Good News : चटाई पर धान बोकर बचाएं 30 फीसदी लागत

Ashwani NigamAshwani Nigam   13 July 2018 5:21 AM GMT

Good News : चटाई पर धान बोकर बचाएं 30 फीसदी लागतराइस मैट नर्सरी विधि से धान की बुवाई करते किसान (साभार: इंटरनेट)

लखनऊ। परंपरागत तरीके से धान की बुवाई रोपनी विधि से करने में किसान को सिंचाई और मजदूरी देने में कुल लागत का 30 फीसदी खर्च करना पड़ता है। साथ ही इस विधि से बुवाई करने में किसान को अधिक पानी की भी जरूरत पड़ती है। लेकिन नई तरह की विधियों जैसे श्रीविधि और राइस मैट नर्सरी विधि से किसान अपनी लागत को काफी कम और मुनाफा बढ़ा सकते हैं।

श्रीविधि से धान की खेती से कम लागत में ज्यादा मुनाफा

परंपरागत से नर्सरी उगाने और उसे रोपने में ऐसे में किसानों की लागत बढ़ जाती है। धान की बुवाई में होने वाली इस परेशानी से बचाने और उनकी लागत कम करने के लिए धान की बुवाई की नई विधि 'राइस मैट नर्सरी' को ईजाद किया गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वी क्षेत्र पटना-रांची के वैज्ञानिकों ने इस विधि से बिहार और उत्तर प्रदेश के किसानों को धान की खेती करने की सलाह दी है।

'राइस मैट नर्सरी विधि' की जानकारी देते हुए कृषि वैज्ञानिक डॉ. संतोष कुमार ने बताया, 'इस विधि में धान के बीज को वर्मी कंपोस्ट के साथ मिट्टी के मिश्रण में बेड पर उगाया जाता है। 15-20 दिनों के बाद जब नर्सरी तैयारी हो जाती है तो बिचड़े को लपेटकर चटाई की तरह उखाड़ लिया जाता है। फिर इसे खेत में नमी करके राइस ट्रांसप्लांटर मशीन के जरिए इसकी रोपाई कर देते हैं। इस तकनीक से समय ओर श्रम दोनों की बचत होती है।'

किसानों के काम की ख़बर- पैडी वीडर यंत्र से धान की निरार्इ-गुड़ार्इ आसान

राइस मैट नर्सरी विधि के कृषि वेद प्रकाश ने बताया कि भारतीय कृषि खेतिहर मजदूरों की कमी और पानी के अभाव में बुरी तरह प्रभावित हो रही है। देश में अभी तक धान की खेती परंपरागत तरीके से की जा रही है जिसमें 21-30 दिन का पुराना बिचड़ा (धान की नर्सरी का गुच्छा) खेत में कादो (गीली मिट्टी) में लगाया जाता है जिसमें अधिक पानी खेत का देना पड़ता है। इसका नुकसान यह होता है कि मिट्टी के कण कादो करने से अव्यवस्थित हो जाते हैं और मिट्टी के अंदर जो पानी के नली जैसी संरचना होती है टूट जाती है जिसका नुकसान होता है।

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ट्रे में धान की तैयार नर्सरी को अलग करती युवती। फोटो- साभार

राइस मैट नर्सरी विधि में धान के बीज को वर्मी कंपोस्ट के साथ मिट्टी के मिश्रण में बेड पर उगाया जाता है। 15-20 दिनों के बाद जब नर्सरी तैयारी हो जाती है तो बिचड़े को लपेटकर चटाई की तरह उखाड़ लिया जाता है। फिर इसे खेत में नमी करके राइस ट्रांसप्लांटर मशीन के जरिए इसकी रोपाई कर देते हैं। इस तकनीक से समय ओर श्रम दोनों की बचत होती है।
डॉ. संतोष कुमार, कृषि वैज्ञानिक

राइस मैट नर्सरी विधि से 15-20 दिन में ही तैयार हो जाती है धान की पौध

उन्होंने बताया कि राइस मैट नर्सरी विधि से तैयार किए गए बिचड़े की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह 15 से 20 दिन में तैयार हो जाते हैं ओर इसके लिए काफी कम पानी और जमीन की जरूरत पड़ती है। इसको घर के पास भी उगाया जा सकता है। इस विधि से 90 प्रतिशत रासायनिक खादों का उपयोग कम होता है और परंपरागत तरीके से बोने वाले धान की अपेक्षा 55 प्रतिशत पानी की बचत होती है।

