की नौबत ही क्यों आई। आज से 50 साल पहले भी किसान कर्जा लेता था, ब्याज देता थाऔर रुखा-सूखा खाकर जीवन बिताता था, लेकिन आत्महत्या नहीं करता था। आत्महत्या इसलिए करता है कि पहले की सरकारों ने कर्जा माफी की आदत डाली और जब बैंकों ने वसूली आरम्भ की और सिर से बड़ी आंख हो गई यानी मूलधन से अधिक ब्याज हो गया तो उसे कोई रास्ता नहीं दिखाई पढ़ा जीवन लीला समाप्त करने के अलावा।

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आखिर उपाय क्या है? किसान जो कच्चा माल पैदा करता है उससे गाँवों में उद्योग लगाकर गाँव में हीसामान बने जैसे तेल, दलिया, बेसन, चिप्स, सॉस, चॉकलेट आदि और किसान का गाँव में ही लागतमूल्य वसूल हो जाए। मोदी जी कहते तो हैं कि हम आटा बाहर भेजते हैं और रोटी आयात करते हैं। यह सटीक है किसान के लिए जो गेहूं, चावल, दालें, सब्जियों को शहर भेजता है और टॉनिक, सॉस, ब्रेड,चाकलेट बच्चों के लिए महंगे दाम पर खरीदता है। हम गांधी जी के नाम की माला तो जपते हैं, लेकिन स्वावलम्बी गाँव जो गांधी जी का सपना था, उसके लिए क्या किया।

वर्तमान परिस्थितियों में गाँव के कर्मठ नौजवान यदि बड़ी, मुंगौड़ी, पापड़, बेसन और दलिया जैसीचीजें बनाना भी चाहें तो क्या सरकार खरीदेगी? वह आलू पांच रुपया किलो खरीदने को तैयार है तोकितने किलो खरीदा। यदि किसान की लागत छह रुपया प्रति किलो है और आप पांच में खरीद रहे हैं, कोई मेहरबानी नहीं कर रहे हैं। शहरी इलाकों की जरूरतों को पूरा करने के लिए आयात बन्द हो औरबाजार में जो उपलब्ध हैं खाइए। किसान यदि गुड़ बनाना चाहता है तो लाइसेंस चाहिए, आटा चक्कियां तेल घानी के लिए लाइसेंस चाहिए। तो दूसरों को यह सब करने के लिए प्रेरित करिए, जिससे किसानों के बच्चे उन कुटीर उद्योगों में काम पाएंगे।

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जब तक आप बातें गांधी की करेंगे और काम नेहरू वाला करेंगे तो किसान तो मरेगा ही और देश फिर से पीएल 480 का गेहूं खोजेगा। कभी-कभी शास्त्री को भी याद करिए। आवश्यकता है किसान की क्रयशक्ति बढ़ाने की जो तभी बढ़ेगी, जब उसके द्वारा पैदा किया हुआ कच्चा माल गाँवों में बने कारखानों में प्रयोग होगा। उसकी कर्जा चुकाने की आदत को मारिए नहीं, बल्कि उसे बल दीजिए।किसान के हित अनेक बार व्यापारी के हितों से टकराते हैं तब आप को निर्णय करना होगा, प्राथमिकता क्या हो?

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