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'दिल्ली की देहरी' : 'नई दिल्ली' की बसने की कहानी 

Nalin ChauhanNalin Chauhan   16 Feb 2019 7:30 AM GMT

‘नई दिल्ली’ की बसने की कहानी 

किसी भी भारतीय को यह बात जानकर हैरानी होगी कि आज की नई दिल्ली, किसी परंपरा के अनुसार अथवा स्वतंत्र भारत के राजनीतिक नेताओं की वजह से नहीं बल्कि एक सौ साल (वर्ष १९११) पहले आयोजित तीसरे दिल्ली दरबार में अंग्रेज़ सम्राट जार्ज पंचम की घोषणा के कारण देश की राजधानी बनी। इस दिल्ली दरबार की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना ब्रिटिश भारत की राजधानी का कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरण की घोषणा थी।

जार्ज पंचम ने किंग्सवे कैंप के कोरोनेशन पार्क में नई राजधानी, नयी दिल्ली की आधारशिला भी रखी। पूरे अंग्रेज प्रशासन को कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित करने में करीब चार लाख ब्रिटिश पाउंड का खर्चा आया। इसके लिए मद्रास से लेकर कोलकता प्रेसिडेंसी से कर्मचारियों को लाया गया।

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नई दिल्ली शहर का निर्माण पूरा होने के बाद 13 फरवरी 1931 को लॉर्ड इरविन ने उसका उद्घाटन किया। हरबर्ट बेकर और एडविन लुटियन नामक दो अंग्रेज वास्तुकारों ने इस शहर का स्थापत्य और योजना बनाई। इस योजना के स्वीकृत होने के बाद शहर में भवन निर्माण का कार्य सोभा सिंह को दिया गया।

"इलेक्ट्रिफिकेशन एज पोलिटिकल रिचुअल इन न्यू दिल्ली, ए मॉरल टेक्नोलॉजी" पुस्तक के लेखक लियो कोलमन के शब्दों में, 13 फरवरी, 1931 को दरबार शैली में एक और समारोह हुआ था पर यह एक शांत और छोटा-सा आयोजन था। ऐसा इसलिए था कि वह समय, आत्म-तुष्टि के लिए खुशी या राजसी वरदानों को मनाने के अनुकूल नहीं था। एक बरस पहले ही गांधी ने अपना सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया था। जिसके बाद उन्हें शीघ्र ही उनकी राजनीतिक गतिविधियों के कारण कैद में डाल दिया गया। दरअसल, कोई सोच सकता है कि यह पूरा समय उपनिवेशवादी सरकार की रचनात्मक राजनीतिक समझबूझ की एक बड़ी असफलता की कहानी बताता है।"

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प्रसिद्व अंग्रेजी पत्रकार और "दिल्ली" उपन्यास के लेखक खुशवंत सिंह के अनुसार, मैं 1920 में अपने पिता के साथ दिल्ली आया तब तक तो नई दिल्ली को बनाने का काम जोरों पर चल रहा था। उस दरबार में शिरकत करने उनके मेरे पिता (सुजान सिंह) और दादा भी आए थे। वे दोनों ठेकेदारी के धंधे में थे और तब तक कालका शिमला रेलवे लाइन बिछा चुके थे। उन्होंने सोचा कि दिल्ली राजधानी बनेगी तो इमारतें बनाने के लिए बहुत सारे काम मिल जाएंगे, इसलिए वे सन् 1912 में यहां आ गए और निर्माण में जुट गए। उल्लेखनीय है कि नयी दिल्ली के लिए निर्माण कार्य पहले विश्व युद्व के बाद शुरू हुआ जो कि 1931 तक जारी रहा।

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आज की संसद के बारे में वे (खुशवंत सिंह) बताते है कि जहां आज संसद भवन की एनेक्सी है, वहां इन दिनों बड़ी-बड़ी आरा मशीनें चलती थीं जिसमें पत्थरों की कटाई होती। सुबह-सुबह ही पत्थर काटने की ठक-ठक की आवाजों से हमारी नींद खुल जाती। लगभग साठ हजार मजदूर नई दिल्ली की इमारतों को बनाने में लगे थे। ज्यादातर तो राजस्थानी थे, उन्हें दिहाड़ी के हिसाब से मेहनताना मिला करता था, मर्दों को आठ आठ आना और औरतों को छह आना दिहाड़ी मिला करती थी।

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उनके अनुसार, राजधानी में पहले सचिवालय बने। साथ ही साथ सड़के बिछानी शुरू की गई। सरकार चाहती थी कि लोग आगे आएं और जमीनें खरीदकर वहां इमारतें बनाएं, पर लोग अनिच्छुक थे। लोग काम करने नई दिल्ली के दफ्तरों में आते और पुरानी दिल्ली के अपने घरों को लौट जाते। यहां तो जंगल ही था सब-रायसीना, पहाड़गंज, मालचा-सब कहीं। गुर्जर ही रहते थे बस यहां। सारी जगह कीकर के जंगल थे, कहीं कहीं तो जंगली जानवर भी।

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वे अपने परिवार और पैतृक व्यवसाय के नई दिल्ली के निर्माण से जुड़े रहने के बारे में बताते है कि मेरे दादा से अधिक मेरे पिता ही दरअसल वास्तविक रूप से निर्माण कार्य में लगे थे। उनके पिता व्यवसाय की ऊपरी देखरेख करते थे। उन्होंने नई दिल्ली की अनेक इमारतें बनाईं, जिनमें प्रमुख थीं-सचिवालयों का साउथ ब्लॉक, इंडिया गेट (जिसे तब आल इंडिया वॉर मेमोरियल आर्च कहा जाता था), ऑल इंडिया रेडियो बिल्डिंग (आकाशवाणी भवन), नेशनल म्यूजियम, बड़ौदा हाउस एवं अनगिनत सरकारी बंगले। साथ ही उन्होंने (सुजान सिंह) अपनी खुद की भी कई इमारतें बनाई, जैसे-वेंगर्स से लेकर अमेरिकन एक्सप्रेस तक का कनॉट प्लेस का एक पूरा का पूरा ब्लॉक। उन दिनों यह सुजान सिंह ब्लॉक कहलाता था। रीगल बिल्डिंग, नरेंद्र प्लेस, जंतर मंतर के पास और सिंधिया हाउस भी उन्होंने ही बनाए।

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सुजान सिंह ने दूसरे ठेकेदारों के साथ मिलकर विजय चौक, संसद भवन का भी कुछ हिस्सा बनाया। नार्थ ब्लॉक को सरदार बसाखा सिंह और साउथ ब्लॉक को सुजान सिंह ने बनाया। उनकी पत्नी के पिता सर तेजा सिंह सेंट्रल पी‐डब्ल्यू‐डी में चीफ इंजीनियर थे। वे पहले भारतीय थे, जिन्हें चीफ इंजीनियर का दर्जा प्राप्त था, वरना तो सिर्फ अंग्रेजों को ही यह पद दिया जाता था। सचिवालयों के शिलापट्टों पर खुशवंत सिंह के पिता और ससुर दोनों के नाम खुदे हुए हैं। इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन की ओर जाने पर नार्थ और साउथ ब्लॉकों के मेहराबदार ताकों में शिलापट्टों पर एक तरफ नई दिल्ली को बनाने वाले ठेकेदारों के नाम हैं और दूसरी तरफ आर्किटेक्टों और इंजीनियरों का नाम हैं।

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