विश्व स्तनपान सप्ताह: उत्तर प्रदेश में 25 प्रतिशत नवजात ही पी पाते हैं मां का दूध

Neetu SinghNeetu Singh   1 Aug 2017 2:54 PM GMT

विश्व स्तनपान सप्ताह: उत्तर प्रदेश में 25 प्रतिशत नवजात ही पी पाते हैं मां का दूधयूपी में 10 शिशुओं में से केवल दो को जन्म के एक घंटे के भीतर माँ का पहला दूध मिलता है

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। सरकार की तमाम योजनाएं चलने के बावजूद आज भी उत्तर प्रदेश में 10 शिशुओं में से केवल दो को जन्म के एक घंटे के भीतर माँ का पहला दूध मिलता है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है।

प्रतिवर्ष एक अगस्त से सात अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह दिवस मनाया जाता है। सन 1992 से शुरू हुई इस मुहिम में अब 170 से अधिक देश इसे मनाते हैं। इस साल स्तनपान सप्ताह का विषय “निरंतर स्तनपान एक साझा प्रयास”रखा गया है।

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नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (चार) की 2015-16 की रिपोर्ट के अनुसार, अगर हम तीन वर्ष से कम आयु के बच्चों की बात करें तो देश में जन्म के एक घंटे के अंदर 41.6 प्रतिशत बच्चों को ही स्तनपान कराया जाता हैं, वहीं उत्तर प्रदेश में ये आंकड़ा मात्र 25.2 प्रतिशत ही है। दूसरी ओर, देश में 54.9 प्रतिशत छह माह तक की आयु के बच्चों को स्तनपान कराया जाता है, वहीं उत्तर प्रदेश की बात करें तो ये आंकड़ा सिर्फ 41.6 प्रतिशत हैं। स्तनपान सप्ताह मनाने का मुख्य उद्देश्य ये है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को जागरूक किया जाए।

केवल शहर ही नहीं, बल्कि हमारे गाँव की लाखों महिलायें अभी भी छह महीने तक पूर्ण रूप से अपने बच्चों को स्तनपान नहीं करा पाती हैं। किसी के पास समय नहीं, तो जागरूक नहीं है। नतीजा ये हो रहा है कि हमारे देश के लाखों बच्चे आज कुपोषित हो रहे हैं।

नेशनल हेल्थ मिशन के मिशन डायरेक्टर आलोक वर्मा ने कहा, “जन्म के एक घंटे के भीतर अगर बच्चे को स्तनपान कराया जाये तो हजारों बच्चों को मरने से बचाया जा सकता है, एक लाख 27 हजार आशा बहुओं को ट्रेनिंग दी जा चुकी है ये गाँव-गाँव जाकर स्तनपान कराने के लिए जागरूक करेंगी।“

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राजधानी में कार्यक्रम के दौरान चिकित्सा, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के प्रमुख सचिव प्रशांत त्रिवेदी ने कहा, “छह माह तक स्तनपान कराने से शिशु के साथ-साथ माँ के स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है, इससे उन्हें ब्रेस्ट कैंसर, यूट्रस कैंसर होने की सम्भावना बहुत कम होती है। स्वास्थ्य टीम को गाँव-गाँव जाकर माताओं को ये बताना होगा कि स्तनपान कराने से शिशु को ही नहीं, बल्कि उन्हें भी लाभ है, इससे मोटापा भी कम होता है।”

आलोक वर्मा बताते हैं, “स्तनपान सप्ताह पर जनपद स्तर, ब्लॉक स्तर बैठकें की जा रही हैं। स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए प्रशंसनीय कार्य करने वाली चिकित्सा इकाइयों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाएगा।”वो आगे बताते हैं, “स्तनपान सप्ताह के दौरान स्तनपान पर विशेष वार्ता प्रसारित की जायेगी, आशा और एनम को निर्देश दिया जा रहा है कि इन कार्यक्रमों को समूह में ज्यादा से ज्यादा गर्भवती और स्तनपान करने वाली महिलाओं को दिखाया जाए जिससे वो स्तनपान कराने के लिए प्रेरित हो सकें।”

तो ये संकेत अच्छे नहीं

कहावत है कि बिना रोये तो मां बच्चों को दूध भी नहीं पिलाती है। मगर इसमें सच्चाई कम और भ्रांति ज्यादा है। शिशुओं को दिन में अगर सात से आठ बार मां अपना दूध नहीं पिला रही है तो ये अच्छे संकेत नहीं है। डिब्बा बंद ब्रान्डेड दूध ने आज हमारे गाँव के घरों में जगह बना ली है। घरेलू कामों की व्यस्तता की वजह से महिलाएं छह माह का स्तनपान गम्भीरता से नहीं ले रही है।

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‘शिशुओं के स्तनपान में परिवार की भागीदारी जरूरी’

बाल स्वास्थ्य, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के महा प्रबंधक डाक्टर अनिल कुमार वर्मा ने एक से सात अगस्त तक मनाये जाने वाले स्तनपान सप्ताह पर प्रेस कांफेंस में कहा, “शिशुओं के स्तनपान में परिवार की भागीदारी बहुत जरूरी है, अगर आसपास के बुजुर्ग लोग इसे बढ़ावा दे तो इसका ज्यादा फायदा होगा। कार्यस्थल पर भी स्तनपान के लिए समुचित इंतजाम किया जाये तो इससे भी लाभ मिलेगा, शिशु को जन्म से छह माह तक स्तनपान कराना एक साझा प्रयास है।”

मां का पहला दूध है औषधि

कोलस्ट्रम यानि मां का पहला पीला गाढ़ा दूध पोषणयुक्त व रोगप्रतिरोधक होता है। मां का दूध नवजात के लिए संपूर्ण पोषण और आहार है। जन्म के पहले घंटे के अंदर बच्चे को स्तनपान कराना बहुत जरूरी है। शिशु के जन्म से छह महीने तक कोई भी भोज्य पदार्थ और पानी न दें। बच्चे के साथ-साथ माँ के लिए भी स्तनपान कराना कई सारी बीमारियों से निजात दिलाना है।

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स्तनपान कराने से बचती हैं ग्रामीण महिलाएं

कानपुर देहात के बैरीसवाई गाँव में कार्यरत आशा वर्कर नयनतारा का कहना है, “गाँवों की महिलाएं बच्चों को दूध पिलाने के लिए जागरूक तो हैं, लेकिन घर के कामकाज की वजह से वो इतना समय नहीं निकाल पाती हैं, कम से कम आठ बार दूध पिलाना बहुत जरूरी है। यही जागरूकता हम फैला रहे हैं।”

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