इस विधि से तैयार किए गए बिचड़े को राइट ट्रांसप्लांटर मशीन में रखने के लिए लोहे का ट्रे बना होता है, जो मशीन से जुड़ा रहता है। माना जाता है कि एक रोपाई करने वाला एक खेतिहर मजदूर दिनभर में लगभग 8 घंटे में 500 वर्गमीटर क्षेत्रफल में रोपाई करता है जबकि राइस मैट नर्सरी से तैयार हुए बिचड़े को राइट ट्रांसप्लांटर मशीन इतने समय में एक से लेकर डेढ‍् हेक्टेयर में रोपाई कर देती है। इस विधि से बुवाई करने में धान में रोग भी कम लगते हैं। मिट्टी की उवर्रक शक्ति भी बनी रहती है।

भारतीय कृषि अनुसंधान के वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि राइस मैट नर्सरी तकनीक से किसान धान के बिचड़े पैदा करके इसके बाजार बेचकर पैसा भी कमा सकते हैं क्योंकि इसकी डिमांड बढ़ रही है।

कैसे तैयार किया जाता राइस मैट नर्सरी

राइस मैट नर्सरी में 20 मीटर लंबा और 1.2 मीटर चौड़ा ओर 10-15 सेंटीमीटर मिट्टी का बेड तैयार जाता है। इसके उपर एक प्लास्टिक की शीट बिछा देते हैं। उसके ऊपर मिट्टी और गोबर क खाद आधे इंच तक बिछाकर रख देते हैं। इसके ऊपर अंकुरित धान को बिछा देते हैं। इसके बाद इसको समय-समय पर हल्की सिंचाई करते हैं। इसमें बिचड़ों की जड़े आपस जुड़ जाती है। जब यह तैयार हो जाता है तब चटाई की तरह इसे उठाया जाता है।

व्यवसायिक स्तर पर भी हो रहा है धान की नर्सरी का काम।

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लखनऊ। किसान को धान की निरार्इ-गुड़ार्इ व खरपतवार हटाने के लिए मजदूरों की ज़रूरत पड़ती है। धान की खेती कर रहे किसानों के लिये पैडी वीडर बेहद लाभदायक कृषि यंत्र है। इसकी मदद से किसान न सिर्फ आसानी से खरपतवार को हटा सकता है, बल्कि खेती में आने वाले लेबर खर्च भी कम कर सकता है।

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लखनऊ जिले में पिछले 10 वर्षों से कृषि उपकरण बेच रहे विक्रेता संजय सिन्हा पैडी वीडर को धान किसानों के लिए सफल उपकरण मानते हैं। संजय बताते हैं, ''धान की खेती करने वाले किसानों में सबसे अधिक समय खरपतवार हटाने और निरार्इ-गुड़ार्इ जैसे कार्यों में लगता है। पैडी वीडर उपकरण की मदद से कम समय में खेत की निरार्इ व गुड़ार्इ कर सकते हैं। इसे चलाना भी बेहद आसान होता है।''

धान: अच्छे उत्पादन के लिए वैज्ञानिकों की सलाह।

पैडी वीडर उपकरण वजन में काफी हल्का होता है, इसको चलाने में एक व्यक्ति की ज़रूरत पड़ती है। इस उपकरण को खेत में प्रयोग करने के लिए इसे पानी भरे खेत में थोड़ा आगे-पीछे करते हुए धान की दो कतारों के बीच चलाते हैं। इसके चलाने से खरपतवार के छोटे टुकड़े हो जाते हैं और कीचड़ में मिल जाते हैं। इससे धान के पौधों में मिट्टी चढ़ाने जैसी प्रक्रिया हो जाती है, जिससे धान की जड़ के आसपास ज़मीन कुरेदी रहती है। इससे धान की पैदावार में तेजी आ जाती है।

पैडी वीडर विक्रेता संजय सिन्हा ने आगे बताया कि हम अभी तक प्रदेश में लखनऊ, अंबेडकर नगर और उन्नाव जैसे जिलों में पैडी वीडर बेच रहे हैं। एक पैडी वीडर की कीमत 1,500 रुपए होती है। सरकारी तौर पर खरीदने पर पैडी वीडर 1,800 से 2,000 रुपए का मिलता है, इस पर सरकार 50 प्रतिशत सब्सिडी भी देती है। ''

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