इस गाँव के लोगों को आज भी है बल्ब की रौशनी का इंतजार

इस गाँव के लोगों को आज भी है बल्ब की रौशनी का इंतजारदरवाजे पर लगी कालिक दिखाती कुसुम                           फोटाे: विनय गुप्ता

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। बाराबंकी जनपद के निन्दुरा ब्लॉक के श्रीनगर करुआ मजरा में अपने मिट्टी के घर के सामने खड़ी कुसुम दरवाजे पर लगी कालिख को दिखाती हैं। यह कालिख मिट्टी के तेल से ढिबरी जलाने के कारण लगी है। कुसुम की ही तरह यहां रहने वाले 40 से 50 परिवार अंधेरे में जीने को मजबूर हैं।

श्रीनगर करुआ मजरा में ज्यादातर परिवार बिहार के रोहतास और बक्सर से आकर यहां बसे हैं। वर्ष 1988 में बिहार के बक्सर जिले से काम के सिलसिले में हरेराम सिंह लखनऊ आए और बाराबंकी में आकर बस गए। हरेराम सिंह बताते हैं, “हम कई बार इसके लिए सांसद, विधायक और प्रधान से मिले, लेकिन किसी ने हमारा दुख नहीं सुना और हम अंधेरे में रहने को मजबूर हैं।”

श्रीनगर करुआ मजरा गाँव के प्रधान अनिल वाजपेयी बताते हैं, ‘‘हमारे यहां अब तक बिजली के खम्भे ही नहीं लगे हैं तो बिजली आने के बारे में कैसे सोच सकते हैं।’’ इण्डिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014 में भाजपा सरकार बनाने के बाद वर्ष 2015 में देशभर से दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (डीडीयूजीजेवाई) के तहत 18,452 गाँवों की पहचान विद्युतीकरण के लिए की गई थी, लेकिन अब तक मात्र आठ फीसदी गाँवों का ही पूरी तरह से विदयुतीकरण हो पाया है।

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25 मई 2017 तक 13,523 गाँवों को विद्युतीकरण किया गया है, लेकिन 100 फीसदी घरेलू कनेक्टिविटी केवल 1,089 गाँवों में ही हासिल की गई है। यह जानकारी बिजली मंत्रालय के ग्रामीण विद्युतीकरण (जीएआरवी) डैशबोर्ड के आंकड़ों में सामने आई है। इलाहाबाद जिले के बारा तहसील अंतर्गत जसरा और शंकरगढ़ विकास खंड के दर्जनों गाँवों में लोग आज भी बिजली, पानी और सड़क जैसी सुविधा से वंचित हैं। इन गाँवों के लोग पानी के लिए कई किलोमीटर का सफर तय करते हैं तब जाकर इनको पानी मिलता है।

बिजली और सड़क नहीं होने की वजह से लोग अपने पक्के मकान को छोड़कर पलायन करने लगे हैं। सोनवर्षा निवासी अनिल जायसवाल (41 वर्ष) का कहना है, “बिजली की समस्या ने गाँव को सूना कर रखा है।” ललई निवासी रघुवर (49 वर्ष) ने बताया, “बिजली की समस्या दूर नहीं हुई तो जल्द ही क्षेत्र के कई गाँव खाली हो जाएंगे।”

ये है उत्तर प्रदेश में बिजली की हकीकत

इण्डिया स्पेंड की रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2017 के अंत में यूपी देश भर में कोयला आधारित बिजली उत्पादन क्षमता में तीसरे नम्बर पर था, लेकिन यहां 51.8 ग्रामीण परिवारों के पास अब भी बिजली नहीं है। यह अब भी नीचे से चौथे स्थान पर है। सूची में उत्तर प्रदेश से केवल महाराष्ट्र और गुजरात ही ऊपर हैं। उत्तर प्रदेश में चार में से तीन ग्रामीण विद्युतीकृत घरों में प्रतिदिन 12 घंटे से कम बिजली मिलती है। विद्युतीकृत परिवारों में से केवल पांच फीसदी को 20 या उससे अधिक घंटों की आपूर्ति मिलती है, जबकि 23 फीसदी को चार या उससे अधिक घंटे की आपूर्ति मिलती है।

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यूपी के 1529 गाँव शामिल

दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (डीडीयूजीजेवाई) के तहत प्रदेश से 1529 गाँवों का चयन किया था, जिसमें 1470 गाँवों का विद्युतीकरण हो गया है।

वहीं ऊर्जा मंत्री श्रीकान्त शर्मा ने बताया, पहले बिजली शक्तिभवन तक सीमित रहती थी, रोस्टर कागजों पर बनता था। नीचे बिजली नहीं पहुंचती थी। मुख्यमंत्री ने कहा है कि 18 घंटे बिजली गाँवों में, 20 घंटे बुंदेलखंड में और 24 घंटे जिला मुख्यालयों में मिले, वह रोस्टर जमीन पर लागू हो रहा है। तकनीकी गड़बड़ी आ रही है तो उसे एक समय अवधि में ठीक भी किया जाता है।

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