भारत से विलुप्त हो चुकीं हैं कछुओं की 17 प्रजातियां, जानिए क्या है इसका कारण

भारत से विलुप्त हो चुकीं हैं कछुओं की 17 प्रजातियां, जानिए क्या है इसका कारणकछुओं की बढ़ रही तस्करी और व्यापार से कछुओं की संख्या लगातार कम होती जा रही है।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। कछुओं की बढ़ रही तस्करी और व्यापार से कछुओं की संख्या लगातार कम होती जा रही है। बढ़ता जल प्रदूषण भी इनके अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है। भारत में करीब 17 कछुओं की प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं।

कछुओं की विलुप्त हो रही प्रजातियों के बारे में टर्टल सर्वाइवल एलायन्स (टीएसए) के टर्टल रेस्क्यू स्पेशलिस्ट डॉ. शैलेंद्र सिंह बताते हैं, “बड़े स्तर पर इनकी अवैध तस्करी होती है। दक्षिण पूर्व में इनकी डिमांड सबसे ज्यादा है। औषधियों गुणों के कारण इनके शरीर के अंगों से दवाएं बनाई जाती हैं। इनसे आभूषण भी तैयार किया जाता है। इनके संरक्षण के लिए हमारी संस्था भी काम कर रही है। कई कछुओं को चिप लगाकर उन पर रिसर्च किया जा रहा है।”

कछुए जलीय परितंत्र को साफ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये पानी की सड़ी वनस्पति खाते हैं, जिससे जल प्रदूषण दूर होता है। डॉ. शैलेंद्र आगे बताते हैं, “इनको बचाने के लिए लोगों को भी जागरूक होना पड़ेगा। जो लोग कछुए को घर में पालते हैं वो ऐसा बिल्कुल न करें। इन कछुओं को अपने नजदीकी डीएफओ या फिर चिड़ियाघर में दे सकते हैं। इससे कछुओं की प्रजातियों को बचाया जा सकेगा।”

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अमेरिकी कछुआ बचाव (एटीआर) ने विश्व कछुआ दिवस मनाने की शुरुआत 1990 में की थी और तब से हर साल दुनिया भर में 23 मई को विश्व कछुआ दिवस मनाया जाता है। लखनऊ में मंगलवार को कुकरैल स्थित पिक्निक स्पॉट पर विश्व कछुआ दिवस मनाया गया। इस अवसर पर छात्र-छात्राओं को कछुओं के बारे में जानकारी दी गई साथ ही नुक्कड़ नाटक प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया।

गोमती में महज आठ से 10 प्रजाितयां ही बचीं

टर्टल सर्वाइवल एलायन्स में सर्वे के मुताबिक, गोमती में कछुए की महज आठ से 10 प्रजातियां ही बची हैं। पहले 12 से 15 प्रजातियां पाई जाती थीं। वर्ष 2003 में कछुए की ढोर प्रजाति पूरी तरह से गायब हो चुकी हैं। गंगा में गंदगी खत्म करने के लिए वर्ष 1989 में गंगा एक्शन प्लान के तहत सात किमी. क्षेत्र को कछुआ सेंचुरी के रूप में विकसित कर नदी में 100 कछुए छोड़े गए, लेकिन काशी के लोगों के अनुसार ये कछुए भी अब तट पर नजर नहीं आते हैं।

बनारस के अस्सी इलाके के रहने वाले धर्मेंद्र तिवारी (48 वर्ष) बताते हैं, ‘’कछुआ सेंचुरी नदी के दूसरी ओर से शुरू हो जाती है। सेंचुरी बनने से सात किमी. मालवीय पुल तक खनन पर रोक लगा दी गई है। खनन न होने से गंगा के जलप्रवाह के साथ आने वाली बालू एकतरफ जमा हो रही है। इससे नदी के दूसरी तरफ रेत के छोटे-छोटे पहाड़ बनते जा रहे हैं।’’ पिछले 12 वर्षों से बनारस के मानमंदिर घाट पर नाव चला रहे जगदीश निषाद ( 54 वर्ष) बताते हैं, ‘’गंगा की गंदगी घटी हो या न घटी हो। यहां बनाई गई कछुआ सेंचुरी में आजतक हमने एक कछुआ नहीं देखा है।’’

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विश्व में कछुओं में 260 प्रजातियां पाई जाती हैं

विश्व में पाई जाने वाली 260 प्रजातियों में से 85 प्रजातियां एशिया में पाई जाती हैं। इनमें से 28 प्रजातियां भारत में पाई जाती हैं। उत्तर प्रदेश में 14 प्रजातियां पानी में पाई जाती हैं और एक प्रजाति जमीन पर पाई जाती है। तेजी से खत्म हो रहे कछुओं की कई प्रजातियों को राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय वैज्ञानिक एवं संरक्षण समितियों ने रेड लिस्ट व वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 की सूची में शामिल किया है।

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